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पर्व 105

अग्नि का सरोवर बनना और राम का केवली के मुख से धर्मश्रवण

सीता के शील के प्रभाव से धधकता अग्निकुंड कमलों से भरा सरोवर बन जाता है; फिर वे आर्यिका दीक्षा लेती हैं और राम सकलभूषण केवली से धर्मोपदेश सुनते हैं।

कथा खंड लवण-अंकुश और अग्नि-परीक्षा

सारांश

शोक से व्याकुल राम देखते हैं कि सीता तीर्थंकरों की स्तुति कर, सब जीवों से क्षमा माँगकर और यह शपथ लेकर कि उन्होंने राम के सिवा किसी पुरुष की कभी इच्छा नहीं की, प्रज्वलित कुंड में प्रवेश करती हैं। अग्नि शीतल कमल-सरोवर बन जाती है, जिसका जल लोगों के सिर तक चढ़कर उनकी पुकार पर सीता की दया से रुकता है, और देव उन्हें कमल पर बने सिंहासन पर बिठाकर पुष्पवृष्टि और जय-जयकार करते हैं। राम क्षमा माँगते हैं, पर अपने ही पूर्व कर्मों को दोष देती सीता केशलोंच कर पृथ्वीमती आर्यिका से दीक्षा ले लेती हैं, जबकि राम मूर्च्छित पड़े रहते हैं। पहले देवों पर क्रोधित राम सकलभूषण केवली के सामने शांत होकर आत्मा, नरक, लोक-रचना, सिद्धों के सुख और रत्नत्रय मार्ग पर विस्तृत उपदेश सुनते हैं, और केवली बताते हैं कि वे इसी भव में केवलज्ञान पाएँगे।

क्या हुआ

12 बिंदु

  1. अग्निकुंड को देखकर राम दुख से व्याकुल होकर सोचते हैं कि महागुणों की खान, शीलरूपी वस्त्रों से मंडित और व्रतरूपी मालती की माला-सी सुगंधित कोमल सीता अग्नि के स्पर्श मात्र से भस्म हो जाएगी; अच्छा होता कि यह राजा जनक के घर जन्म ही न लेती। वे जानते हैं कि यह परम श्राविका इहलोक, परलोक, मरण, वेदना, अकस्मात, अरक्षा और चोर इन सात भयों से रहित दृढ़ सम्यग्दृष्टि है और अवश्य प्रवेश करेगी; सबके और सिद्धार्थ क्षुल्लक के बार-बार कहने पर भी उन्होंने नहीं माना, और अब सब चुप हैं तो किस बहाने से उसे रोकें। वे सोचते हैं कि उनके मन की बात जानने वाली एक जानकी ही थी, जिसने इतना कठोर दंड पाकर भी कभी आक्रोश नहीं किया, और अब वही लोकापवाद और वियोग के दुख से अग्नि में प्रवेश कर मर जाएगी।

  2. भयंकर ज्वालाएँ उठती हैं, सब नर-नारियों की आँखों से आँसुओं की धारा बहती है, धुएँ से आकाश ऐसा काला हो जाता है मानो बादल छा गए हों और सूर्य ढक जाता है, मानो सीता का उपसर्ग न देख सकने के कारण दया से छिप गया हो, और चिनगारियों से दसों दिशाएँ प्रलयकाल की संध्या-सी सुनहरी हो जाती हैं। तब सीता अत्यंत निश्चल मन से उठकर कायोत्सर्ग करती हैं, हृदय में ऋषभ आदि चौबीस तीर्थंकरों की स्तुति कर पंचपरमेष्ठी को नमस्कार करती हैं, जिनके तीर्थकाल में उनका जन्म हुआ उन हरिवंश के तिलक बीसवें तीर्थंकर मुनिसुव्रतनाथ का ध्यान करती हैं, और एकेन्द्रिय से पंचेन्द्रिय तक सब जीवों से, राम आदि सब राजाओं से और प्रजा के सब लोगों से क्षमाभाव करती हैं। वे कहती हैं कि मन, वचन, काय से, स्वप्न में भी, उन्होंने राम के सिवा किसी अन्य पुरुष की इच्छा नहीं की; यदि वे झूठ बोलती हों या मिथ्यादृष्टि पापिनी व्यभिचारिणी हों तो ये ज्वालाएँ उन्हें क्षणमात्र में भस्म कर दें, और यदि वे अणुव्रतधारी महासती श्राविका हों तो न जलाएँ। णमोकार मंत्र का जाप करती हुई सीता अग्निकुंड में प्रवेश करती हैं।

