पर्व 16
अंजना और पवनंजय कुमार का मिलन
युद्ध के मार्ग में पति से बिछुड़ी चकवी का दुख देखकर पवनंजय बाईस वर्ष की उपेक्षा के बाद गुप्त रूप से अंजना के पास लौटता है।
कथा खंड अंजना और हनुमान का जन्मसारांश
विवाह के बाद त्यागी गई अंजना पति के प्रति मौन प्रेम में घुलती रहती है। वरुण द्वारा रावण का विरोध करने और खरदूषण को पकड़ लेने पर रावण राजा प्रह्लाद को बुलाता है, और पवनंजय पिता के स्थान पर युद्ध को जाता है तथा जाते समय द्वार पर खड़ी अंजना का कठोरता से तिरस्कार करता है। मानसरोवर पर पड़ाव में पति से बिछुड़ी चकवी को देखकर उसे पश्चाताप होता है और वह मित्र प्रहस्त के साथ गुप्त रूप से लौटकर अंजना से मिलता है, और अपने आने के प्रमाण स्वरूप उसे अपनी मुद्रिका और कड़े दे जाता है।
क्या हुआ
11 बिंदु
विवाह के बाद पवनंजय ने अंजना को ऐसा छोड़ा कि कभी उसकी ओर देखा तक नहीं; अंजना रात भर जागती, आँसू बहाती, स्नान और श्रृंगार छोड़कर क्षीण होती गई, आभूषण ढीले होकर गिरने लगे, पति का चित्र बनाने बैठती तो काँपते हाथों से कलम गिर जाती, और वह मन ही मन पति से विनती करती कि मैंने आपका कोई अपराध नहीं किया; उसका एक-एक दिन एक वर्ष के समान बीतता। परिवार के लोग दुखी होकर सोचते कि पूर्वजन्म में इसने किसी के सुख में अंतराय किया होगा, उसी का फल है और वायुकुमार तो निमित्त मात्र है।
इधर अभिमानी राजा वरुण ने रावण की आज्ञा मानने से इनकार किया और दूत से हँसकर कहा कि मैं इन्द्र, वैश्रवण, यम, सहस्ररश्मि या मरुत नहीं हूँ, रावण को देवों के शस्त्रों से गर्व हुआ है, सामर्थ्य हो तो आए। रावण ने समुद्र समान सेना से वरुण का नगर घेरकर प्रतिज्ञा की कि देवोपनीत शस्त्रों के बिना ही उसे वश करूँगा, मारूँगा या बाँधूँगा; पर घोर युद्ध में वरुण के राजीव, पुंडरीक आदि पुत्रों ने खरदूषण को जीवित पकड़ लिया, तब खरदूषण के मरण की आशंका से रावण ने युद्ध रोक दिया और मंत्रियों की सलाह से सब देशों के राजाओं को बुलावा भेजा।
आदित्यनगर के राजा प्रह्लाद के पास पत्र आया, जिसमें पातालपुर के समीप ठहरे, सुमाली के पुत्र रत्नश्रवा के पुत्र रावण ने लिखा था कि पातालनगर निवासी दुर्बुद्धि वरुण ने हमारी आज्ञा का विरोध किया है और उसके पुत्रों ने खरदूषण को जीवित पकड़ लिया है, अतः शीघ्र आओ; प्रह्लाद ने दूतों का सम्मान कर पत्र माथे से लगाया और मंत्रियों से सलाह कर चलने को तैयार हुए।
पवनंजय ने धरती पर मस्तक रखकर विनती की कि मेरे रहते आपका जाना उचित नहीं, पुत्र का धर्म पिता की सेवा है; पिता ने कहा कि तुम अभी बालक हो, युद्ध नहीं देखा, तब उसने कहा कि अग्नि की एक चिनगारी पूरे वन को जला देती है और आपके आशीर्वाद से मैं इन्द्र को भी जीत सकता हूँ। माता-पिता ने अमंगल के भय से आँसू रोककर, मस्तक चूमकर उसे विजय का आशीर्वाद दिया।
