पर्व 104
अग्नि-परीक्षा का आदेश और सकलभूषण केवली के दर्शन को देवों का आगमन
सब देशों के लोगों के सामने लौटी सीता कोई भी शपथ लेने को तैयार होती हैं और राम उन्हें प्रज्वलित अग्निकुंड में प्रवेश का आदेश देते हैं, जबकि उसी रात सकलभूषण मुनि को केवलज्ञान होता है और देव अयोध्या की ओर उतर आते हैं।
कथा खंड लवण-अंकुश और अग्नि-परीक्षासारांश
विभीषण, सुग्रीव और हनुमान की विनती पर राम सीता को बुलाने को सहमत होते हैं, पर इस शर्त पर कि वे सब देशों के राजाओं और प्रजा के सामने शपथ से अपनी शुद्धता सिद्ध करें, और सब लोग अयोध्या आकर नगर के बाहर बने वस्त्रों के भवनों में ठहरते हैं। सीता पुष्पक विमान से पुंडरीकपुर से लौटती हैं, और राम के कठोर तिरस्कार पर वे छलपूर्वक वन में छोड़ने का उलाहना देकर विष पीने या अग्नि में प्रवेश करने को तैयार होती हैं; राम अग्निकुंड का आदेश देते हैं। सिद्धार्थ और रोती हुई प्रजा की प्रार्थना अनसुनी कर वे तीन सौ हाथ का चौकोर गड्ढा खुदवाकर उसे सूखी लकड़ी, चंदन और कृष्णागुरु से भरवाते और प्रज्वलित करवाते हैं। उसी रात अपनी पूर्व रानी किरणमंडला, जो अब विद्युद्वक्त्रा राक्षसी है, के उपसर्ग सहकर सकलभूषण मुनि केवलज्ञान पाते हैं, और उनकी वंदना को आते इन्द्र सीता की रक्षा के लिए मेघकेतु देव को भेजते हैं।
क्या हुआ
12 बिंदु
विभीषण, सुग्रीव और हनुमान राम से विनती करते हैं कि जानकी आपके बिना बहुत दुखी है, उन्हें बुलाने की आज्ञा दें; राम लंबी साँस लेकर कहते हैं कि वे सीता को शील-दोष से रहित और निर्मल मन वाली जानते हैं, पर लोकापवाद के कारण उन्हें निकाला गया था, इसलिए सब देशों के राजाओं, विद्याधरों और भूमिगोचरियों के सामने शपथ लेकर शुद्ध होकर वे उनके घर में ऐसे प्रवेश करें जैसे इन्द्राणी शची इन्द्र के घर में। सब देशों के राजा बालक, वृद्ध, स्त्रियों और परिवार सहित अयोध्या आते हैं, यहाँ तक कि वे स्त्रियाँ भी आती हैं जिन्होंने कभी सूर्य नहीं देखा था; विद्याधर विमानों से आकाश मार्ग से और भूमिगोचरी रथ, घोड़े और पालकी पर पृथ्वी मार्ग से आते हैं। राम की आज्ञा से अधिकारी नगर के बाहर खिड़कियों आदि सब सुख-साधनों वाले वस्त्रों के भवन बनाते हैं, जहाँ पुरुष पुरुषों के साथ और स्त्रियाँ स्त्रियों के साथ ठहरती हैं, और शपथ देखने को उत्सुक सब लोगों को राजदरबार से भोजन, वस्त्र, पान, सुपारी और आभूषण मिलते हैं।
