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पर्व 109

सीता का उग्र तप और राजा मधु का वैराग्य

बासठ वर्ष के उग्र तप के बाद आर्यिका सीता समाधिमरण कर अच्युत स्वर्ग में प्रतीन्द्र होती हैं, और गौतम स्वामी बताते हैं कि वहाँ का इन्द्र पूर्व में अयोध्या का राजा मधु था।

कथा खंड महान वैराग्य

सारांश

मुनिसुव्रतनाथ के तीर्थकाल में, जब राम के राज्य में अयोध्या जिनमार्ग पर चलती है, सीता उपवासों से शरीर को ऐसा क्षीण करती हैं कि पहचानी नहीं जातीं, आर्यिकाओं में शिरोमणि होती हैं, और बासठ वर्ष बाद समाधिमरण कर सोलहवें स्वर्ग में प्रतीन्द्र होती हैं। वहाँ का इन्द्र कौन था, यह पूछने पर गौतम स्वामी राजा मधु और उसके भाई कैटभ की कथा सुनाते हैं: पहले वे अभिमानी ब्राह्मण भाई अग्निभूति और वायुभूति थे, जिन्होंने सात्विक मुनि से जाना कि वे पूर्वभव में सियार थे, और मुनि को मारने चले तो यक्ष ने उन्हें कील दिया, फिर वे श्रावक बनकर अनेक भवों के बाद अयोध्या के राजा बने। मधु ने अपने सेवक वीरसेन की पत्नी चंद्राभा को रख लिया, पर परस्त्री-गमन के एक मुकदमे के बाद उसकी फटकार से लज्जित होकर वह चंद्राभा और कैटभ सहित संसार त्याग देता है। मधु अच्युतेन्द्र और कैटभ आरणेन्द्र हुए, और आगे कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न और शंबु होकर मोक्ष गए।

क्या हुआ

12 बिंदु

  1. गौतम स्वामी बताते हैं कि पति, पुत्र और राज्य-वैभव छोड़कर सीता ने कैसा तप किया: वह बीसवें तीर्थंकर मुनिसुव्रतनाथ का समय था, सकलभूषण केवली पृथ्वी पर विहार करते थे, अनेक जीवों ने महाव्रत और अणुव्रत धारण किए, और राम के राज्य में सारी अयोध्या जिनधर्म के अनुसार गृहस्थ धर्म का पालन करती थी तथा केवली की वाणी को ऐसे मानती थी जैसे राजा चक्रवर्ती की आज्ञा। रूप में देवांगनाओं को जीतने वाली सीता तप से जली हुई माधवी लता-सी हो गईं; बार-बार स्त्री-पर्याय की निंदा करती हुई, स्नान और शरीर-संस्कार से रहित, धूल से मलिन केशों और पसीने में चिपकी धूल से मलिन शरीर वाली होकर उन्होंने बेला, तेला, पक्ष और मास के उपवासों से शरीर को क्षीण किया और दोष टालकर शास्त्र के अनुसार ही पारणा की।

  2. मांस और रुधिर सूख जाने से उनके शरीर में हड्डियों और नसों का जाल काठ की पुतली की तरह दिखने लगा और वे सूखी नदी-सी लगने लगीं; वे चार हाथ धरती देखकर चलतीं, दयालु और शांत मुद्रा वाली थीं, और तप के साधन शरीर को टिकाए रखने के लिए ही विधिपूर्वक भिक्षा से आहार लेतीं, और उनका रूप-रंग ऐसा बदल गया कि अपना-पराया कोई उन्हें पहचान न पाता। सब आर्यिकाएँ कहतीं कि ऐसा तप किसी ने नहीं देखा, और सीता सब आर्यिकाओं में शिरोमणि हुईं; बासठ वर्ष तक महातप करके, आयु के तैंतीस दिन शेष रहने पर अनशन व्रत लेकर, परम आराधना सहित समाधिमरण कर सीता का जीव सोलहवें अच्युत स्वर्ग में प्रतीन्द्र हुआ। वहाँ मणियों से प्रकाशित, सुमेरु के शिखर-से ऊँचे विमान में हजारों देवांगनाओं के बीच वह प्रतीन्द्र ताराओं में चंद्रमा-सा शोभित हुआ, और मध्यलोक में आकर भगवान की पूजा, तीर्थयात्रा, साधु-सेवा और तीर्थंकरों के समवसरण में गणधरों के मुख से धर्मश्रवण करता रहा।