  3. सीता के शीलव्रत के प्रभाव से अग्नि स्फटिक मणि जैसा निर्मल शीतल जल बन जाती है, मानो धरती फोड़कर पाताल से गंगा-सा सरोवर निकल आया हो; ईंधन और चिनगारियाँ नष्ट हो जाती हैं, कमल खिलते हैं और भौंरे गूँजते हैं। पर जल में नदी जैसे झाग और गहरे भयंकर भँवर उठते हैं, मृदंग जैसी ध्वनि होती है, और जल उछलकर पहले घुटनों तक, फिर कमर तक, क्षण भर में छाती तक, फिर कंठ तक और अंत में सिर के ऊपर आ जाता है, जिससे भूमिगोचरी और विमानों में बैठे विद्याधर भी भयभीत हो जाते हैं। लोग बच्चों को ऊपर उठाकर पुकारते हैं, ‘हे देवी, हे लक्ष्मी, हे सरस्वती, हे मुनि समान निर्मल मन वाली माता, दया करो, बचाओ’, और तब महासती की दया से जल रुक जाता है और सबकी रक्षा होती है।

  4. जल सौम्य हो जाता है, जगह-जगह अनेक जाति के कमल खिलते हैं, और कुंडरूपी वधू अपनी तरंगरूपी हाथों से माता के कोमल चरणों का स्पर्श करती है, जबकि हंस और चकवे मधुर शब्द करते हैं और मणि तथा स्वर्ण की सीढ़ियाँ और मरकत मणि के तट बन जाते हैं। सरोवर के बीच एक सहस्रदल कमल पर देव चंद्रमंडल-सा निर्मल रत्नजड़ित सिंहासन रचते हैं, जिस पर देवांगनाएँ सीता को विराजमान कर उनकी सेवा करती हैं, और संसार के क्षणभंगुर सुखों का चिंतन करती सीता शची के समान अनुपम दिखती हैं। देव कल्पवृक्षों के पुष्प बरसाते हैं, दुंदुभी, मृदंग, वीणा, शंख, झाँझ आदि देवोपनीत बाजे बजते हैं, विद्याधर नृत्य करते हैं, और देव राजा जनक की पुत्री और बलदेव राम की महारानी की जय-जयकार करते हुए उनके अटूट शील, गंभीरता, धैर्य, प्रशम, संवेग, आस्तिक्य और अनुकंपा को धन्य कहते हैं।

  5. लवण और अंकुश जल में तैरकर माता के पास आते हैं, दोनों ओर खड़े होकर नमस्कार करते हैं, और माता उनके सिर पर हाथ रखती हैं। अग्नि में तपकर शुद्ध हुई स्वर्ण-प्रतिमा-सी और कमलवासिनी लक्ष्मी-सी मैथिली को देखकर राम महाअनुराग से उनके पास जाते हैं और क्षमा माँगते हैं कि उन्होंने लोकापवाद के भय से अज्ञानी होकर उन्हें कष्ट दिया और अब कभी ऐसा कार्य नहीं करेंगे जिससे उन्हें दुख हो। वे कहते हैं कि सीता उनकी आठ हजार रानियों की शिरोमणि होंगी, उनकी हर इच्छा तत्काल पूरी होगी, और वे साथ-साथ पृथ्वी पर विहार करेंगे तथा पुष्पक विमान में बैठकर सुमेरु और अढ़ाई द्वीप के कृत्रिम-अकृत्रिम चैत्यालयों में जिनेन्द्र के दर्शन-पूजन करेंगे।

  6. जानकी कहती हैं कि हे राजन, न आपका दोष है न प्रजा का, यह दुख मेरे ही पूर्वोपार्जित अशुभ कर्म के उदय से हुआ है, मेरा किसी पर क्रोध नहीं, और आपके प्रसाद से मैंने आपके यहाँ स्वर्ग जैसे सुख भोगे हैं। अब इच्छा है कि ऐसा उपाय करूँ जिससे स्त्रीलिंग का छेद हो और फिर किसी गति में स्त्री-पर्याय न धारण करनी पड़े, क्योंकि ये क्षणभंगुर इन्द्रिय-भोग नरक-निगोद में ले जाने वाले हैं और चौरासी लाख योनियों में अनंत जन्मों तक मैंने दुख ही दुख भोगा है। हँस-हँसकर बाँधे कर्म रो-रोकर भोगने पड़ते हैं, और पुत्र, पति, परिवार सब अपने-अपने स्वार्थ के हैं, इसलिए मैं जिन-आज्ञा के अनुसार आर्यिका दीक्षा लूँगी, और यदि हास्य-विनोद में भी मन, वचन, काय से आपका अविनय हुआ हो तो क्षमा करना।

