पर्व 106
राम, लक्ष्मण, सीता, रावण और उनके साथियों के पूर्वभव
विभीषण के पूछने पर सकलभूषण केवली उन अनेक जन्मों का वृत्तांत सुनाते हैं जिन्होंने राम, लक्ष्मण, सीता, रावण और उनके साथियों को एक-दूसरे से बाँधा, और सीता-हरण, युद्ध तथा अपवाद की जड़ें प्रकट करते हैं।
कथा खंड लवण-अंकुश और अग्नि-परीक्षासारांश
विभीषण पूछते हैं कि राम को ऐसी महिमा क्यों मिली और ज्ञानी, महाबली रावण ने सीता का हरण कर लक्ष्मण के हाथों मृत्यु क्यों पाई। केवली बताते हैं कि व्यापारी के पुत्र धनदत्त और वसुदत्त, ब्राह्मण यज्ञबलि, कन्या गुणवती और उसका भाई गुणवान, तथा धनी श्रीकांत अनेक भवों के बाद राम, लक्ष्मण, विभीषण, सीता, भामंडल और रावण हुए, और णमोकार मंत्र सुनकर मरा एक बैल सुग्रीव हुआ। गुणवती के कारण वसुदत्त और श्रीकांत ने एक-दूसरे को मारा और पशु-योनियों की लंबी श्रृंखला में लड़ते रहे; रात्रि-भोजन के त्याग से धनदत्त स्वर्ग और राजपद की ऊँचाइयों तक पहुँचा, जबकि श्रीकांत के जीव ने शंभु बनकर श्रीभूति पुरोहित को मारा और उसकी पुत्री वेदवती से बलात्कार किया, जिसने उसकी मृत्यु का कारण बनने का संकल्प लिया। केवली बाली के पूर्वभव भी बताते हैं और समझाते हैं कि सीता का अपवाद एक मुनि की निंदा करने का फल था, और सारी सभा वैर छोड़कर केवली की स्तुति करती है।
क्या हुआ
12 बिंदु
विद्याधरों के स्वामी विभीषण, जिनका आभूषण राम की भक्ति ही है, हाथ जोड़कर केवली से पूछते हैं कि राम ने पूर्वभव में कौन-सा पुण्य किया जिससे ऐसी अद्भुत महिमा मिली, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के ज्ञाता और कृत्य-अकृत्य को जानने वाले रावण ने मोह के वश होकर दंडकवन से सीता का हरण क्यों किया, और विद्याधरों का ऐसा महेश्वर लक्ष्मण के हाथों संग्राम में कैसे मारा गया। केवली उत्तर देते हैं कि राम और लक्ष्मण अनेक भवों के भाई हैं, और रावण के जीव का लक्ष्मण के जीव से बहुत भवों से वैर चला आ रहा है।
जंबूद्वीप के भरतक्षेत्र के एक नगर में अल्प धन वाला नयदत्त व्यापारी और उसकी स्त्री सुनंदा रहते थे, जिनके पुत्र धनदत्त राम का जीव और वसुदत्त लक्ष्मण का जीव थे; वसुदत्त का मित्र यज्ञबलि ब्राह्मण विभीषण का जीव था। उसी नगर के सागरदत्त व्यापारी और उसकी स्त्री रत्नप्रभा की पुत्री गुणवती सीता का जीव और छोटा पुत्र गुणवान भामंडल का जीव था, जिसने पिता का अभिप्राय जानकर बहन की सगाई धनदत्त से की। पर उसी नगर का महाधनी व्यापारी श्रीकांत, जो रावण का जीव था, गुणवती से विवाह करना चाहता था, और लोभी गुणवान धनदत्त को अल्पधनी जानकर बहन का विवाह श्रीकांत से कराने को तैयार हो गया।
