पर्व 113
कामदेव हनुमान की दीक्षा और निर्वाण
हनुमान पुत्र को राज्य देकर साढ़े सात सौ राजाओं के साथ आकाशगामी धर्मरत्न मुनि से दीक्षा लेते हैं और उग्र तप करके तुंगीगिरि से निर्वाण पाते हैं।
कथा खंड महान वैराग्यसारांश
प्रातःकाल हनुमान मंत्रियों से कहते हैं कि जैसे भरत चक्रवर्ती ने संसार छोड़ा था वैसे ही वे भी छोड़ेंगे, और उनकी विनती के उत्तर में समझाते हैं कि कोई संबंधी जीव की रक्षा नहीं कर सकता और वे मृत्यु से रहित सिद्धपद चाहते हैं। बड़े पुत्र को राज्य देकर वे पालकी में चैत्यवान वन जाते हैं, जहाँ आकाशगामी धर्मरत्न मुनि से दीक्षा लेकर अपने हाथों से केशलोंच करते हैं। उनके साथ उनके मित्र विद्युत्गति सहित साढ़े सात सौ राजा मुनि बनते हैं, और उनकी रानियाँ बंधुमती आर्यिका के पास आर्यिका व्रत लेती हैं। तप में अडिग रहकर हनुमान सब कर्मों को भस्म करते हैं और तुंगीगिरि के शिखर से निर्वाण पाते हैं।
क्या हुआ
8 बिंदु
रात बीतती है और साधु के मोक्षमार्ग प्रकाशित करने के समान सूर्य उदित होता है; तब हनुमान मंत्रियों से कहते हैं कि जैसे पहले भरत चक्रवर्ती तप के लिए वन गए थे, वैसे ही हम जाएँगे। प्रेम से दुखी मंत्री विनती करते हैं कि हमें अनाथ न करें, पर हनुमान उत्तर देते हैं कि जो संसार-सागर से निकले हुए को फिर सागर में गिराए वह मित्र नहीं, निश्चय ही शत्रु है, और जब जीव ने नरक में महादुख भोगे तब माता-पिता, भाई-बहन, मित्र या स्त्री कोई रक्षक नहीं हुआ।
वे कहते हैं कि दुर्लभ मनुष्य पर्याय और जिनशासन का ज्ञान पाकर बुद्धिमानों को प्रमाद करना उचित नहीं; जहाँ संयोग है वहाँ वियोग अवश्य है, देव, मनुष्य और इन्द्र सब अपने-अपने कर्मों के अधीन हैं, और मनुष्य पर्याय में कोई निश्चय नहीं कि मृत्यु कब आ जाए। उन्होंने अनेक भवों में सागरों तक देवों के सुख भोगे फिर भी तृप्त नहीं हुए, जैसे ईंधन से अग्नि तृप्त नहीं होती, और अब वे जन्म, जरा और मृत्यु से रहित उत्कृष्ट सिद्धपद पाना चाहते हैं।
यह सुनकर रनिवास की रानियाँ वियोग के दुख से रोने लगती हैं, तब ज्ञानी लोग उन्हें समझाकर संतोष देते हैं। निश्चल विरक्त मन से हनुमान अपने बड़े पुत्र को राज्य देते हैं, सबको यथायोग्य विभूति देते हैं, देवों के समान रत्नमय राजभवन छोड़ते हैं और ध्वजाओं, चँवरों और मोतियों की झालरों से सजी स्वर्ण-रत्नमयी दमकती पालकी में बैठकर चैत्यवान नाम के वन को जाते हैं, जिसे देखकर नगर के लोग रोने लगते हैं।
उस वन में धर्मरत्न नाम के योगीराज विराजमान हैं, जो अनेक ऋद्धियों से युक्त आकाशगामी चारण ऋषि हैं और जिनके दर्शन मात्र से पाप नष्ट होते हैं। उन्हें दूर से देखकर हनुमान पालकी से उतरते हैं, हाथ जोड़कर नमस्कार करते हैं और कहते हैं कि मैं शरीर आदि परद्रव्यों से निर्ममत्व हो गया हूँ, कृपा कर मुझे परमेश्वरी दीक्षा दें; मुनिराज उनके विचार की सराहना कर कहते हैं कि जगत असार है, शरीर नाशवान है, भोग रोगों का घर है, और ऐसा ज्ञान विवेकी जीवों को ही होता है।
मुनिराज की आज्ञा पाकर हनुमान पद्मासन में बैठते हैं, नमस्कार करते हैं और मुकुट, कुंडल, हार आदि सब आभूषण उतार देते हैं। जगत से राग छोड़, रानियों का बंधन तोड़, मोह-ममता से मुँह मोड़कर वे अपने कोमल हाथों से सिर के बालों का केशलोंच करते हैं, सारा परिग्रह त्याग देते हैं और महाव्रत धारण करते हैं।
हनुमान के साथ साढ़े सात सौ बड़े-बड़े राजा और विद्याधर, जिनमें हनुमान के परम मित्र विद्युत्गति भी हैं, अपने पुत्रों को राज्य देकर अट्ठाईस मूलगुण धारण करते हैं और महामुनि बनते हैं। हनुमान की और उन सब राजाओं की रानियाँ पहले वियोग की अग्नि से दुखी होकर रोती हैं, फिर वैराग्य पाकर बंधुमती आर्यिका के पास जाकर आर्यिका के व्रत धारण करती हैं, और आभूषण त्यागकर एक सफेद साड़ी पहनती हैं, जिनका आभूषण अब केवल शील है।
पाँच महाव्रत, पाँच समिति और तीन गुप्ति धारण कर हनुमान चारित्र में पर्वत से भी अधिक दृढ़ और अचल होते हैं, जिससे उनका श्रीशैल नाम सार्थक होता है। इन्द्र आदि देव उनका निर्मल यश गाते हैं और बार-बार स्तुति, वंदना और पूजा कर कहते हैं कि आपने सर्वज्ञ वीतराग देव का कहा धर्म धारण किया है, आप भवसागर से अवश्य पार होंगे।
ध्यान रूपी अग्नि से आठों कर्मों की समस्त प्रकृतियों रूपी ईंधन को जलाकर महामुनि हनुमान तुंगीगिरि के शिखर से सिद्धपद प्राप्त करते हैं। केवलज्ञान, केवलदर्शन आदि अनंत गुणों सहित वे सदा सिद्धलोक में रहेंगे, और पर्व इस प्रार्थना के साथ समाप्त होता है कि हनुमान का यह चरित्र हमारे कर्मों के नाश का कारण बने।