  7. नए अशोक के पत्तों जैसे कोमल हाथों से वे अपने सिर के इन्द्रनील मणि-से श्याम, चिकने, पतले, घुँघराले और लंबे केश उखाड़कर राम के सामने डाल देती हैं, जिन्हें देखकर राम मोहित होकर मूर्च्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं। जब तक सब लोग राम की मूर्च्छा दूर करने में लगे रहते हैं, तब तक अग्नि में तपकर शुद्ध हुई सीता पृथ्वीमती आर्यिका के पास जाकर परम वैराग्य से आर्यिका दीक्षा धारण कर लेती हैं; एक साड़ी मात्र परिग्रह रखकर शेष सब त्याग देती हैं और आर्यिका के व्रतों से सुशोभित होकर जगत में पूज्य हो जाती हैं।

  8. मोती-जल और मलयागिरि चंदन के छींटों तथा ताड़ के पंखों की हवा से सचेत होकर राम दसों दिशाओं में देखते हैं और सीता को न पाकर उनका हृदय शून्य हो जाता है; वे छत्र और चँवर सहित हाथी पर बैठकर, देवों सहित इन्द्र की तरह अनेक राजाओं के साथ सीता की ओर चलते हैं और क्रोध से कहते हैं कि प्रियजनों का मरण अच्छा पर वियोग अच्छा नहीं, देवों ने सीता की रक्षा की यह अच्छा किया पर उसे मुझसे छुड़ाया यह अच्छा नहीं किया, और यदि देव मेरी रानी नहीं लौटाएँगे तो मेरा उनसे युद्ध होगा। लक्ष्मण के समझाने पर भी उनका समाधान नहीं होता, पर दूर से सकलभूषण केवली की गंधकुटी देखते ही, जहाँ अनेक सूर्यों को जीतने वाली ज्योति वाले केवली की इन्द्र आदि देव सेवा कर रहे हैं और दिव्यध्वनि खिर रही है, राम शांतचित्त होकर हाथी से उतरते हैं, तीन प्रदक्षिणा देकर हाथ जोड़ नमस्कार करते हैं और मनुष्यों की सभा में बैठते हैं। सभा में केवली के निकट राम सुमेरु के पास कल्पवृक्ष-से, मुकुट-कुंडल-हार पहने लक्ष्मण बिजली सहित श्याम घटा-से, शत्रुघ्न कुबेर-से, लवण-अंकुश चंद्र-सूर्य-से, और आभूषण-रहित एक साड़ी मात्र परिग्रह वाली आर्यिका सीता शांत हुई सूर्य की मूर्ति-सी लगती हैं।

  9. मुनियों में श्रेष्ठ अभयघोष मुनि केवली से पूछते हैं कि शुद्ध आत्मतत्व को जानने से केवलज्ञान कैसे होता है, और गौतम स्वामी श्रेणिक से कहते हैं कि समुद्र में से एक बूँद की तरह वे केवली के उपदेश का संक्षेप ही कहेंगे। केवली बताते हैं कि आत्मा अमूर्त, चैतन्यरूप, सम्यग्दर्शन-ज्ञान-आनंदमय है, जबकि पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल ज्ञेय मात्र हैं; अनंत अलोकाकाश के बीच छोटा-सा लोकाकाश है जिसमें तीन लोक हैं, और नीचे रत्नप्रभा से महातमःप्रभा तक सात नरक-पृथ्वियाँ हैं। किसी नरक में इतनी उष्णता है कि सुमेरु जितना लोहे का गोला पिघल जाए और किसी में इतनी शीत कि वह जमकर पर्वत बन जाए; वहाँ नारकी एक, तीन, सात, दस, सत्रह, बाईस और तैंतीस सागर तक की आयु पूरी करके ही मरते हैं, और उन्हें अग्निकुंडों और खारी वैतरणी नदी में डाला जाता है, तलवार जैसे पत्तों वाले सेमर वृक्ष काटते हैं, गरम तेल में पकाया जाता है और पिघला ताँबा पिलाया जाता है।