राम की आज्ञा से भामंडल, विभीषण, हनुमान, सुग्रीव, विराधित, रत्नजटी आदि बड़े-बड़े राजा विमानों में बैठकर पलक झपकते पुंडरीकपुर पहुँचते हैं, सेना को नगर के बाहर छोड़कर जय-जयकार करते हुए जानकी के पास आते हैं और चरणों में पुष्प आदि भेंट चढ़ाकर प्रणाम करते हैं। आँसू बहाती सीता कहती हैं कि दुष्टों के अपवाद से उनका हृदय दावानल की तरह जल रहा है, जिसे क्षीरसागर का जल भी शीतल नहीं कर सकता। राजा कहते हैं कि जैसे कोई पृथ्वी को हिला नहीं सकता, अग्नि की शिखा नहीं पी सकता या सुमेरु नहीं उठा सकता, वैसे ही कोई उनके गुण-रत्नों के पर्वत को नहीं डिगा सकता, ऐसी महासती का अपवाद करने वालों की जीभ के हजार टुकड़े क्यों नहीं हो जाते, और भरतक्षेत्र में जो भी उनका अपवाद करेगा उसे वे दंड देंगे तथा उनके गुणों के अनुरागियों के महलों में रत्नवृष्टि करेंगे।
वे आग्रह करते हैं कि राम के भेजे पुष्पक विमान में प्रसन्न होकर बैठें, क्योंकि उनके बिना अयोध्या और राम का राजभवन चंद्रमा बिना आकाश और दीपक बिना मंदिर की तरह शोभाहीन है, और पतिव्रता पंडिता को पति की आज्ञा माननी ही चाहिए। सीता प्रमुख सहेलियों के साथ चलकर संध्या समय अयोध्या पहुँचती हैं और रात्रि महेन्द्रोदय उद्यान में बिताती हैं, जो पहले राम के साथ आने पर उन्हें मनोहर लगता था, पर अब राम के बिना अच्छा नहीं लगता। सूर्योदय होने पर वे हाथी पर बैठकर राम के पास चलती हैं; मन की उदासी से कांति मंद है, फिर भी निर्मल परिणामों वाली सीता सहेलियों के बीच ताराओं सहित चंद्रमा जैसी लगती हैं।
सभा के सब लोग विनय से उन्हें वंदन करते हैं, और राम समुद्र की तरह क्षुब्ध हो उठते हैं। जो प्रजा सीता के जाने से दुखी थी और कुमारों का प्रभाव देखकर चकित थी, वह उनके आने से हर्ष से फूली नहीं समाती और कहती है, ‘हे माता, सदा जयवंत रहो, फलो-फूलो’, तथा उनके रूप, धीरता, सत्य, ज्योति, निर्मलता और गंभीरता को धन्य कहती है। आकाश में विद्याधर और धरती पर भूमिगोचरी अपलक देखते हैं; कोई राम को ऐसे देखता है जैसे देव इन्द्र को, कोई राम के पास बैठे लवण-अंकुश को देखकर कहता है कि ये ठीक राम जैसे हैं, कोई लक्ष्मण, शत्रुघ्न, भामंडल, हनुमान, विभीषण, विराधित और सुग्रीव को देखता है, पर बार-बार सबकी दृष्टि सीता पर ही लौट आती है।
राम को देखकर जानकी सोचती हैं कि वियोग का अंतिम क्षण आ गया है; लक्ष्मण अर्घ देकर नमस्कार करते हैं और सब राजा प्रणाम करते हैं। पर जब वे शीघ्रता से पास आती हैं तो शांत स्वभाव के राम भी मन में क्रोधित होकर सोचते हैं कि जिसे मैंने विषम भयानक वन में छोड़ा था, वह कैसी ढीठ है कि फिर लौट आई और मुझसे अनुराग नहीं छोड़ती; उनकी उदासी जानकर सीता को लगता है कि उनका मनरूपी जहाज वियोगरूपी समुद्र के किनारे आकर फटना चाहता है, और वे व्याकुल होकर पैर के अँगूठे से धरती कुरेदने लगती हैं। राम कहते हैं कि मेरे सामने क्यों खड़ी है, दूर रह; मेरी आँखें मध्याह्न के सूर्य और आशीविष सर्प को देख सकती हैं पर तेरे शरीर को नहीं, और जो अनेक महीनों तक दशमुख के उद्यान में रही, उसे अपने महल में रखना कैसे उचित होगा।