  3. श्रेणिक पूछते हैं कि उस समय वहाँ इन्द्र कौन था, और गौतम स्वामी बताते हैं कि वह राजा मधु का जीव था, जो भगवान नेमिनाथ के समय अच्युतेन्द्र पद से चयकर वासुदेव कृष्ण की रानी रुक्मिणी का पुत्र प्रद्युम्न हुआ, और मधु का भाई कैटभ कृष्ण की रानी जांबवती का पुत्र शंबु हुआ; वचनामृत से तृप्त न होते हुए श्रेणिक मधु और कैटभ का चरित्र पूछते हैं। धन-धान्य से भरे मगध देश में नगर-समान विशाल शाली गाँव में सोमदेव ब्राह्मण और उसकी स्त्री अग्निला रहते थे, जिनके पुत्र अग्निभूति और वायुभूति लौकिक शास्त्रों में प्रवीण थे, पर कुल और विद्या के अभिमान में सोचते थे कि उनसे बड़ा ज्ञानी कोई नहीं, जैनधर्म से रहित थे और इन्द्रिय-भोगों को अच्छा मानते थे।

  4. जब अवधिज्ञानी नंदिवर्धन आचार्य अनेक मुनियों सहित वन में पधारे और गाँव के लोग दर्शन को गए, तो दोनों भाई माता-पिता के मना करने पर भी क्रोध से वाद-विवाद में साधुओं को जीतने चल पड़े। अवधिज्ञानी सात्विक मुनि ने उन्हें रोका, और जब उन्होंने पूछा कि तू कहाँ से आया है, तो मुनि ने भी वही प्रश्न किया, फिर कहा कि मैं जानता हूँ तुम शाली गाँव से आए हो, सोमदेव-अग्निला के पुत्र अग्निभूति-वायुभूति हो, पर यह बताओ कि अनादि काल से भटकते हुए इस जन्म में किस गति से आए हो। जब उन्होंने कहा कि पूर्वभव की बात कौन जानता है, तो मुनि ने बताया कि तुम दोनों पूर्वभव में इसी गाँव के पास वन में सियार थे; एक किसान भूख से व्याकुल होकर सूर्यास्त के समय चमड़े की रस्सी आदि उपकरण खेत में छोड़कर घर चला गया, सात दिन तक लगातार घनघोर वर्षा होती रही, और भूखे सियारों ने अँधेरी रात में कीचड़ से सनी वह गीली रस्सी खा ली, पेट के भयंकर दर्द से मर गए, और अकाम निर्जरा से सोमदेव के पुत्र हुए।

  5. मुनि ने आगे बताया कि वह किसान बाद में अपने ही पुत्र का पुत्र होकर जन्मा, और जातिस्मरण होने से मौन रहने लगा, क्योंकि इस भव का पिता उसका पूर्वभव का पुत्र और माता पूर्वभव की पुत्रवधू थी; सभा में बैठे उस किसान के जीव से मुनि ने कहा कि पुत्र का पुत्र होना आश्चर्य नहीं, संसार नट की तरह अनेक रूप धरता है, राजा रंक और रंक राजा, पिता पुत्र और पुत्र पिता होता है, इसलिए मौन छोड़कर इस जन्म के पिता को पिता और माता को माता कहो। प्रसन्न होकर उस ब्राह्मण ने मुनि की तीन प्रदक्षिणा दी, हवा से गिरे पेड़ की तरह उनके चरणों में गिर पड़ा और परिवार छोड़कर मुनिदीक्षा ले ली, अनेक लोग मुनि या श्रावक बने, और लोग उन दोनों भाइयों के पूर्वभव के सियार-शरीरों की चमड़ी ले आए और हँसकर कहने लगे कि ये पूर्वभव में मांसभक्षी सियार थे और अब मूर्ख बनकर मुनियों से विवाद करने आए। लोगों ने मुनियों की स्तुति की कि क्षमारूपी यज्ञोपवीत पहनने वाले और ध्यानरूपी अग्नि में हवन करने वाले ये ही सच्चे ब्राह्मण हैं, और बताया कि इन्हें साधु, आचार्य, अनगार, भिक्षुक, श्रमण, मुनि और यति क्यों कहते हैं।