  10. जो हिंसा करते हैं, झूठ बोलते हैं, चोरी करते हैं, परस्त्री-सेवन करते हैं, परिग्रह और आरंभ में लगे हैं और इन्द्रिय-विषयों के लोलुप हैं, वे नरक में गिरते हैं, और तीसरे नरक तक असुरकुमार देव उन्हें याद दिलाकर दुखी करते हैं कि तुमने स्त्री और शस्त्र रखने वाले, मांस-मदिरा सेवी और पशु-नर यज्ञ करने वाले कुगुरु-कुदेवों की सेवा की, जो पत्थर की नाव के समान है; मधु-मांस और रात्रि-भोजन, विश्वासघात, कृतघ्नता, गाँव या वन जलाना, निर्दयता और माता-पिता-गुरुओं का अविनय सब नरक के कारण हैं। केवली छह काय के जीवों की रक्षा तथा छह द्रव्य, सात तत्व, नौ पदार्थ और पंचास्तिकाय की श्रद्धा का उपदेश देते हैं, और सप्तभंगी, निकट और दूर भव्य तथा अभव्य जीवों, चौरासी लाख योनियों और पाँच प्रकार के शरीरों का स्वरूप बताते हैं। फिर वे जंबूद्वीप और सुमेरु के चारों ओर असंख्यात द्वीप-समुद्रों वाले मध्यलोक का वर्णन करते हैं, जहाँ मनुष्य केवल अढ़ाई द्वीप में रहते हैं और धर्म तथा मोक्ष केवल कर्मभूमियों में हैं, और सोलह स्वर्ग, नवग्रैवेयक, नव अनुदिश और पाँच अनुत्तर विमानों वाले ऊर्ध्वलोक का, जिसके शिखर पर सिद्धलोक है जहाँ अनंत सिद्ध विराजते हैं।

  11. राम पूछते हैं कि आठों कर्मों से रहित सिद्धों का सुख कैसा है, और केवली बताते हैं कि तीनों लोकों में लेशमात्र भी सच्चा सुख नहीं, इन्द्र, धरणेन्द्र और चक्रवर्ती का इन्द्रिय-सुख भी शहद लिपटी तलवार की धार के समान है, जबकि शरीर, इन्द्रिय और मन से रहित सिद्धों को स्वाभाविक, अविनाशी, निराबाध आत्मसुख है। वे कहते हैं कि तीनों कालों के सब तीर्थंकरों, चक्रवर्तियों, इन्द्रों और अहमिन्द्रों का सुख एकत्र करके अनंत गुना कर दें, तो भी वह सिद्धों के एक समय के सुख के बराबर नहीं, जिसकी महिमा चार ज्ञान के धारी मुनि भी पूरी नहीं जानते। जब राम संसार-समुद्र से पार उतारने की प्रार्थना करते हैं, तो केवली सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र को मोक्षमार्ग बताते हुए शंका, कांक्षा, विचिकित्सा आदि सम्यक्त्व के पाँच अतिचार, मुनियों का चारित्र, और अणुव्रती श्रावकों का धर्म समझाते हैं, जो नवधा भक्ति से चतुर्विध संघ को आहार देते हैं।

  12. केवली कहते हैं कि जहाँ दया नहीं वहाँ धर्म नहीं: धर्म के नाम पर हिंसा करने वाले अधोगति के पात्र हैं, गाय-भैंस, धन या सुगंधित तेल-इत्र रखने वाले साधु साधु नहीं, और सम्यक्त्व के बिना मिथ्यादृष्टियों का कठोर तप या धर्म के बहाने अग्नि, जल अथवा पर्वत से गिरकर किया गया कुमरण किसी को मुक्त नहीं करता, जबकि सम्यग्दृष्टि जीव आठ मनुष्य और सात देव भव, इस प्रकार पंद्रह भवों में मोक्ष पा लेता है। राम हाथ जोड़ शीश झुकाकर कहते हैं कि वे सब रानियाँ और पृथ्वी का राज्य छोड़ सकते हैं, पर भाई लक्ष्मण का प्रेम नहीं छोड़ पाते, और प्रार्थना करते हैं कि केवली उन्हें इस स्नेह-समुद्र से निकालें। केवली कहते हैं कि शोक मत करो, तुम बलदेव हो, कुछ दिन वासुदेव भाई लक्ष्मण के साथ इन्द्र की तरह पृथ्वी का राज्य करो, फिर जिनेश्वर के व्रत धारण कर निश्चय ही केवलज्ञान पाओगे; यह सुनकर राम हर्ष से पुलकित हो उठते हैं, और उन्हें चरमशरीरी तद्भव-मोक्षगामी जानकर सुर, असुर, मनुष्य, इन्द्र और चक्रवर्ती सब उनकी प्रशंसा कर महाप्रेम से भक्ति करते हैं।