मुख्य सामग्री पर जाएँ

पर्व 17

अंजना के गर्भ प्रकट होना और सास द्वारा घर से निकालना

सास और पिता द्वारा निकाली गई अंजना वन की गुफा में हनुमान को जन्म देती है और उसके मामा प्रतिसूर्य उसे आश्रय देते हैं।

कथा खंड अंजना और हनुमान का जन्म

सारांश

अंजना का गर्भ प्रकट होने पर सास केतुमती उसकी बात पर विश्वास न करके उसे घर से निकाल देती है, और अपयश के भय से पिता राजा महेन्द्र भी उसे आश्रय नहीं देते। स्वामिभक्त सखी वसंतमाला के साथ मातंगमालिनी वन में भटकती अंजना को एक गुफा में अमितगति मुनि मिलते हैं, जो उसके पूर्वजन्म का पाप और गर्भस्थ बालक के पूर्वभव बताते हैं। गंधर्व देव द्वारा सिंह से रक्षा के बाद वह हनुमान को जन्म देती है, और मामा प्रतिसूर्य उन्हें हनुरुह द्वीप ले जाते हैं, जहाँ गिरकर पर्वत को चूर्ण कर देने वाले बालक का नाम श्रीशैल और हनुमान रखा जाता है।

क्या हुआ

20 बिंदु

  1. कुछ दिनों बाद अंजना के गर्भ के चिह्न प्रकट हुए, मानो गर्भ में आए हनुमान का यश ही प्रकट हुआ हो। सास केतुमती ने पूछा कि यह कर्म किसके साथ किया, और अंजना ने पति के आने का वृत्तांत कहा तो उसने कहा कि मेरा पुत्र तो तेरा मुँह भी नहीं देखना चाहता, युद्ध को गया वह तेरे महल में कैसे आता; उसे चंद्रमा की किरण समान उज्ज्वल वंश को कलंक लगाने वाली पापिनी कहा, वसंतमाला को भी दोषी ठहराया, और मुद्रिका व कड़े दिखाने पर भी नहीं मानी।

  2. क्रोध से केतुमती ने क्रूर नामक सेवक को आज्ञा दी कि सखी सहित अंजना को गाड़ी में बैठाकर महेन्द्रनगर के पास छोड़ आओ; अंजना ने सास को कोई उत्तर नहीं दिया, केवल अपने अशुभ कर्म की निंदा करती रही; दिन ढलते क्रूर ने उन्हें महेन्द्रनगर के समीप उतारा, स्वामिनी की आज्ञा से किए इस कार्य के लिए क्षमा माँगी और लौटकर केतुमती को सूचना दी।

  3. वसंतमाला द्वारा बिछाए पत्तों के बिस्तर पर बिना सोए रात बिताकर अंजना पिता के राजभवन पहुँची, जहाँ दुख से बदले रूप के कारण शिलाकवाट नामक द्वारपाल उसे पहचान न सका, तब वसंतमाला ने सब बताया। राजा महेन्द्र ने पहले पुत्र प्रसन्नकीर्ति को अंजना की अगवानी और नगर सजाने को कहा, पर लज्जा का कारण सुनकर क्रोध से आज्ञा दी कि उस पापिनी को नगर से निकाल दो।

  4. राजा के अति मित्र, महोत्साह नामक बड़े सामंत ने कहा कि केतुमती महाक्रूर है, जैनधर्म नहीं जानती और अन्य धर्मों में प्रवीण है, उसने श्रावकव्रत पालने वाली धर्मात्मा अंजना पर झूठा दोष लगाया होगा, अतः वसंतमाला से सब जान लें। पर राजा ने कहा कि वसंतमाला प्रेम के कारण सच नहीं कहेगी, सब जानते हैं कि पवनंजय अंजना को आँख उठाकर भी नहीं देखता, फिर गर्भ कैसे रहा, और जो उसे मेरे राज्य में रखेगा वह मेरा महाशत्रु होगा; यह कहकर उसे द्वार से निकलवा दिया।

  5. जिस-जिस संबंधी के यहाँ वह गई, सबने द्वार बंद कर लिए, क्योंकि सब राजा के अधीन थे; अपमान से मरना अच्छा समझकर वह वसंतमाला सहित वन को चली और रोई कि न माता ने रक्षा की, न एक माँ के गर्भ से जन्मे भाइयों ने रखा। वसंतमाला ने उसे छाती से लगाकर समझाया कि पूर्वकर्म का फल अवश्य भोगना है, स्वर्ग के देव भी अंत समय दुख पाते हैं।