यज्ञबलि से यह समाचार सुनकर वसुदत्त रात के अँधेरे में काले वस्त्र पहन तलवार लेकर श्रीकांत के घर पहुँचा और असावधान बैठे श्रीकांत पर वार किया, पर मरते-मरते श्रीकांत ने भी उसे तलवार से मारा, और दोनों मरकर विंध्याचल के वन में हिरण हुए। नगर के दुर्जनों ने भाई के अपराध का बहाना लेकर गुणवती का विवाह धनदत्त से नहीं होने दिया, और भाई के मरण तथा अपने अपमान से दुखी धनदत्त घर छोड़कर विदेश चला गया, जबकि गुणवती ने किसी और से विवाह नहीं किया, मुनियों की निंदा करती रही और आर्तध्यान से मरकर उसी वन में हिरणी हुई। उसी के लिए दोनों हिरण लड़कर मरे, और फिर शूकर, हाथी, भैंसे, बैल, बंदर, गैंडे, सियार, कुत्ते, भेड़ आदि अनेक जलचर-थलचर योनियों में भी गुणवती का जीव उसी जाति की मादा होता रहा और वे दोनों उसी के कारण लड़-लड़कर मरते रहे।
मार्ग की थकान से दुखी और प्यासा धनदत्त सूर्यास्त के समय मुनियों के पास पहुँचा और पानी माँगा; मुनि मौन रहे, पर पास बैठे एक जिनधर्मी श्रावक ने मधुर वचनों से समझाया कि रात्रि में अमृत भी नहीं पीना चाहिए, जल की तो बात ही क्या, क्योंकि तब सूक्ष्म जीव भी नहीं दिखते, और धनदत्त रात्रि में अन्न-जल का त्याग कर अणुव्रती श्रावक बना तथा समाधिमरण कर प्रथम सौधर्म स्वर्ग में बड़ी ऋद्धि वाला देव हुआ। स्वर्ग से चयकर वह महापुर नगर में मेरु सेठ और उसकी स्त्री धारिणी का पुत्र पद्मरुचि हुआ, और एक दिन घोड़े पर जाते हुए एक मरते बैल को देखकर उसने घोड़े से उतरकर महादया से उसके कान में णमोकार मंत्र सुनाया। मंत्र सुनते-सुनते प्राण छोड़कर वह बैल पुत्रहीन राजा छत्रच्छाय की रानी श्रीदत्ता के गर्भ से वृषभध्वज नाम का राजकुमार हुआ, जिसे जातिस्मरण से बैल के भव के दुख याद थे, और युवा होने पर उसने बैल के मरण-स्थान पर कैलाश जैसा ऊँचा चैत्यालय बनवाया, उसके द्वार पर मरते बैल को णमोकार मंत्र सुनाते पुरुष का चित्र बनवाया और एक पहरेदार बिठाया कि जो कोई इसे ध्यान से देखे उसकी सूचना दे।
जब पद्मरुचि दर्शन करने आया और उस चित्र को देखता खड़ा रहा, तो पहरेदार ने राजकुमार को सूचना दी, जो महाऋद्धि सहित हाथी पर आया और जाना कि यही वह पुरुष है जिसने उसे मंत्र सुनाया था। वृषभध्वज उसके चरणों में गिर पड़ा और शिष्य जैसे गुरु की स्तुति करता है वैसे स्तुति करके कहा कि ऐसा उपकार माता-पिता और परिवार भी नहीं करते, णमोकार के समान तीनों लोकों में कोई मंत्र नहीं, यह सारा राज्य ले लो, मेरा शरीर तुम्हारी सेवा के लिए है। दोनों में महाप्रेम हुआ, दोनों सम्यग्दृष्टि श्रावक बनकर व्रत पालने लगे और जगह-जगह बड़े-बड़े चैत्यालय बनवाकर जिनबिंब विराजमान किए, और समाधिमरण कर दूसरे स्वर्ग में देव हुए; वह बैल का जीव आगे स्वर्ग और मनुष्य गति के सुख भोगकर कपिध्वज सुग्रीव हुआ।
पद्मरुचि का जीव फिर पश्चिम विदेह के विजयार्ध पर्वत पर नंद्यावर्त नगर में राजा नंदीश्वर और रानी कनकप्रभा का पुत्र नयनानंद हुआ, जिसने विद्याधरों के चक्रवर्ती की संपदा भोगी, फिर महामुनि बनकर घोर तप किया और चौथे स्वर्ग में देव हुआ। वहाँ से चयकर वह पूर्व विदेह की क्षेमपुरी नगरी में राजा विपुलवाहन और रानी पद्मावती का पुत्र श्रीचंद्र हुआ, जिसका राज्य और भंडार दिन-दिन बढ़ते गए और जिसने हजारों वर्ष समुद्र पर्यंत पृथ्वी पर राज्य किया। जब समाधिगुप्त मुनि महासंघ सहित पधारे, तो श्रीचंद्र ने सात कदम आगे जाकर नमस्कार किया और उनसे प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग, द्रव्यानुयोग इन चार अनुयोगों, आक्षेपणी आदि चार कथाओं और संसार की क्षणभंगुरता का उपदेश सुना, जो संध्या की लालिमा, जल के बुलबुले, बिजली और इंद्रधनुष के समान है।