जानकी उत्तर देती हैं कि आपका मन दया से रहित है; महापंडित होकर भी आपने अज्ञानी लोगों की तरह मेरा तिरस्कार किया, और जब मुझ गर्भवती को जिनदर्शन की अभिलाषा हुई तो कुटिलता से यात्रा का बहाना कर मुझे भयानक वन में छोड़ दिया, जहाँ मेरा कुमरण होता और मैं नरक या तिर्यंच आदि कुगति में जन्म लेती तो आपको क्या मिलता। वे कहती हैं कि यदि छोड़ना ही था तो किन्हीं आर्यिकाओं के पास छोड़ते, क्योंकि अनाथ, दीन, दरिद्र और कुटुंबहीन दुखियों का एकमात्र शरण जिनशासन ही है। फिर महावेदना से रोती हुई वे राम से प्रसन्न होने को कहती हैं और जो आज्ञा दें वही करने का वचन देती हैं।
राम उत्तर देते हैं कि वे जानते हैं कि सीता का शील निर्दोष है, वे निष्पाप, अणुव्रतों की धारी, सम्यग्दृष्टि, जिनशासन की ज्ञाता और आज्ञाकारिणी हैं, पर जगत के लोग कुटिल स्वभाव के हैं जिन्होंने बिना कारण अपवाद किया, इसलिए ऐसा कार्य करो जिससे उनका संदेह दूर हो। सीता कहती हैं कि जगत में जितने प्रकार की दिव्य शपथें हैं, सब करके लोगों का संदेह दूर करूँगी; विषों में महाविष कालकूट, जिसे सूँघकर आशीविष सर्प भी मर जाते हैं, उसे पी लूँ या भयंकर प्रज्वलित ज्वालाओं में प्रवेश करूँ, या जो और आज्ञा दें वही करूँ। एक क्षण विचार कर राम कहते हैं, ‘अग्निकुंड में प्रवेश करो’, और सीता अत्यंत हर्षित होकर प्रसन्न मुख से इसे स्वीकार कर लेती हैं।
नारद ऋषि मन में सोचते हैं कि यह महासती तो है, पर अग्नि का क्या भरोसा, इसने मृत्यु को चाहा है; भामंडल, हनुमान आदि बड़े राजा महाशोक से दुखी होते हैं, और माता का अग्नि-प्रवेश का निश्चय जानकर लवण-अंकुश व्याकुल हो जाते हैं। सिद्धार्थ क्षुल्लक दोनों भुजाएँ ऊँची करके राम से कहते हैं कि सीता के शील की महिमा देव भी नहीं कह सकते, मनुष्य क्या कहेंगे; सुमेरु पाताल में चला जाए, सारे समुद्र सूख जाएँ, चंद्रमा की किरणें उष्ण और सूर्य की शीतल हो जाएँ, तो भी सीता का शीलव्रत नहीं डिग सकता। वे कहते हैं कि विद्याबल से प्रतिदिन पंचमेरु और शाश्वत चैत्यालयों में जिनवंदना करते हुए उन्होंने जगह-जगह मुनियों के मुख से सीता के व्रत की महिमा सुनी है, इसलिए राम इस पतिव्रता को अग्नि-प्रवेश की आज्ञा न दें।
आकाश में विद्याधर, धरती पर भूमिगोचरी और सारी प्रजा मोटे-मोटे आँसू गिराती हुई राम से प्रसन्न होने, क्षमा और सौम्यता धारण करने और अग्नि-सा कठोर मन न करने की विनती करती है, क्योंकि महापुरुषों की रानियाँ कभी विकार को प्राप्त नहीं होतीं। राम कहते हैं कि यदि तुम ऐसे दयावान हो तो पहले अपवाद क्यों उठाया, और आज्ञा देते हैं कि तीन सौ हाथ का चौकोर गड्ढा खोदकर सूखी लकड़ी, चंदन और कृष्णागुरु से भरो और ज्वालाएँ प्रज्वलित कर साक्षात मृत्यु का कुंड तैयार करो, और सेवक कुदालों से खोदकर अग्निकुंड तैयार करते हैं।