दायाँ पैर आगे रखकर चलते समय विजयसूचक दाहिनी भुजा फड़की और उसकी दृष्टि द्वार पर खंभे से लगी, लाल वस्त्र पहने, मंगल कलश लिए, आँसू भरी आँखों से आशीर्वाद की आशा करती अंजना पर पड़ी। उसने क्रोध से कहा कि हे दुरीक्षणे, तेरा दर्शन दुखदायी है, यहाँ से हट; और जब अंजना ने कहा कि आपके त्यागने पर मेरा मरण ही शरण है, तो उसने कहा ‘मर’, और उसे मूर्च्छित अवस्था में धरती पर छोड़कर चला गया।
हाथी पर चढ़कर सामंतों सहित चलकर वह पहले ही दिन मानसरोवर पहुँचा, विद्या के बल से वहाँ एक ऊँचा महल बनाया और उसकी खिड़कियों से सूर्यास्त के समय अपने चकवे से बिछुड़ी एक चकवी को देखा, जो जल में अपनी छाया को पति समझकर पुकारती, वृक्ष पर चढ़कर दसों दिशाएँ देखती और निराश होकर धरती पर गिर पड़ती थी।
करुणा से भरकर और आसपास अपने विवाह के स्थान देखकर उसे घोर पश्चाताप हुआ कि यह चकवी एक रात का वियोग नहीं सह सकती, तो मेरी निर्दोष रानी ने बाईस वर्ष का वियोग कैसे सहा होगा, जबकि कटु वचन तो दासी ने कहे थे। उसे डर हुआ कि बिना मिले युद्ध में गया तो वह सती जीवित नहीं रहेगी और उसके मरने से मेरा भी मरण होगा, अतः उसने प्रहस्त से सब कह दिया।
माता-पिता से विदा लेकर खुले रूप से लौटना लज्जा की बात थी, इसलिए प्रहस्त ने गुप्त रूप से जाकर शीघ्र लौटने की सलाह दी; पवनंजय मुद्गर नामक सेनापति को कटक की रक्षा सौंपकर, मेरु वंदना का बहाना कर, प्रहस्त सहित रात में आकाशमार्ग से अंजना के महल पहुँचा, जहाँ वसंतमाला को जगाकर प्रहस्त ने उसके आने का समाचार दिया, पर अंजना को यह स्वप्न जैसा लगा और उसने समझा कि प्रहस्त हँसी कर रहा है।
आनंद के आँसुओं के साथ पवनंजय भीतर आया; अंजना उसके चरणों में गिरी, उसने उसे उठाकर सेज पर बैठाया और दूसरे के दोष से उसे दोष देने के लिए बार-बार क्षमा माँगी, तो अंजना ने कहा कि आपका अनादर भी मुझे आदर समान लगा। दोनों ने अति स्नेह से वह रात साथ बिताई।
प्रातः प्रहस्त ने उसे जगाकर कहा कि किसी के जानने से पहले कटक में पहुँचना है, रथनूपुर का धनी और किन्नरगीत नगर का स्वामी रावण के पास जाने के लिए आपकी प्रतीक्षा कर रहा है और रावण बार-बार आपके डेरों के विषय में पूछते हैं। अंजना ने कहा कि मेरा ऋतुकाल है, गर्भ अवश्य रहेगा, अतः माता-पिता को बताकर जाइए; पर लज्जा के कारण पवनंजय ने कहा कि गर्भ प्रकट होने से पहले ही लौट आऊँगा, और प्रमाण के लिए अपने नाम की मुद्रिका और हाथों के कड़े उसे दे दिए।
वसंतमाला को अंजना की भली प्रकार सेवा करने की आज्ञा देकर वह प्रहस्त सहित विमान से चला गया और अंजना ने अमंगल के भय से आँसू नहीं बहाए; गौतम स्वामी ने श्रेणिक से कहा कि सुख और दुख दोनों नाशवान हैं, केवल जिनेन्द्र का कहा धर्म ही मोह के अंधकार को नष्ट करता है।