उपदेश से वैराग्य पाकर श्रीचंद्र ने पुत्र ध्वजकांति को राज्य देकर समाधिगुप्त मुनि से मुनिदीक्षा ली; पाँच महाव्रत धारण किए, बाईस परीषह सहे, दो, तीन, पंद्रह दिन और महीने भर के उपवास किए, दिन में एक बार शुद्ध आहार लिया और बाल के अग्रभाग बराबर भी परिग्रह नहीं रखा। समाधिमरण कर वे पाँचवें स्वर्ग में इन्द्र हुए, जिनकी संपदा को सौधर्म इन्द्र भी देखते रह जाते थे, और वहाँ दस सागर तक सुख भोगे। केवली सार बताते हैं कि राम के जीव के नौ भव ये हैं: धनदत्त, पहले स्वर्ग का देव, पद्मरुचि सेठ, दूसरे स्वर्ग का देव, राजा नयनानंद, चौथे स्वर्ग का देव, राजा श्रीचंद्र, पाँचवें स्वर्ग का इन्द्र और नौवें भव में श्रीराम, जिनके आगे मोक्ष है।
श्रीकांत का जीव मृणालकुंड नगर में राजा विजयसेन और रानी रत्नचूला के पौत्र, वज्रकंबु और हेमवती के पुत्र शंभु के रूप में जन्मा, और वसुदत्त का जीव राजा का जिनधर्मी पुरोहित श्रीभूति हुआ, जिसकी स्त्री सरस्वती से वेदवती नाम की पुत्री हुई; यह गुणवती का जीव था, जो गंगा तट पर कीचड़ में फँसी मरणासन्न हथनी के रूप में दयालु तरंग विद्याधर से णमोकार मंत्र और कुछ नियम पाकर यहाँ जन्मी थी। श्रीभूति ने प्रतिज्ञा की थी कि मिथ्यादृष्टि कुबेर समान धनी भी हो तो उसे पुत्री नहीं दूँगा, इसलिए शंभु ने रात में पुरोहित को मार डाला, जो जिनधर्म के कारण स्वर्ग में देव हुआ, और फिर शंभु ने वेदवती से बलात्कार किया। क्रोध से काँपती वेदवती ने कहा कि मैं तेरे मरण का कारण बनूँगी, और हरिकांता आर्यिका से आर्यिका के व्रत लेकर घोर तप से शरीर सुखाकर समाधिमरण से पाँचवें स्वर्ग में जन्मी, जबकि निंदित शंभु धन और परिवार से रहित होकर साधुओं की हँसी उड़ाता, मद्य-मांस-मधु खाता हुआ नरक और तिर्यंच गतियों में भटका।
कुछ पाप कर्मों के शांत होने पर शंभु का जीव कुशध्वज ब्राह्मण और सावित्री का पुत्र प्रभासकुंद हुआ, जिसने विचित्र मुनि से दीक्षा लेकर घोर तप किया, पर बीस तीर्थंकरों की निर्वाणभूमि सम्मेद शिखर की वंदना को जाते समय आकाश में कनकप्रभ विद्याधर की विभूति देखकर निदान किया कि मेरे तप के प्रभाव से मुझे भी ऐसी विभूति मिले। केवली इस अज्ञान पर खेद करते हैं कि तपरूपी अमूल्य रत्न को भोगरूपी मुट्ठी भर साग के लिए बेच दिया; प्रभासकुंद तीसरे स्वर्ग में देव होकर रत्नश्रवा और केकसी का पुत्र रावण हुआ, जो भरतक्षेत्र के तीन खंडों का स्वामी बना। उधर श्रीभूति का जीव स्वर्ग से चयकर प्रतिष्ठित नगर में पुनर्वसु विद्याधर हुआ, उसने भी तप करके निदान किया, तीसरे स्वर्ग में देव हुआ और फिर लक्ष्मण बना, जिसने पूर्व वैर के कारण रावण को मारा, और इस तरह वेदवती का वचन सीता के माध्यम से सत्य हुआ।
