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पर्व 103

राम-लक्ष्मण से लवण-अंकुश का मिलन

जब लक्ष्मण का चक्र भी अंकुश के पास जाकर निष्प्रभ लौट आता है, तब सिद्धार्थ प्रकट करते हैं कि ये दोनों वीर सीता के पुत्र हैं, और पिता-पुत्रों का आनंदमय मिलन होता है।

कथा खंड लवण-अंकुश और अग्नि-परीक्षा

सारांश

युद्ध चलता रहता है, जिसमें लवण का रथ वज्रजंघ, अंकुश का रथ पृथु, लक्ष्मण का रथ विराधित और राम का रथ कृतांतवक्त्र हाँकता है, पर राम-लक्ष्मण के दिव्य शस्त्र उन जुड़वाँ भाइयों के आगे निष्फल हो जाते हैं, जो जान-बूझकर अपने पिता और चाचा को बचाते हुए लड़ते हैं। लक्ष्मण का चक्र अंकुश के पास जाकर बार-बार उनके हाथ में लौट आता है, और यह सोचकर कि कहीं नए बलभद्र-नारायण तो उत्पन्न नहीं हुए, लक्ष्मण लज्जित होकर शिथिल हो जाते हैं। नारद के कहने से सिद्धार्थ उन्हें बताते हैं कि ये कुमार सीता के पुत्र और उन्हीं के कुल के हैं, तब राम-लक्ष्मण शस्त्र डालकर कुमारों को हृदय से लगाते हैं और सीता के कष्टों पर रोते हैं। महाआनंद के बीच सीता पुंडरीकपुर लौट जाती हैं, और राम पुष्पक विमान में पुत्रों को सजी हुई अयोध्या में लाते हैं, जहाँ नगरवासी उन्हें देखने उमड़ पड़ते हैं।

क्या हुआ

11 बिंदु

  1. गौतम स्वामी राजा श्रेणिक को बताते हैं कि अनंगलवण के सारथी राजा वज्रजंघ और मदनांकुश के सारथी राजा पृथु हैं, जबकि लक्ष्मण का रथ विराधित और राम का रथ कृतांतवक्त्र हाँकता है। राम वज्रावर्त धनुष चढ़ाकर कृतांतवक्त्र से शत्रु की ओर शीघ्र रथ बढ़ाने को कहते हैं, पर सेनापति उत्तर देता है कि उस वीर के बाणों से जर्जर घोड़े निस्तेज हो गए हैं और रक्त की धाराओं से धरती रंग रहे हैं, और उसकी अपनी भुजाएँ छिद गई हैं तथा कवच टूट गया है।

  2. राम कहते हैं कि उनका धनुष भी चित्र में बने धनुष की तरह युद्ध-क्रिया से रहित हो गया है, और मूसल, हल आदि देवोपनीत अमोघ शस्त्र, जिनमें से प्रत्येक की एक-एक हजार देव रक्षा करते हैं, शिथिल और सामर्थ्यहीन हो गए हैं। गौतम स्वामी बताते हैं कि मदनांकुश के आगे लक्ष्मण के शस्त्र भी इसी प्रकार निष्फल हुए, क्योंकि दोनों भाई जानते हैं कि ये उनके पिता और चाचा हैं और उनके शरीर को बचाकर शस्त्र चलाते हैं, जबकि राम-लक्ष्मण उन्हें शत्रु मानकर लड़ते हैं।

  3. दिव्य अस्त्र निष्फल होने पर लक्ष्मण सेल, चक्र और खड्ग आदि साधारण शस्त्र चलाते हैं, पर अंकुश वज्रदंड से उन्हें रोक देता है और राम के चलाए आयुधों को लवण रोक लेता है। दोनों कुमार ऐसी निपुणता से प्रहार करते हैं कि शस्त्र मर्मस्थान पर नहीं लगते, फिर भी लक्ष्मण की आँखें फिर जाती हैं और विराधित रथ को अयोध्या की ओर मोड़ देता है। सचेत होकर लक्ष्मण उसे फटकारते हैं कि शूरवीर को शत्रु के सामने मरना चाहिए, रण में पीठ दिखाना मरने के समान है, और वे राजा दशरथ के पुत्र, राम के भाई और पृथ्वी पर प्रसिद्ध वासुदेव होकर संग्राम में पीठ कैसे दिखाएँ।

  4. विराधित रथ को फिर सामने ले आता है, और महायुद्ध में लक्ष्मण क्रोधित होकर अग्नि के स्फुलिंगों जैसा महाभयंकर चक्र अंकुश पर चलाते हैं; वह अंकुश के पास जाकर प्रभावहीन हो जाता है और लक्ष्मण के हाथ में लौट आता है, और हर बार चलाने पर फिर लौट आता है। अंकुश को धनुष लिए महातेजस्वी रूप में देखकर लक्ष्मण पक्ष के योद्धा चकित होकर सोचते हैं कि क्या कोई नया अर्धचक्री उत्पन्न हुआ है, जबकि कोटिशिला तो लक्ष्मण ने उठाई थी और मुनि के वचन तथा जिनशासन का कथन झूठा नहीं हो सकता। लक्ष्मण भी मन में सोचने लगते हैं कि ये ही बलभद्र-नारायण उत्पन्न हुए हैं, और अत्यंत लज्जित होकर युद्ध में शिथिल हो जाते हैं।