उसी रात महेन्द्रोदय उद्यान में महारौद्र विद्युद्वक्त्रा राक्षसी पूर्व वैर के कारण सकलभूषण मुनिराज पर उपसर्ग करती है, जिसका कारण गौतम स्वामी राजा श्रेणिक को बताते हैं। विजयार्ध पर्वत की उत्तर श्रेणी में गुंज नगर के सिंहविक्रम के पुत्र सकलभूषण की आठ सौ रानियाँ थीं, जिनमें मुख्य किरणमंडला ने एक दिन सौत के कहने से अपने मामा के पुत्र हेमशिख का चित्र बनाया, जिससे सकलभूषण क्रोधित हुए पर अन्य रानियों के यह कहने पर शांत हुए कि चित्र उन्होंने बनवाया है, और बाद में पति के साथ सोते हुए नींद में किरणमंडला के मुँह से वही नाम निकल गया। वह निर्दोष थी, फिर भी रानी पर क्रोध करके सकलभूषण विरक्त हुए और मुनि-दीक्षा ले ली; किरणमंडला भी आर्यिका बनी, पर झूठा दोष लगाने के कारण पति से द्वेष रखती हुई मरकर विद्युद्वक्त्रा नाम की राक्षसी हुई।
उसी पुराने वैर से वह मुनि के आहार को जाते समय अंतराय करती: कभी हाथियों के बंधन तोड़कर गाँव में उपद्रव कराती, कभी आग लगा देती, कभी धूल बरसाती, कभी घोड़े या बैल का रूप बनाकर सामने आती और कभी रास्ते में काँटे बिखेर देती। एक बार जब वे कायोत्सर्ग मुद्रा में ध्यानस्थ खड़े थे, तब उसने चोर-चोर का शोर मचाया जिससे दुष्ट लोगों ने उन्हें पकड़कर अपमानित किया, और एक बार आहार करके लौटते मुनि के गले में किसी स्त्री का हार डालकर उन पर चोरी का आरोप लगाया, पर हर बार सज्जन और धर्मात्मा लोगों ने उन्हें छुड़ाया। बीती रात उसने व्यंतर, हाथी, सिंह, व्याघ्र, सर्प और रूपवती स्त्रियाँ दिखाकर अनेक रौद्र उपसर्ग किए, पर मुनि ध्यान में एकाग्र रहे और चार घातिया कर्मों का नाश कर केवलज्ञान को प्राप्त हुए।
इन्द्र आदि कल्पवासी, भवनवासी, व्यंतर और ज्योतिषी देव अपने-अपने वाहनों पर, जिनमें हाथी, घोड़े, सिंह आदि देवों की ही विक्रिया हैं, तिर्यंच नहीं, महाविभूति सहित आकाश मार्ग से महेन्द्रोदय उद्यान में विराजमान सकलभूषण केवली के दर्शन को अयोध्या की ओर आते हैं। सीता की शील-परीक्षा के लिए तैयार होते अग्निकुंड को देखकर मेघकेतु नाम का देव इन्द्र से पूछता है कि ऐसी पतिव्रता, शीलवती और निर्मल परिणामी धर्मात्मा श्राविका पर यह उपसर्ग क्यों हो रहा है, और इन्द्र उसे महासती का उपसर्ग दूर करने की आज्ञा देकर स्वयं केवली के दर्शन को जाते हैं। मेघकेतु अग्निकुंड के ऊपर आकाश में अपने विमान में बैठकर सबका मन हरने वाले महासुंदर राम की ओर देखता रहता है।