पर्व 107
कृतांतवक्त्र सेनापति का वैराग्य
केवली का उपदेश सुनकर राम के सेनापति कृतांतवक्त्र मुनिदीक्षा लेते हैं, और आर्यिका सीता को शोकपूर्वक निहारकर राम पुत्रों सहित अयोध्या लौटते हैं।
कथा खंड लवण-अंकुश और अग्नि-परीक्षासारांश
संसार के दुखों से भयभीत सेनापति कृतांतवक्त्र राम से मुनि बनने की आज्ञा माँगते हैं, और राम मुनिचर्या की कठिनाइयाँ बताने के बाद इस वचन पर अनुमति देते हैं कि यदि वे देव बनें तो संकट के समय आकर राम को संबोधित करें। कृतांतवक्त्र आभूषण उतारकर सकलभूषण केवली के सामने दीक्षा लेते हैं, और अनेक राजा उनका अनुसरण करते हैं। फिर राम आर्यिका सीता के पास आते हैं और वन में उनके कष्टों की कल्पना से दुखी होते हैं, पर केवली के वचन याद कर उन्हें नमस्कार करते हैं और लक्ष्मण सहित उनकी स्तुति कर क्षमा माँगते हैं। दोनों भाई लवण-अंकुश को आगे करके अयोध्या में प्रवेश करते हैं, जबकि नगर की स्त्रियाँ राम के निर्णय और सीता के वैराग्य पर तरह-तरह की चर्चा करती हैं।
क्या हुआ
8 बिंदु
केवली के वचन सुनकर संसार-भ्रमण के महादुख से डरे राम के सेनापति कृतांतवक्त्र राम से विनती करते हैं कि मैं मिथ्यात्व के कारण अनादि काल से इस असार संसार में भटककर महादुखी हुआ, अब मुनिव्रत धारण करना चाहता हूँ। राम कहते हैं कि जिनदीक्षा अति कठिन है; जगत का स्नेह छोड़कर, कमल की कर्णिका-से कोमल शरीर वाला और कभी दुख न सहने वाला तू शीत, उष्ण, भूख, प्यास आदि बाईस परीषह, दुर्जनों के काँटों जैसे कटु वचन, कंकरीली भूमि पर शयन, गहन वन में रातें, पक्ष-मास के उपवास और दोष टालकर पराए घर में नीरस भोजन से पारणा कैसे करेगा, और जो महातेजस्वी शत्रु-सेना के शब्द तक सहन नहीं करता था, वह नीच पुरुषों के उपसर्ग कैसे सहेगा।
कृतांतवक्त्र उत्तर देते हैं कि जब मैं आपके स्नेहरूपी अमृत को ही छोड़ने में समर्थ हो गया हूँ तो और क्या कठिन है; मृत्युरूपी वज्र इस शरीर को छेदे उससे पहले मैं इस अंधकारमय, महादुखरूपी भव-वन से निकलना चाहता हूँ, और जलते घर से निकलने वाले को दयावान पुरुष नहीं रोकते। संसार के सुख क्षणभंगुर, असार और निंद्य हैं, इष्ट का वियोग अवश्य होगा और सब दुख इस शरीर के योग से हैं, इसलिए मैं ऐसा उपाय करूँगा कि यह शरीर फिर प्राप्त न हो।
राम की आँखों में आँसू आ जाते हैं और धीरे-धीरे मोह को दबाकर वे कहते हैं कि तू धन्य है जो मेरी जैसी विभूति छोड़कर संयम और तप के सम्मुख हुआ है; यदि इस जन्म में मोक्ष न हो और तू देव बने तो संकट के समय आकर मुझे संबोधित करना, और यदि मेरा उपकार मानता है तो देवगति में जाकर मुझे भूलना नहीं। कृतांतवक्त्र वचन देकर शरीर के सब आभूषण उतार फेंकते हैं और सकलभूषण केवली को प्रणाम कर अंतरंग-बहिरंग परिग्रह त्यागकर मुनिव्रत धारण करते हैं, और जो कृतांतवक्त्र थे वे सौम्यवक्त्र हो जाते हैं। उनके साथ अनेक महाराजा निर्ग्रंथ व्रत धारण करते हैं, कोई श्रावक के व्रत लेता है, किसी को सम्यक्त्व प्राप्त होता है, और सुर, असुर, मनुष्य अपनी शक्ति अनुसार व्रत लेकर केवली को नमस्कार कर अपने-अपने स्थान जाते हैं।
राम सकलभूषण स्वामी और सब साधुओं को नमस्कार कर महाविनय से आर्यिकाओं में शिरोमणि आर्यिका सीता के पास आते हैं, जो आर्यिकाओं के बीच ताराओं में चंद्रमा-सी बैठी हैं, घी की आहुति से प्रज्वलित अग्निशिखा की तरह तप के तेज से दीप्त हैं और पापों को जलाने में साक्षात अग्नि हैं। सब वस्त्राभूषण त्याग देने पर भी वे श्री, ह्री, धृति, कीर्ति, बुद्धि, लक्ष्मी और लज्जा की शिरोमणि हैं, और श्वेत वस्त्र में मंद पवन से उठती लहरों के फेन वाली पवित्र नदी या शरद पूर्णिमा की चाँदनी-सी, मानो जिनशासन की देवता ही हों। आश्चर्यचकित राम कल्पवृक्ष की तरह कुछ समय निश्चल खड़े उन्हें देखते रहते हैं, और आर्यिकाओं के पास वे शरद की मेघमाला के पास स्वर्ण-पर्वत-से सुंदर लगते हैं।
