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पर्व 112

हनुमान का संसार, देह और भोगों से विरक्त होना

सुमेरु पर्वत के अकृत्रिम जिनमंदिरों की वंदना से लौटते हुए हनुमान रात के आकाश में एक तारा टूटता देखते हैं और राज्य, रानियों और भोगों को छोड़ जिनेन्द्रों के मार्ग पर चलने का निश्चय करते हैं।

कथा खंड महान वैराग्य

सारांश

राम और लक्ष्मण हर ऋतु राजसी भोगों में बिताते हैं, जबकि हर ऋतु में मुनिराज खुले में कठोर तप करते हैं। फिर गौतम स्वामी हनुमान का वृत्तांत सुनाते हैं, जो कर्णकुंडल नगर में देवों समान सुख भोगते हैं और एक वसंत में रानियों तथा हजारों विद्याधरों के साथ सुमेरु पर्वत के अकृत्रिम चैत्यालयों की वंदना करने जाते हैं, अष्टद्रव्य से पूजा करते हैं और वीणा बजाकर जिनेन्द्र का यशगान करते हैं। लौटते समय वे सुरदुंदुभि पर्वत पर रात बिताते हैं, एक चमकता तारा टूटता देखते हैं और सब वस्तुओं की क्षणभंगुरता से गहरे प्रभावित होते हैं। यह स्मरण कर कि न स्वर्ग के लंबे भोग और न पृथ्वी की रानियाँ उन्हें कभी तृप्त कर सकीं, वे राज्य और परिवार छोड़कर उस मार्ग पर चलने का निश्चय करते हैं जिससे जिनेन्द्र सिद्धपद को गए।

क्या हुआ

10 बिंदु

  1. राम और लक्ष्मण परस्पर महाप्रेम से, प्रजा के पिता के समान, बलभद्र और नारायण की विभूति के साथ राज्य करते हैं। वसंत में जब सुगंधित पवन बहती है, कोयल कूकती है और सब लोग काम से उन्मत्त होते हैं, तब मुनिराज भयंकर वन में जाकर आत्मध्यान करते हैं, और दोनों भाई रनिवास और प्रजा के साथ उपवनों में रंगक्रीड़ा, जलक्रीड़ा और वनक्रीड़ा करते हैं।

  2. ग्रीष्म में जब नदियाँ सूख जाती हैं और अग्नि-सी तपन होती है, तब महामुनि पर्वतों पर सूर्य के सामने कायोत्सर्ग मुद्रा में ध्यान करते हैं। उसी समय राम-लक्ष्मण धारामंडप महल या रमणीक वनों में जलयंत्रों, चंदन और कपूर के बीच, स्फटिक शिला पर चंदन-जल से भीगे कमलों के पास बैठकर, चँवर और पंखों की हवा लेते, लौंग, इलायची और कपूर से सुगंधित शीतल जल पीते और लतामंडपों के नीचे वीणा, बाँसुरी और सारंगी की मधुर ध्वनि सुनते हैं।

  3. वर्षा में जब योगीश्वर बिजली की चमक, मेघ-गर्जन, मोरों की बोली और तट तोड़ती नदियों के बीच वृक्षों के नीचे ध्यान करते हैं, तब दोनों भाई सुमेरु के समान ऊँचे रत्नमय महलों में केसर, कपूर और कृष्णागुरु से सजकर रानियों के साथ इन्द्र की तरह क्रीड़ा करते हैं। शरद में मुनिराज सरोवरों और नदियों के तट पर परीषह सहते हुए कर्मों की निर्जरा करते हैं, और राजपरिवार चाँदनी जैसे वस्त्र पहनकर उन्हीं तटों पर क्रीड़ा करता है। शीत ऋतु में जब प्रचंड ठंड से वृक्ष जल जाते हैं, तब मुनि रात भर बर्फ गिरने और ठंडी हवा चलने वाले स्थानों पर निश्चल होकर शुक्लध्यान में लीन रहते हैं, और दोनों भाई महलों के भीतर वीणा को भी अपनी वाणी से जीतने वाली पतिव्रता रानियों के साथ संगीत का आनंद लेते हैं।

  4. फिर गौतम स्वामी हनुमान का वर्णन करते हैं, जो पवन के पुत्र, अंजना के नंदन, कामदेव और श्रीशैल नाम से प्रसिद्ध हैं, और कर्णकुंडल नगर में हजारों विद्याधरों की सेवा पाते हुए देवों के समान सुख भोगते हैं। एक वसंत में जिनेन्द्र की भक्ति में लीन होकर वे हजारों रानियों और विद्याधरों के साथ विमान में बैठकर सुमेरु पर्वत की वंदना को निकलते हैं, और मार्ग में वन, कुलाचलों के सरोवर, रत्नों की सीढ़ियों वाली वापिकाएँ और अनेक जिनमंदिर देखते हैं।