  6. मुनियों की निंदा करते हुए दोनों भाई घर गए और रात को तलवारें लेकर सात्विक मुनि को मारने वन में आए, जो संघ छोड़कर अकेले रीछ, व्याघ्र, सिंह, सर्प और भूत-पिशाचों से भरे भयंकर अँधेरे वन की श्मशान भूमि में जीव-जंतु रहित शुद्ध शिला पर कायोत्सर्ग में ध्यानस्थ खड़े थे। होंठ चबाते हुए वे बोले कि तब तो लोगों ने तुझे बचा लिया, अब कौन बचाएगा, हम पृथ्वी पर प्रसिद्ध पंडित और प्रत्यक्ष देवता हैं और तू निर्लज्ज हमें सियार कहता है; पर वन के रक्षक यक्ष ने देखा कि ये ऐसे निर्दोष ध्यानी साधु को मारने आए हैं, और उसने दोनों को कील दिया, जिससे वे जैसे के तैसे खड़े रह गए। सुबह लोगों ने उन्हें मुनि के दोनों ओर नंगी तलवारें लिए जड़वत खड़े देखा और धिक्कारा, और दोनों भाइयों ने सोचा कि यह धर्म का प्रभाव है, इस संकट से बचें तो श्रावक के व्रत धारण करेंगे।

  7. उनके माता-पिता आकर बार-बार मुनि को नमस्कार कर विनती करते हैं कि ये हमारे कपूत पुत्र हैं, आप दयालु हैं, इन्हें जीवनदान दें; मुनि कहते हैं कि हमारा किसी पर क्रोध नहीं, सब प्राणी हमारे मित्र हैं, पर यक्ष क्रोध से कहता है कि साधुओं की निंदा और उपसर्ग करने वाले दंड के पात्र हैं, जैसे स्वच्छ दर्पण में टेढ़ा मुँह करके देखने वाले को अपना ही मुँह टेढ़ा दिखता है, और विद्या के मान से गर्वित, मायाचारी, संयमियों के घातक इन दोनों को मैंने इनके दोषों के कारण कीला है। परम दयालु मुनि यक्ष से कहते हैं कि ये बालबुद्धि हैं, तुम जिनशासन के रक्षक हो, मेरे कहने से इन्हें क्षमा करो; यक्ष उन्हें छोड़ देता है, और दोनों भाई मुनि की प्रदक्षिणा देकर कहते हैं कि हम साधु-व्रत धारण करने में असमर्थ हैं, और सम्यक्त्व सहित श्रावक के व्रत लेते हैं। उनके माता-पिता ने व्रत लेकर छोड़ दिए और अव्रत के कारण मरकर पहले नरक में गए, जबकि दोनों भाई जिनश्रद्धा रखते हुए हिंसा त्यागकर समाधिमरण से पहले स्वर्ग में देव हुए।

  8. वहाँ से चयकर दोनों भाई अयोध्या में समुद्र सेठ और उसकी सेठानी धारिणी के पुत्र पूर्णभद्र और कांचनभद्र हुए, यहाँ भी श्रावक के व्रत धारण कर मरे और पहले स्वर्ग में गए। ब्राह्मण भव के उनके माता-पिता नरक से निकलकर चांडाल और कुत्ता हुए, और पूर्णभद्र-कांचनभद्र के उपदेश से जिनधर्म की आराधना कर समाधिमरण से सोमदेव का जीव चांडाल से नंदीश्वर द्वीप का अधिपति देव हुआ, और अग्निला का जीव कुत्ते से अयोध्या के राजा की पुत्री होकर उस देव के उपदेश से ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर आर्यिका बना और समाधिमरण से उत्तम गति को प्राप्त हुआ; ये दोनों परंपरा से मोक्ष जाएँगे।

  9. पहले स्वर्ग से चयकर पूर्णभद्र और कांचनभद्र अयोध्या के राजा हेम और रानी अमरावती के पुत्र मधु और कैटभ हुए, जो ऐसे महाबली थे कि सारी पृथ्वी को वश में कर लिया; केवल राजा भीम अपने बल के गर्व से उनकी आज्ञा नहीं मानता था, और जब वटपुर के स्वामी, उनके आज्ञाकारी सेवक राजा वीरसेन ने पत्र लिखा कि भीम ने मेरा देश नष्ट किया है, तो मधु क्रोधित होकर बड़ी सेना के साथ चल पड़ा। वटपुर में मूर्ख वीरसेन ने अपनी पत्नी के यह कहने पर भी कि घर की सुंदर वस्तु राजा को मत दिखाओ, अपनी रूपवती रानी चंद्राभा के हाथ से मधु की आरती कराई और भोजन परसवाया, और मधु मोहित होकर सोचने लगा कि इसके साथ वन में रहना अच्छा, पर इसके बिना पृथ्वी का राज्य भी अच्छा नहीं। मंत्रियों ने समझाया कि अभी यह बात करने से कार्य सिद्ध नहीं होगा और राज्य से भ्रष्ट होना पड़ेगा, इसलिए वह वीरसेन को साथ लेकर गया, भीम को युद्ध में जीता और अनेक राजाओं को वश में किया।

