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पर्व 110

लक्ष्मण के आठों कुमारों का वैराग्य

स्वयंवर में दो राजकुमारियों के लवण और अंकुश को वरने पर लक्ष्मण के आठ प्रमुख कुमार अपने क्रुद्ध भाइयों को शांत करते हैं, संसार से विरक्त होकर दीक्षा लेते हैं और अंततः निर्वाण पाते हैं।

कथा खंड महान वैराग्य

सारांश

कांचनस्थान के राजा कांचनरथ अपनी दो पुत्रियों के स्वयंवर में अयोध्या और विद्याधरों की दोनों श्रेणियों के राजकुमारों को बुलाते हैं, जहाँ मंदाकिनी लवण को और चन्द्रवक्त्रा अंकुश को वरमाला पहनाती है। सीता के पुत्रों को चुने जाने से लक्ष्मण के अन्य पुत्र क्रोधित होते हैं, पर आठ पटरानियों से जन्मे आठ बड़े कुमार उन्हें शांत करते हैं। विषयों की अभिलाषा को व्यर्थ जानकर ये आठों संसार छोड़ने का निश्चय करते हैं और लक्ष्मण के आँसू भरे आग्रह के बावजूद महेन्द्रोदय उद्यान में महाबल मुनि से दीक्षा लेते हैं। तप के द्वारा वे केवलज्ञान और फिर सिद्धपद प्राप्त करते हैं।

क्या हुआ

10 बिंदु

  1. कांचनस्थान नगर के राजा कांचनरथ और रानी शतह्रदा की दो रूपवती पुत्रियाँ हैं, जिनके स्वयंवर के लिए राजा अनेक राजाओं, विद्याधरों और भूमिगोचरियों को दूतों के हाथ पत्र भेजते हैं। सबसे पहले दूत अयोध्या जाकर राजकुमारों को शीघ्र भेजने की विनती करते हैं, और राम-लक्ष्मण प्रसन्न होकर सभी राजपुत्रों को महावैभव के साथ भेजते हैं।

  2. लवण-अंकुश को आगे कर परस्पर प्रेम से भरे सभी भाई अनेक विद्याधरों और बड़ी सेना के साथ विमानों में बैठकर आकाश मार्ग से कांचनपुर पहुँचते हैं, जहाँ दोनों श्रेणियों के विद्याधर राजकुमार भी बैठे हैं। मंगल स्नान कर आभूषण पहने राजकुमारियाँ मंदाकिनी और चन्द्रवक्त्रा साक्षात लक्ष्मी-सी रथ पर आती हैं, और साथ चलने वाला सेवक हर राजकुमार का देश, कुल, संपत्ति, गुण और वानर, सिंह, वृषभ, गज आदि ध्वजाएँ बताता है।

  3. सभी राजकुमार उन कन्याओं की अभिलाषा करते हैं, पर दोनों लवण-अंकुश को देखकर मोहित हो जाती हैं: मंदाकिनी लवण के गले में और चन्द्रवक्त्रा अंकुश के कंठ में वरमाला डालती है। श्रेष्ठ गुणवान राजकुमार इस चुनाव की प्रशंसा करते हैं कि इन कन्याओं ने रामचन्द्र के रूपवान, गुणवान पुत्रों को वरा, क्योंकि ये उन्हीं के योग्य हैं।

  4. विशल्या आदि आठ पटरानियों के आठ राजपुत्र अपने ढाई सौ भाइयों के साथ ऐसे प्रेम से रहते हैं जैसे तारों के बीच ग्रह। उन आठों को छोड़ शेष सभी भाई राम के पुत्रों पर क्रोधित होकर कहते हैं कि हम नारायण के कांतिमान, कलाओं में दक्ष पुत्रों में कौन-सा गुण कम है कि कन्याओं ने हमें छोड़ सीता के पुत्रों को माला पहनाई, और वे युद्ध की तैयारी कर रण के बाजे तक बजवाने लगते हैं।