  5. लक्ष्मण को शिथिल देख नारद के कहने से सिद्धार्थ उनके पास आकर कहते हैं कि वासुदेव तुम ही हो, जिनशासन के वचन सुमेरु से भी अधिक अचल हैं और अरिहंत भगवान की वाणी कभी असत्य नहीं होती। वे बताते हैं कि ये दोनों राजकुमार महारानी जानकी के पुत्र हैं, जो जानकी को वन में छोड़ते समय गर्भ में थे; ये तुम्हारे ही कुल के पुत्र हैं, इसलिए इन पर चक्र आदि शस्त्र नहीं चलते।

  6. यह वृत्तांत सुनकर प्रसन्न लक्ष्मण हाथ के हथियार डाल देते हैं, कवच उतार फेंकते हैं और सीता के दुख से दुखी होकर रोने लगते हैं। राम भी शस्त्र डालकर कवच उतारते हुए पुत्र-मोह से मूर्च्छित हो जाते हैं और चंदन आदि के शीतल जल के छींटों से सचेत होते हैं। दोनों राजकुमार रथ से उतरकर हाथ जोड़ सिर झुकाकर पिता के चरणों में गिरते हैं, और पश्चाताप से भरे राम उन्हें हृदय से लगाकर मेघ की तरह आँसू बरसाते हैं।

  7. राम विलाप करते हैं कि मुझ मंदबुद्धि ने तुम्हारे गर्भ में रहते तुम्हारी माता सीता को भयंकर वन में अकेला छोड़ दिया; मैं जानता था कि वह निर्दोष है, फिर भी लोकापवाद से बचने और कुल, वंश तथा राज्य की रक्षा हेतु प्रजा का मुँह बंद करने के लिए मुझे ऐसा करना पड़ा। वे कहते हैं कि किसी महापुण्य से ही ऐसे बलवान, गुणवान और रूपवान पुत्र मिले, राजा वज्रजंघ वन में न आते तो वे उनके मुख-चंद्र कैसे देखते, पुण्य के उदय से देवों ने सहायता की कि वे अमोघ दिव्य शस्त्रों से नहीं मारे गए, और यदि वे उनके बाणों से रण में गिर जाते तो शोक से दुखी जानकी निश्चय ही जीवित न रहती।

  8. फिर दोनों राजकुमार चाचा लक्ष्मण को प्रणाम करते हैं, जो सीता के शोक से आँसू बहाते हुए उन्हें हृदय से लगाते हैं, और सीता के पुत्रों का नाम सुनकर शत्रुघ्न आदि भी पास आते हैं, जिससे दोनों सेनाओं के लोग प्रेम से परस्पर मिलते हैं। पुत्रों की महिमा और बल देखकर अत्यंत प्रसन्न सीता विमान से पुंडरीकपुर लौट जाती हैं। भामंडल विमान से उतरकर झरनों की तरह आँसू बहाते हुए भानजों से मिलते हैं, हनुमान बार-बार लवण-अंकुश से कहते हैं कि अच्छा हुआ, अच्छा हुआ, और विभीषण, सुग्रीव, विराधित आदि सब राजा वात्सल्य से कुशल-मंगल पूछते हैं, तथा वहाँ देवों का भी आगमन होता है।

  9. राम पुत्रों की प्राप्ति को सारी पृथ्वी के राज्य से भी अधिक मानते हैं; विद्याधरियाँ और अप्सराएँ आकाश में तथा भूमिगोचरियों की स्त्रियाँ धरती पर नृत्य करती हैं, और लक्ष्मण अपने को ऐसा कृतार्थ मानते हैं मानो तीनों लोक जीत लिए हों। राम मन में अपने को सगर चक्रवर्ती के समान और लवण-अंकुश को भीम तथा भगीरथ के समान मानते हैं, और राजा वज्रजंघ से अति प्रीति करके कहते हैं कि आप मेरे लिए भामंडल के समान हैं।

  10. स्वर्गपुरी जैसी अयोध्या राजकुमारों के आगमन पर विशेष रूप से सजाई जाती है, और राम, लक्ष्मण तथा दोनों कुमार सूर्य-सी ज्योति वाले पुष्पक विमान में बैठकर नगर के बाहर उद्यान के जिनमंदिर के दर्शन को जाते हैं; विमान मानो सुमेरु का शिखर है, लक्ष्मण महामेघ के समान और राम तथा उनके पुत्र बिजली के समान हैं। पीछे अनेक राजा हाथी, घोड़े, रथ पर और पैदल चलते हैं, और झरोखों तथा गलियों में स्त्रियाँ एक-दूसरे से सिर नीचा करने या बच्चे को ऊपर उठाने को कहती हैं; जब कोई पूछता है कि दोनों में लवण कौन और अंकुश कौन है, तो उत्तर मिलता है कि लाल वस्त्र वाले लवणकुमार हैं और हरे वस्त्र वाले अंकुशकुमार।

  11. नगरवासी सीता को धन्य कहते हैं जिसने ऐसे पुत्र जन्मे और जिसे ऐसे बलदेव पति मिले, किसी स्त्री का हार टूटकर मोती ऐसे बिखरते हैं मानो कुमारों पर पुष्पवृष्टि हो रही हो, और जगह-जगह कुमारों पर फूलों, रत्नों और स्वर्ण की वर्षा होती है। वन के चैत्यालयों में दर्शन करके राम पुत्रों सहित बड़ी धूमधाम से राजमहल लौटते हैं, और पर्व का उपदेश है कि पुण्य से ही पिता, पुत्र और परिवार का मिलन होता है।