राम चिंता करते हैं कि मेघ की गर्जना से भी डरने वाली अति कायर स्वभाव की, नितंबों के भार से धीरे-धीरे चलने वाली कोमल सीता अब भयंकर वन में कैसे निर्भय रहेगी; मनचाहा आहार करने वाली अब यथालाभ भिक्षा से कैसे निर्वाह करेगी, स्वर्ग के विमान जैसे महलों में कोमल सेज पर बीन, बाँसुरी और मृदंग के मंगल शब्दों के बीच सोने वाली अब कंकर-पत्थरों और चींटी-मच्छरों के बीच रात कैसे बिताएगी, और डाभ की तीक्ष्णता तथा सिंह-व्याघ्र का भय कैसे सहेगी। वे पछताते हैं कि मैंने अज्ञानी मूढ़ लोगों के अपवाद के कारण ऐसी महासती, पतिव्रता, शीलवती और मधुरभाषिणी सुंदरी को घर से निकाल दिया।
फिर केवली के वचन याद कर राम संतोष और धैर्य धारण करते हैं, आँसू पोंछकर शोकरहित हो महाविनय से आर्यिका सीता को नमस्कार करते हैं, और दुखी मन वाले लक्ष्मण भी हाथ जोड़ नमस्कार कर राम के साथ उनकी स्तुति करते हैं। वे कहते हैं कि हे भगवती, तुम धन्य हो, पूज्य और वंदनीय हो; जैसे धरती सुमेरु को धारण करती है वैसे तुमने जिनराज का धर्म धारण किया, जिनवचनरूपी अमृत पीकर भवरोग दूर करोगी और सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्ररूपी जहाज में बैठकर संसार-समुद्र पार करोगी, तुमने दोनों कुलों को उज्ज्वल किया है, और अज्ञानवश हमसे जो कष्ट तुम्हें हुए उन्हें क्षमा करना।
दोनों भाई लवण-अंकुश को आगे करके अनेक विद्याधरों और बड़े राजाओं के साथ ऐसे अयोध्या में प्रवेश करते हैं जैसे देवों सहित इन्द्र अमरावती में, और सब रानियाँ अनेक प्रकार के वाहनों पर परिवार सहित पीछे आती हैं। महलों में बैठी स्त्रियाँ आपस में चर्चा करती हैं: कोई कहती है कि ऐसे शूरवीर और विवेकी राजा राम ने मूर्खों के अपवाद से ऐसी पतिव्रता पटरानी को अपने हाथों खो दिया, कोई कहती है कि निर्मल कुल के शूरवीर क्षत्रियों की यही रीति है कि कुल को कलंक न लगने दें, और सीता ने दिव्य अग्नि में सच्ची सिद्ध होकर लोगों का संदेह दूर किया और फिर दीक्षा ली; कोई कहती है कि जानकी बिना राम चाँदनी बिना चंद्रमा जैसे हैं, तो कोई कहती है कि राम की ज्योति पराधीन नहीं; कोई सीता के मन को वज्र जैसा कहती है जिसने ऐसे पति को छोड़ा, कोई उन्हें धन्य कहती है जिन्होंने गृहस्थी के कीचड़ को छोड़ आत्मकल्याण किया, और कोई पूछती है कि उन्होंने ऐसे पुत्रों को कैसे छोड़ा होगा, तो दूसरी उत्तर देती है कि ये कुमार परम प्रतापी हैं, इनका सहायक इनका पुण्य ही है, क्योंकि सब जीव अपने-अपने कर्मों के अधीन हैं।
लोग राम को देखते-देखते तृप्त नहीं होते, और लक्ष्मण को देखकर कहते हैं कि ये नरोत्तम नारायण हैं, चक्र के धारक और राज्यलक्ष्मी के स्वामी, जिन्होंने अपने प्रताप से पृथ्वी को वश किया और शत्रुओं की स्त्रियों को विधवा किया, फिर भी जो श्रीराम के आज्ञाकारी हैं। इस प्रकार प्रशंसा पाते हुए दोनों भाई ऐसे राजभवन में प्रवेश करते हैं जैसे इन्द्र स्वर्ग में, और पर्व कहता है कि जो बलदेव श्रीराम के चरित्र को पढ़ते, पढ़ाते, सुनते, सुनाते और हृदय में उतारते हैं, वे अविनाशी लक्ष्मी पाते हैं, और महासती सीता के कष्टों की कथा सुनकर संसारी जीवों में अपने कष्ट सहने की शक्ति जागती है।