  5. आठों बड़े भाई उन्हें ऐसे शांत करते हैं जैसे मंत्र से सर्प वश में किया जाता है। तब सब भाई विचार करते हैं कि इन कन्याओं ने हमारे ताऊ के पुत्रों, हमारे बड़े भाइयों को वरा है, अतः ये हमारी भाभियाँ और माता के समान हैं, और स्त्रियों के लिए विकार करना मूर्खता है; उनका क्रोध संतोष में बदल जाता है और वे लवण-अंकुश से प्रसन्न हो जाते हैं।

  6. इस घटना से आठों कुमारों के मन में वैराग्य जागता है; वे हँसकर कहते हैं कि रानी पा लेना कोई बड़ी बात नहीं, जिनेश्वरी दीक्षा लेने वाले ही महाधन्य हैं, क्योंकि काम-भोग केले के वृक्ष के समान असार हैं। कर्मभूमि, आर्यक्षेत्र, मनुष्य जन्म और उत्तम कुल पाकर इतने दिन व्यर्थ गँवाने का पछतावा करते हुए वे वीतराग धर्म धारण कर मनुष्य जीवन सफल करने का निश्चय करते हैं।

  7. उनमें से एक कुमार याद करता है कि बचपन में वह पिता की गोद में बैठा था जब पुरुषोत्तम लक्ष्मण सब राजाओं को वस्तु-स्वरूप का उपदेश दे रहे थे। चारों गतियों में मनुष्य गति दुर्लभ है; मिथ्यादृष्टि जीव दान से भोगभूमि जाता है, सम्यग्दृष्टि दान और तप से स्वर्ग और परंपरा से मोक्ष पाता है, शुद्धोपयोग रूप आत्मज्ञान से इसी भव में मोक्ष होता है, और हिंसा आदि पापों से दुर्गति मिलती है।

  8. आठों पिता के पास जाकर प्रणाम करते हैं और हाथ जोड़कर जिनदीक्षा की आज्ञा माँगते हैं, कहते हैं कि यह संसार बिजली की चमक के समान अस्थिर है और काम-भोग आशीविष सर्प के फण के समान भयंकर हैं। अत्यंत स्नेह से दुखी लक्ष्मण उन्हें हृदय से लगाकर मस्तक चूमते हैं और गद्गद वाणी से कहते हैं कि कैलाश के शिखर जैसे, रत्नजड़ित आँगनों वाले महलों में रहो, वीणा, बाँसुरी और मृदंग में निपुण रानियों के साथ सुख भोगो, और मुझे तथा माताओं को शोक में डालकर जाने के बजाय कुछ दिन और पृथ्वी का राज्य करो।

  9. कुमार उत्तर देते हैं कि इस संसार में हमारे अनंत माता-पिता हो चुके हैं और यह स्नेह का बंधन नरक का कारण है। जैसे सफेद वस्त्र शरीर के संयोग से मैला होता है वैसे ही घर के संयोग से गृहस्थ का मन मैला रहता है, और जीव घर रूपी तालाब की मछली के समान विषय रूपी मांस के लोभ में रोग रूपी काँटे से फँसकर काल रूपी धीवर के जाल में पड़ते हैं। मोह रूपी मगरमच्छों और इष्ट-वियोग, अनिष्ट-संयोग रूपी बड़वानल वाले संसार-सागर का वर्णन कर वे पूछते हैं कि आप ज्ञानी होकर हमें गृहस्थी के गड्ढे में क्यों डालते हैं।

  10. तीन खंड के राज्य को भी क्षणभंगुर जानकर आठों कुमार घर छोड़ते हैं और महेन्द्रोदय उद्यान में महाबल मुनिराज के निकट दिगंबर मुनि बन जाते हैं। ईर्या समिति से विहार करते, क्षमावान और जितेन्द्रिय होकर वे बारह प्रकार के तप से कर्मों का नाश करते हैं, केवलज्ञान पाते हैं और अघाति कर्मों का क्षय कर सिद्धपद प्राप्त करते हैं; गौतम स्वामी श्रेणिक से कहते हैं कि जो इस मंगलमय चरित्र को भक्ति से पढ़ता-सुनता है उसके सब पाप नष्ट होते हैं।