पर्व 108
लवण-अंकुश के पूर्वभव
गौतम स्वामी श्रेणिक को बताते हैं कि लवण और अंकुश पूर्वभव में काकंदी के राजकुमार प्रियंकर और हितंकर थे, और उस भव की उनकी माता ही आगे उनका गुरु क्षुल्लक सिद्धार्थ बनी।
कथा खंड लवण-अंकुश और अग्नि-परीक्षासारांश
लवण और अंकुश ने माता का वियोग कैसे सहा होगा, यह सोचकर राजा श्रेणिक गौतम स्वामी से उनके पूर्वभव पूछते हैं। काकंदी में अपनी पत्नी विजयावती के भड़काने पर कुटिल मंत्री सर्वगुप्त ने राजा रतिवर्धन को सोते हुए जलाना चाहा, पर राजा गुप्त सुरंग से रानी सुदर्शना और पुत्रों प्रियंकर-हितंकर सहित निकल गए और काशी के स्वामिभक्त राजा कश्यप की सहायता से राज्य वापस पाया। रतिवर्धन मुनि बनकर राक्षसी बनी विजयावती के उपसर्गों के बीच केवलज्ञानी हुए, जबकि दोनों राजकुमार, जो उससे पहले सुदेव और वसुदेव नाम के ब्राह्मण भाई थे, ग्रैवेयक से चयकर लवण-अंकुश हुए। उनकी माता सुदर्शना अनेक भवों के बाद क्षुल्लक सिद्धार्थ बनी जिसने पूर्व स्नेह से उन्हें पढ़ाया, और गौतम स्वामी उपदेश देते हैं कि केवल धर्म का संबंध ही सच्चा है।
क्या हुआ
7 बिंदु
गौतम स्वामी के मुख से राम का चरित्र सुनकर राजा श्रेणिक सोचते हैं कि सीता ने जब लवण-अंकुश का मोह छोड़ा तो उन्होंने माता का वियोग कैसे सहा होगा, और जब ऐसे पराक्रमी, पुण्यशाली पुरुषों को भी इष्ट-वियोग और अनिष्ट-संयोग होता है तो दूसरों की क्या बात। वे गणधर से लवण-अंकुश का चरित्र पूछते हैं, और इन्द्रभूति गणधर काकंदी नगरी के राजा रतिवर्धन, रानी सुदर्शना और उनके दो पुत्रों, प्रियंकर और हितंकर, की कथा आरंभ करते हैं।
राज्य का भार संभालने वाला मंत्री सर्वगुप्त अन्यायी और स्वामीद्रोही था और राजा को मारने का उपाय सोचता था, और उसकी पापिनी स्त्री विजयावती राजा से भोग करना चाहती थी; परस्त्री-त्यागी शीलवान राजा उसके जाल में नहीं फँसे, तो उसने राजा से कहा कि मंत्री आपको मारना चाहता है, और राजा के न मानने पर अपने पति से कहा कि राजा तुम्हें मारकर मेरा हरण करना चाहते हैं। दुष्ट मंत्री ने सब रक्षक सामंतों को राजा से अलग कर रात में शयनकक्ष में आग लगा दी, पर सदा सावधान रतिवर्धन महल में बनवाई गुप्त सुरंग से रानी और दोनों पुत्रों सहित निकलकर अपने आज्ञाकारी सेवक, उग्रवंशी काशी नरेश कश्यप के नगर की ओर गुप्त रूप से चल पड़े।
राजा रतिवर्धन के सिंहासन पर बैठकर सर्वगुप्त ने कश्यप को दूत भेजकर आदेश दिया कि आकर मुझे प्रणाम करो और मेरी आज्ञा मानो, पर कश्यप ने कहा कि स्वामीद्रोही का नाम भी नहीं लेना चाहिए, फिर जिसने राजा, रानी और दोनों पुत्रों को आग में जलाकर स्वामीघात, स्त्रीघात और बालघात किया उसकी सेवा कैसे करूँ; मैं सबके सामने उसका सिर काटकर अपने स्वामी का बदला लूँगा। तब सर्वगुप्त अनेक राजाओं और महासेना के साथ आकर काशी को चारों ओर से घेर लेता है, फिर भी कश्यप संधि नहीं, युद्ध का ही निश्चय करते हैं।