  6. गर्भ के भार से अंजना आकाशमार्ग से चलने में असमर्थ थी, इसलिए सखी के पीछे-पीछे पैदल अजगरों और हिंसक पशुओं से भरे, सूर्य की किरणें भी न पहुँचें ऐसे घने मातंगमालिनी वन में चली, जहाँ सुई की नोक जैसे काँटे, कंकड़-पत्थर और तेज झरने थे; पैरों से खून बहने लगा, पहाड़ की तलहटी पर वह थककर बैठ गई, तब वसंतमाला उसे समझाकर पास की गुफा तक ले गई।

  7. गुफा के द्वार पर उन्होंने एक पवित्र शिला पर पद्मासन में विराजमान, नासाग्र दृष्टि वाले, स्तंभ समान निश्चल चारणऋद्धिधारी मुनिराज को देखा; दोनों ने तीन प्रदक्षिणा देकर नमस्कार किया, उनका सारा भय दूर हो गया, और वसंतमाला ने पूछा कि अंजना का पति इतने दिन उदास क्यों रहा, फिर अनुरागी क्यों हुआ और इसके गर्भ में कौन आया है।

  8. तीन ज्ञान के धारी अमितगति मुनिराज ने पहले बालक के पूर्वभव कहे: भरतक्षेत्र के मंदर नगर में प्रियनंदी गृहस्थ और उसकी स्त्री जया का पुत्र दमयंत था, जिसने वसंत ऋतु में मित्रों की क्रीड़ा छोड़कर मुनि से धर्म सुना, सम्यग्दर्शन सहित श्रावक के व्रत लिए, दाता के सात गुणों और नवधा भक्ति से मुनियों को आहार दिया और समाधिमरण कर देव हुआ।

  9. फिर वह मृगांक नगर के राजा हरिचंद्र और रानी प्रियंगुलक्ष्मी का पुत्र सिंहचंद्र हुआ और साधुओं की सेवा कर फिर देव हुआ; वहाँ से विजयार्ध के अरुणपुर नगर में राजा सुकंठ और रानी कनकोदरी का पुत्र सिंहवाहन हुआ, जिसने बहुत काल राज्य करके श्री विमलनाथ भगवान के समवसरण में वैराग्य पाया, पुत्र लक्ष्मीवाहन को राज्य दिया और लक्ष्मीतिलक मुनि से मुनिधर्म अंगीकार किया।

  10. घोर तप से सिंहवाहन मुनि को अनेक ऋद्धियाँ प्राप्त हुईं, उनके शरीर को छूकर आने वाली वायु भी प्राणियों के रोग दूर करती थी; बाईस परीषह सहकर आयु पूर्ण कर वे सातवें लांतव स्वर्ग में महाऋद्धिधारी देव हुए, और स्वर्ग-सुख में मग्न न होकर वहाँ से चयकर अंजना के गर्भ में आए हैं; वे चरमशरीरी हैं और इसी भव से मोक्ष पाएँगे।

  11. फिर मुनिराज ने अंजना के पूर्वभव कहे: वह कनकोदरी नामक पटरानी थी, जिसने पटरानी पद के अभिमान से सौत पर क्रोध करके जिनेन्द्र भगवान की प्रतिमा को क्षण भर के लिए मंदिर से बाहर कर दिया। उसी समय आहार के लिए आई, तप से प्रसिद्ध संयमश्री आर्यिका ने यह अविनय देखकर आहार नहीं लिया और उपदेश दिया कि पूर्व पुण्य से ही तू संपत्तिवान पटरानी है और अद्भुत कार्य करने वाला तेरा पुत्र है, मनुष्य जन्म दुर्लभ है, और अरहंत के प्रतिबिंब का अविनय नरक का तथा उनकी भक्ति स्वर्ग-मोक्ष का कारण है।

  12. नरक के दुखों से डरकर कनकोदरी ने सम्यग्दर्शन और श्रावक के व्रत लिए, प्रतिमा को मंदिर में विराजमान कर अष्टद्रव्य से पूजा की, समाधिमरण कर स्वर्ग गई और वहाँ से चयकर राजा महेन्द्र और रानी मनोवेगा की पुत्री अंजनासुंदरी हुई। प्रतिमा को एक क्षण मंदिर से बाहर रखने के पाप से ही उसे पति का वियोग और कुटुंब से अनादर मिला।

  13. मुनिराज ने विवाह से तीन दिन पहले मिश्रकेशी द्वारा की गई निंदा और मानसरोवर पर चकवी देखकर पवनंजय के लौटने का कारण भी बताया, अंजना को जिनभक्ति का उपदेश दिया और कहा कि तेरा पुत्र अखंड वीर्य वाला होगा, जिसे देव भी नहीं जीत सकेंगे, और शीघ्र ही तेरा पति से मिलन होगा। फिर वे आकाशमार्ग से विहार कर गए और दोनों प्रसूति के लिए मुनि के रहने से पवित्र हुई उस गुफा में रहीं, जहाँ वसंतमाला विद्या के प्रभाव से भोजन-सामग्री जुटाती थी।