  5. विमान से वे रानियों को सुमेरु की शोभा बताते हैं: सूर्य के समान दमकते शिखरों वाले स्वर्णमय जिनमंदिर, तल पर भद्रशाल वन, कटिमेखला पर रत्नों की शिलाएँ, और शिखर पर पांडुक वन जहाँ तीर्थंकरों का जन्माभिषेक होता है। सुमेरु के चारों वनों में चार-चार अनादिनिधन अकृत्रिम चैत्यालय हैं, जहाँ देव-देवियों का निरंतर आवागमन होता है, यक्ष, किन्नर और गंधर्व संगीत करते हैं और अप्सराएँ नृत्य करती हैं, और निर्धूम अग्नि तथा उगते सूर्य जैसे स्वर्णिम पांडुक वन के चैत्यालय मानो सुमेरु के मुकुट हैं, जिनका पूरा वर्णन इन्द्र भी नहीं कर सकते।

  6. विमान से उतरकर हनुमान मंदिर की तीन प्रदक्षिणा देते हैं और रानियों सहित भगवान के अकृत्रिम जिनबिंबों को हाथ जोड़कर नमस्कार करते हैं। विद्याधरी रानियाँ रत्नों के चूर्ण से मंडल बनाकर पति के साथ अष्टद्रव्य से पूजा करती हैं: पद्मसरोवर का जल, सुगंधित चंदन, मोतियों के अक्षत, स्वर्ण, रजत, पद्मरागमणि, चन्द्रकांतमणि और कल्पवृक्षों के पुष्प, अमृत-सा नैवेद्य, रत्नों के दीपक, अगुरु-चंदन की धूप और कल्पवृक्षों के फल।

  7. जनेऊ, अमूल्य आभूषण और महीन वस्त्र पहने, मुकुट में वानर का चिह्न धारण किए हनुमान रानियों के बीच सौधर्म इन्द्र के समान बाजों, नृत्य और गान के साथ पूजा करते हैं, जिसे देखकर इन्द्र की अप्सराएँ उनकी बहुत प्रशंसा करती हैं। वे वीणा लेकर जिनराज का यशगान करते हैं, और दर्शन से मन तृप्त न होने पर भी चैत्यालय में अधिक ठहरने से कोई आसादना न लगे, इसलिए जिनराज के चरण हृदय में धारकर बाहर आ जाते हैं।

  8. विमान से सुमेरु की प्रदक्षिणा देकर और चैत्यालयों के दर्शन कर वे भरतक्षेत्र की ओर लौटते हैं, पर मार्ग में सूर्य अस्त हो जाता है और वे सेना सहित सुरदुंदुभि नाम के पर्वत पर रात बिताते हैं, जहाँ कमलों की सुगंध लिए पवन में सैनिक जिनेन्द्र की कथा करते बैठते हैं। रात में हनुमान आकाश से एक ज्योतिर्मय तारा टूटता देखते हैं और सोचते हैं, ‘हाय, इस असार संसार वन में देव भी काल के वश होते हैं; बिजली की चमक और जल की लहरों के समान यह शरीर और भोग सब नाशवान हैं।’

  9. वे विचारते हैं कि इन्द्रिय रूपी चंचल घोड़ा जीव को कुमार्ग में ले जाकर नरक-निगोद में पटक देता है, कि जैसे कोई एक दिन राज्य कर बहुत दिन दुखी हो वैसे ही मूर्ख जीव कुछ दिन विषय-सुख भोगकर अनंत काल तक निगोद के दुख भोगता है, कि देव भी मरकर एकेन्द्रिय हो जाता है, और कि पाप ही शत्रु तथा पुण्य ही मित्र है। जैसे ईंधन से अग्नि और नदियों से समुद्र तृप्त नहीं होता, वैसे भोगों से जीव तृप्त नहीं होता; उन्होंने सागरों तक स्वर्ग में देवांगनाओं के साथ और फिर पृथ्वी पर रानियों के साथ भोग भोगे पर तृप्ति नहीं हुई, और यदि अब तप न करें तो सुभौम चक्रवर्ती की तरह अतृप्त मरकर दुर्गति में जाएँगे।

  10. नरकों के असिपत्र वन और वैतरणी नदी के दुखों से न डरने वाले अपने मन को धिक्कारते हुए वे राज्य, पतिव्रता रानियों, परिवार और प्रजा को छोड़कर अनादि से लगे कर्मों से आत्मा को छुड़ाने का निश्चय करते हैं। जैसे मेघ-पटल से रहित सूर्य तेजस्वी दिखता है, वैसे ही मोह-पटल से रहित होकर राम के भक्त, अंजना और पवन के पुत्र हनुमान जिनशासन के रहस्य को यथार्थ जानते हैं और उस मार्ग पर चलने को तैयार होते हैं जिससे जिनेन्द्र सिद्धपद को पधारे।