रतिवर्धन रात में काशी के वन में पहुँचकर एक द्वारपाल को कश्यप के पास भेजते हैं, और कश्यप अत्यंत प्रसन्न होकर बार-बार कहते हैं, ‘महाराज कहाँ हैं, महाराज कहाँ हैं’, परिवार सहित जाकर राजा की आरती-पूजा करते हैं, चरणों में गिरते हैं और जय-जयकार के साथ उन्हें सजे हुए नगर में लाते हैं। फिर वे घेरा डाले सेना के सामंतों को कहलवाते हैं कि हमारे स्वामी जीवित हैं, स्वामीद्रोही से मिलकर स्वामी से लड़ना क्या उचित है, और सब योद्धा सर्वगुप्त को छोड़कर रतिवर्धन के पास आ जाते हैं, सर्वगुप्त युद्ध में पकड़ा जाता है, काकंदी का राज्य फिर रतिवर्धन को मिलता है, महाउत्सव होता है, और कश्यप का बहुत सम्मान कर उन्हें विदा किया जाता है, जो काशी में लोकपाल समान राज्य करते हैं।
लोकनिंदा से सर्वगुप्त मरे समान हो गया, कोई उसका मुख नहीं देखना चाहता था, तो उसने अपनी स्त्री विजयावती को दोष दिया कि इसी ने मेरे और राजा के मन में भेद डाला; यह सुनकर विजयावती पति से द्वेष करने लगी और यह सोचकर कि मैं न राजा की हुई न पति की रही, मिथ्या तप करके राक्षसी हुई। संसार, शरीर और भोगों से उदास होकर राजा रतिवर्धन ने सुभानु स्वामी के निकट मुनिव्रत धारण किया, और उस राक्षसी के उपसर्ग करने पर भी शुद्धोपयोग और शुक्लध्यान से केवलज्ञान प्राप्त किया।
प्रियंकर और हितंकर उससे पहले इसी नगर में दामदेव ब्राह्मण और उसकी स्त्री श्यामली के पुत्र सुदेव और वसुदेव थे, जिन्होंने अपनी स्त्रियों प्रियंगु और विश्वा सहित श्रीतिलक मुनि को आहारदान दिया; उस दान के प्रभाव से वे सब उत्तरकुरु भोगभूमि में जन्मे, तीन पल्य की आयु भोगकर दूसरे स्वर्ग में देव हुए। वहाँ से चयकर वे सम्यग्दर्शन-ज्ञान से मंडित प्रियंकर और हितंकर हुए, मुनि बनकर ग्रैवेयक गए, और वहाँ से चयकर तद्भव मोक्षगामी महाभव्य लवण और अंकुश हुए।
उस भव में उनकी माता रानी सुदर्शना को पुत्रों से महाअनुराग था; पति और पुत्रों के वियोग में आर्तध्यान से मरकर वह अनेक योनियों में भटकी, फिर किसी जन्म में पुण्य उपार्जित कर धर्मानुरागी और सब विद्याओं में दक्ष क्षुल्लक सिद्धार्थ हुई, जिसने पूर्वभव के स्नेह से लवण-अंकुश को पढ़ाया और ऐसी निपुण शिक्षा दी कि वे देवों से भी न जीते जा सकें। गौतम स्वामी श्रेणिक से कहते हैं कि यह संसार असार है, इस जीव के कौन-कौन माता-पिता नहीं हुए, संसार के सब संबंध झूठे हैं और एक धर्म का संबंध ही सच्चा है, इसलिए विवेकी जीवों को धर्म का ही प्रयत्न करना चाहिए और जिनराज का कहा तप धारण कर मुक्तिपुरी जाना चाहिए।