केवली आगे के भव भी बताते हैं: लक्ष्मण तीसरे नरक, फिर कुटुंबी के पुत्र, देव, व्यापारी, भोगभूमि, देव और चक्रवर्ती के पुत्र के भवों के बाद पुष्करार्ध के विदेह में तीर्थंकर और चक्रवर्ती दोनों पदों के धारी होकर मोक्ष पाएँगे, और रावण भी तीसरे नरक की बालुका पृथ्वी और वैसे ही भवों के बाद भरतक्षेत्र में तीर्थंकर होकर मोक्ष जाएगा। सीता का जीव पाँचवें स्वर्ग की देवी अमृतवती और बलदेव की पटरानी सीता के बाद सोलहवें स्वर्ग में प्रतीन्द्र, फिर चक्रवर्ती और अहमिन्द्र होगा, और जब रावण का जीव तीर्थंकर होगा तब उसका प्रथम गणधर होकर मोक्ष पाएगा। गुणवान भामंडल हुआ जो विदेहा के गर्भ से सीता के साथ युगल जन्मा, यज्ञबलि विभीषण हुआ और बैल का जीव सुग्रीव, और इसी पूर्वभव के प्रेम से ये तीनों राम के मित्र हैं।
बाली के बारे में पूछने पर केवली बताते हैं कि वृंदावन में मरते समय स्वाध्याय करते साधुओं के शब्द सुनने वाला एक मृग ऐरावत क्षेत्र में दित्त नाम का जिनभक्त अणुव्रती पुत्र होकर दूसरे स्वर्ग में देव हुआ, और फिर पूर्व विदेह में विजयावती नगरी के पास मत्तकोकिल गाँव के स्वामी कांतिशोक और रत्नांगिनी का पुत्र स्वयंप्रभ हुआ। संयत नाम के मुनि बनकर उसने हजारों वर्ष तप किया, अनेक ऋद्धियाँ पाईं, उपशम श्रेणी चढ़कर पृथक्त्ववितर्क शुक्लध्यान के प्रभाव से सर्वार्थसिद्धि गया, और तैंतीस सागर अहमिन्द्र पद के सुख भोगकर राजा सूर्यरज का पुत्र बाली हुआ। जीवदया के कारण बाली ने रावण से युद्ध नहीं किया, सुग्रीव को राज्य देकर दिगंबर मुनि बने, और जब रावण ने कैलाश उठाना चाहा तो जिनमंदिरों और जीवों की रक्षा के लिए पैर का अँगूठा हल्का-सा दबाया; फिर गुरु से प्रायश्चित्त लेकर क्षपक श्रेणी चढ़े और कैलाश पर्वत से निर्वाण पाया।
केवली बताते हैं कि गुणवती के भव में सीता ने मुनियों की निंदा की थी, और वेदवती के भव में मंडलीक गाँव के वन में आए सुदर्शन मुनि को उनकी बहन सुदर्शना आर्यिका के पास बैठे देखकर गाँव वालों से कहा था कि मैंने मुनि को अकेली आर्यिका के पास बैठे देखा; मुनि ने नियम लिया कि अपवाद दूर होने पर ही आहार लेंगे, नगर के देवताओं ने वेदवती से सबके सामने कहलवाया कि यह अपवाद झूठा था और दोनों गृहस्थ जीवन के भाई-बहन हैं, और वेदवती ने मुनि के चरणों में बार-बार क्षमा माँगी, इसलिए उस निंदा से सीता का झूठा अपवाद हुआ और क्षमा माँगने से वह दूर भी हुआ। इसलिए किसी की निंदा न करें, सच्चा दोष भी मुँह से न कहें, दूसरों के दोष और अपने गुण ढकें तथा अपने दोष गुरु से कहें। यह सुनकर सभा के लोग वैर छोड़कर क्षमाभाव धारण करते हैं, अनेक राजा मुनि या अणुव्रती श्रावक बनते हैं, मिथ्यादृष्टि सम्यग्दृष्टि हो जाते हैं, सब विभीषण को धन्य कहते हैं जिनके निमित्त से यह कथा सुनी, और देवेन्द्र, नागेन्द्र, नरेन्द्र सकलभूषण केवली की स्तुति करते हैं कि तीनों लोकों के भूषण होने से आपका सकलभूषण नाम सत्य है।