  10. अयोध्या लौटकर मधु ने वसंत ऋतु की क्रीड़ा के लिए सब राजाओं को रानियों सहित बुलाया, और वीरसेन को भी चंद्राभा सहित बुलाया, जिसने फिर कहा कि मुझे मत ले चलो, पर वह नहीं माना; एक महीने वन में क्रीड़ा के बाद मधु ने सब राजाओं को रानियों सहित सम्मान से विदा किया, और कुछ दिन बाद वीरसेन को अति सम्मान से विदा करते हुए कहा कि चंद्राभा के लिए अद्भुत आभूषण बन रहे हैं जो अभी तैयार नहीं हुए, इसलिए इन्हें बाद में भेजेंगे। भोला राजा उसकी माया नहीं समझ सका और रानी को छोड़कर घर चला गया, और मधु ने चंद्राभा को महल में बुलाकर सुंदर घड़ों के जल से अभिषेक कर पटरानी का पद दिया और भोगों में अंधा होकर अपने को इन्द्र समान मानने लगा। यह सुनकर वीरसेन पागल-सा इधर-उधर भटकता रहा और मंडव तापस का शिष्य बनकर पंचाग्नि तप करने लगा।

  11. एक दिन राजा मधु न्यायासन पर एक परस्त्री-रत का न्याय करने में देर से महल लौटा, और कारण जानकर चंद्राभा ने हँसी में कहा कि परस्त्री-सेवन करने वाले का तो बहुत सम्मान करना चाहिए; राजा ने क्रोध से कहा कि जो परस्त्री को छूते या उससे बात भी करते हैं वे पापी हैं, और जो उसका सेवन करते हैं उन्हें महादंड देकर नगर से निकालना चाहिए। चंद्राभा बोली कि यदि परदारा-सेवन महादोष है तो आप स्वयं को दंड क्यों नहीं देते, आप भी परस्त्री-सेवन करते हैं; जैसा राजा वैसी प्रजा, और जिस जल से बीज उगते और प्राणी जीते हैं वही जल जलाने लगे तो शीतल कौन करेगा। यह उलाहना सुनकर राजा ने कहा कि तुम सत्य कहती हो, बार-बार उसकी प्रशंसा की और कहा कि मैं पापी लक्ष्मी के गर्व से विषयरूपी कीचड़ में फँसा, अब इन दोषों से कैसे छूटूँ।

  12. उसी समय अयोध्या के सहस्राम्र वन में सिंहपाल मुनि महासंघ सहित पधारे, और रनिवास तथा प्रजा सहित दर्शन को गए राजा मधु ने तीन प्रदक्षिणा देकर धर्मोपदेश सुना और भोगों से विरक्त होकर मुनिपद धारण किया; अद्वितीय रूपवती रानी चंद्राभा सारा राज्य-वैभव छोड़कर दुर्गति के भय से आर्यिका बनी, कैटभ ने भी राज्य को नाशवान जानकर महाव्रत धारण किए, और मधु का पुत्र कुलवर्धन प्रजा का प्रिय होकर अयोध्या का राज्य करने लगा। सैकड़ों वर्ष व्रत पालकर और दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप इन चार आराधनाओं को आराधकर मधु मुनि समाधिमरण से सोलहवें अच्युत स्वर्ग में अच्युतेन्द्र हुए, जिनके निकट सीता का जीव प्रतीन्द्र हुआ, और कैटभ मुनि पंद्रहवें आरण स्वर्ग में आरणेन्द्र बने। गौतम स्वामी कहते हैं कि जिनशासन का प्रभाव देखो कि ऐसे अनाचारी जीव भी अनाचार छोड़कर इन्द्र पद और मोक्ष तक पाते हैं: मधु का जीव आगे श्रीकृष्ण की रानी रुक्मिणी का पुत्र कामदेव प्रद्युम्न होकर मोक्ष गया और कैटभ का जीव जांबवती का पुत्र शंबुकुमार होकर परमधाम को प्राप्त हुआ, और अब वे लक्ष्मण के आठ वीर पुत्रों का चरित्र सुनाने की बात कहते हैं।