  14. उस रात गुफा के द्वार पर एक दहाड़ता सिंह आया; अंजना ने प्रतिज्ञा की कि इस उपसर्ग में मरण हो तो आहार-पानी का त्याग है, और वसंतमाला हाथ में खड्ग लेकर कभी आकाश में कभी भूमि पर घूमती हुई स्वामिनी के दुखों का विलाप करती रही। तब गुफा के निवासी मणिचूल गंधर्व देव ने अपनी पत्नी रत्नचूला के कहने पर अष्टापद का रूप धारण कर पंजे के प्रहार से सिंह को भगा दिया।

  15. आधी रात को उस गंधर्व देव ने वीणा, मंजीरा, मृदंग और बाँसुरी के साथ षड्ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद इन सात स्वरों, तीन लयों और इक्कीस मूर्च्छनाओं में श्री मुनिसुव्रतनाथ के गुण गाए; दोनों ने गुफा में मुनिसुव्रतनाथ की प्रतिमा विराजमान कर सुगंधित द्रव्यों से पूजा की और देव की रक्षा में वहाँ रहने लगीं।

  16. प्रसूति का समय आने पर अंजना ने कोमल पत्तों की सेज पर हनुमान को जन्म दिया, जैसे पूर्व दिशा सूर्य को प्रकट करती है, और गुफा मानो स्वर्णमयी होकर प्रकाशित हो गई। अंजना ने पुत्र को हृदय से लगाकर दुख किया कि दादा या नाना के घर जन्म होता तो बड़ा उत्सव होता, और उसे चिरंजीवी होने का आशीर्वाद दिया; वसंतमाला ने कहा कि यह बालक शुभ लक्षणों से युक्त और महाऋद्धिधारी होगा।

  17. आकाश में सूर्य समान प्रकाशमान एक विमान दिखा तो अंजना डरकर रोने लगी कि कोई शत्रु मेरे पुत्र को ले जाएगा; रोना सुनकर वह विद्याधर विमान उतारकर पत्नी सहित विनय से भीतर आया और वसंतमाला से सारा वृत्तांत सुना। उसने बताया कि मैं राजा चित्रभानु और रानी सुंदरमालिनी का पुत्र, हनुरुह द्वीप का स्वामी प्रतिसूर्य हूँ और अंजना मेरी भानजी है, बहुत दिनों बाद देखने से पहचान न सका; मामा, भानजी और मामी गले मिलकर ऐसे रोए कि गुफा गूँज उठी।

  18. अंजना के कहने पर प्रतिसूर्य ने ज्योतिषी से पूछा, जिसने चैत्र वदी अष्टमी की अर्धरात्रि, श्रवण नक्षत्र, उच्च के मेष राशि के सूर्य, उच्च के कर्क राशि के बृहस्पति, सब बलवान ग्रहों और शुभ ब्रह्मयोग को देखकर कहा कि यह बालक अद्भुत राज्य भोगेगा, साधुपद धारेगा और इसी भव से मोक्ष जाएगा; प्रतिसूर्य ने ज्योतिषी को बहुत दान दिया।

  19. अंजना ने गुफा के स्वामी गंधर्व देव से बार-बार क्षमा माँगी और सब प्रतिसूर्य के विमान में बैठकर चले, पर बालक खेलते-हँसते माता की गोद से उछलकर एक पर्वत पर गिर पड़ा। माता के विलाप के बीच प्रतिसूर्य नीचे उतरे तो देखा कि पर्वत के हजारों टुकड़े हो गए हैं और कामदेव पद का धारी, कांतिमान बालक एक शिला पर सुख से लेटा अपने पैर का अँगूठा चूसता हुआ हँस रहा है; प्रतिसूर्य ने कहा कि यह समचतुरस्र संस्थान और वज्रवृषभनाराच संहनन का धारक, चरमशरीरी और तद्भव मोक्षगामी है, और अपनी रानियों सहित उसकी तीन प्रदक्षिणा देकर नमस्कार किया।

  20. ध्वजा-तोरणों से सजे प्रतिसूर्य के नगर में विद्याधरों ने बालक का जन्मोत्सव वैसे मनाया जैसे स्वर्ग में देव इन्द्र के जन्म का उत्सव मनाते हैं। पर्वत की गुफा में जन्म लेने और पर्वत को खंड-खंड करने के कारण माता और मामा ने उसका नाम श्रीशैल रखा, और हनुरुह द्वीप में जन्मोत्सव होने से वह पृथ्वी पर हनुमान नाम से प्रसिद्ध हुआ और वहीं बढ़ने लगा; गौतम स्वामी ने श्रेणिक से कहा कि पूर्व पुण्य के प्रभाव से वज्र भी पुष्प समान कोमल और अग्नि भी चंद्रकिरण समान शीतल हो जाती है।