पर्व 111
भामंडल का बिजली गिरने से मरण
कुछ दिन और भोग भोगने के बहाने वैराग्य को टालते रहने वाले भामंडल पर सोते समय बिजली गिरती है और उनकी मृत्यु हो जाती है।
कथा खंड महान वैराग्यसारांश
गौतम स्वामी श्रेणिक को बताते हैं कि रानियों और विद्याधर राज्य के वैभव में आसक्त भामंडल दीक्षा को टालते रहते हैं और नई विजयों तथा भोगों के सपने देखते रहते हैं। सैकड़ों वर्ष एक दिन के समान बीत जाते हैं, और एक दिन महल के सातवें खंड में सोते हुए उन पर बिजली गिरती है। पर्व चेतावनी देता है कि धर्म की इच्छा रखकर भी उसका आचरण न करना पंख कटे पक्षी के आकाश में उड़ने की इच्छा जैसा है, और मृत्यु हर किसी के सिर पर अनदेखी मँडराती है। पात्रदान के पुण्य से भामंडल उत्तम भोगभूमि में जन्म लेते हैं।
क्या हुआ
6 बिंदु
महावीर स्वामी के प्रथम गणधर गौतम ऋषि राजा श्रेणिक को भामंडल का चरित्र सुनाते हैं, जो विद्याधरों के वैभव और विषय-सुखों में मधुमक्खी के समान आसक्त हैं। वे दिगंबर दीक्षा लेने की सोचते तो हैं, पर डरते हैं कि इससे उनकी रानियों के सौभाग्य रूपी कमलों का वन सूख जाएगा, उनके वियोग से स्वयं उनके प्राण छूट जाएँगे, और उन्होंने तो सदा सुख से ही प्राण पाले हैं।
इसलिए वे सोचते हैं कि कुछ दिन और राज्य-सुख भोगकर अंत समय में कल्याणकारी तप करेंगे, और भोगों से जो पाप होगा उसे ध्यान रूपी अग्नि से क्षणमात्र में जला देंगे। वे सपने देखते हैं कि बड़ी सेना से शत्रुओं को राज्यहीन करेंगे, दक्षिण और उत्तर श्रेणी में अपनी आज्ञा चलाएँगे, सब राजाओं को वश में करेंगे, और सुमेरु आदि पर्वतों पर मरकतमणि आदि रत्नों की शिलाओं पर रानियों के साथ क्रीड़ा करेंगे।
‘यह किया, यह करूँगा’ ऐसे मनोरथों में डूबे भामंडल सैकड़ों वर्ष एक दिन के समान बिता देते हैं और आयु के अंत का उन्हें पता ही नहीं चलता। एक दिन जब वे महल के सातवें खंड में सुंदर शय्या पर सोए होते हैं, तब बिजली गिरती है और तत्काल उनकी मृत्यु हो जाती है।
ग्रंथ विचार करता है कि मनुष्य अनेक प्रकार के विचार तो करते हैं पर आत्म-कल्याण का उपाय नहीं करते, जबकि मृत्यु सिर पर घूमती रहती है और धन, यौवन तथा जीवन सब अस्थिर हैं। विषयों से उपजी इच्छाएँ कर्मबंध का कारण हैं, पर जो इन्हें अस्थिर जानकर परिग्रह छोड़ आत्म-कल्याण में लगते हैं, वे संसार में भ्रमण नहीं करते।
हजारों शास्त्र पढ़कर भी वैराग्य न हो तो वह व्यर्थ है, पर एक ही शास्त्र का एक ही पृष्ठ पढ़कर शांति और वैराग्य हो जाए तो वह प्रशंसा योग्य है। धर्म की इच्छा रखकर भी धर्म का आचरण न करना पंख कटे पक्षी के आकाश में उड़ने की इच्छा जैसा है, और यदि बिना पुरुषार्थ के सिद्धपद मिलता तो कोई मुनिव्रत क्यों धारण करता।
जो गृहस्थ अपने द्वार पर आए साधु की भक्ति नहीं करता, उन्हें आहार नहीं देता और उनकी वैयावृत्ति नहीं करता, वह न संसार का सुख पा सकता है न मोक्ष का, और जो प्रमादी अपनी आयु व्यर्थ गँवाता है, वह हथेली में आया रत्न खो देता है। भामंडल मरकर पात्रदान के प्रभाव से उत्तम भोगभूमि में जाते हैं।