मुख्य सामग्री पर जाएँ

पर्व 114

इन्द्र का देवों को उपदेश और राम के स्नेह की चर्चा

स्वर्ग की सभा में सौधर्म इन्द्र जिनभक्ति का उपदेश देते हैं और कहते हैं कि ज्ञानी होकर भी राम संसार नहीं छोड़ पाते, क्योंकि लक्ष्मण के प्रति उनका स्नेह सबसे बड़ा बंधन है।

कथा खंड महान वैराग्य

सारांश

राम सुनते हैं कि लक्ष्मण के आठों पुत्रों और हनुमान ने मुनिव्रत ले लिया है और उनके कम आयु में वैराग्य पर आश्चर्य करते हैं, फिर भी स्वयं संसार में बँधे रहते हैं। स्वर्ग में सौधर्म इन्द्र सभा में देवों को अरहंत-भक्ति का उपदेश देते हैं, तीनों लोकों के अकृत्रिम जिन चैत्यालयों की गिनती बताते हैं और मनुष्य जन्म व्यर्थ गँवाने वालों पर खेद करते हैं। जब इन्द्र मनुष्य बनकर मुक्ति पाने की इच्छा करते हैं, तो एक देव बताता है कि पाँचवें स्वर्ग के ब्रह्मेन्द्र, जो अब राम हैं, यहाँ यही कहते थे पर अब वैराग्य का विचार भी नहीं करते। इन्द्र समझाते हैं कि स्नेह का बंधन सब बंधनों से बड़ा है, क्योंकि राम लक्ष्मण को अपने प्राणों से भी अधिक चाहते हैं।

क्या हुआ

9 बिंदु

  1. सिंहासन पर विराजमान राम लोगों से सुनते हैं कि लक्ष्मण के आठों पुत्रों और हनुमान ने मुनिव्रत धारण कर लिया है। वे हँसकर आश्चर्य करते हैं कि इन्होंने मनुष्य भव के सुख ठीक से भोगे भी नहीं और इतनी छोटी अवस्था में ऐसे मनोहर भोग छोड़कर विरक्त भाव से ध्यान में लीन हो गए, और कहते हैं कि वे धन्य हैं। सम्यग्दृष्टि और ज्ञानी होते हुए भी राम चारित्रमोह के वश संसार के भोगों में रहते हैं, और राम-लक्ष्मण न्याय से राज्य करते रहते हैं।

  2. एक दिन महाज्योति के धारक सौधर्म इन्द्र अपनी सभा में अद्भुत रत्नमय सिंहासन पर विराजते हैं; उनके साथ गुरु के समान सामानिक देव, देशपाल के समान लोकपाल, मंत्री के समान त्रायस्त्रिंश देव और अन्य सब देव हैं, और वे उनके बीच नक्षत्रों के बीच चन्द्रमा जैसे शोभते हैं। ग्रंथ बताता है कि सूर्य-चन्द्रमा तो ज्योतिषी देव हैं, स्वर्ग के देवों की ज्योति उनसे अधिक है और इन्द्र की ज्योति सबसे अधिक, और इन्द्र के सिंहासन तथा सभा का वर्णन सैकड़ों मनुष्य अपनी जिह्वा से भी नहीं कर सकते।

  3. इन्द्र के निकट बैठे लोकपाल स्वर्ग से च्युत होकर मुनि बनेंगे और मुक्ति पाएँगे। सोलह स्वर्गों के बारह इन्द्र हैं और हर इन्द्र के चार-चार लोकपाल एकभवतारी हैं; इन्द्रों में सौधर्म, सनत्कुमार, लांतव, शतार, आनत और आरण, ये छह भी एकभवतारी हैं, अर्थात मनुष्य बनकर मोक्ष जाएँगे, और शची इन्द्राणी, पाँचवें स्वर्ग के लौकांतिक देव तथा सर्वार्थसिद्धि के अहमिन्द्र भी मनुष्य होकर मोक्ष जाएँगे।

  4. शास्त्रों का व्याख्यान करते हुए इन्द्र भक्ति से सुनते देवों से कहते हैं कि जगत के नाथ अरहंत देव को अपने भाव रूपी पुष्प चढ़ाओ, और अकृत्रिम जिन चैत्यालयों के दर्शन से मिथ्यात्व के खंड-खंड हो जाते हैं। वे उनकी गिनती बताते हैं: चित्रा पृथ्वी के नीचे अधोलोक में सात करोड़ बहत्तर लाख, और मध्यलोक में चार सौ अट्ठावन, अर्थात पाँच सुमेरुओं के अस्सी, गजदंतों के बीस, जंबू और शाल्मलि वृक्षों के दस, विजयार्ध पर्वतों के एक सौ सत्तर, वक्षार पर्वतों के अस्सी, कुलाचलों के तीस, इष्वाकार के चार, मानुषोत्तर के चार, नंदीश्वर द्वीप के बावन, रुचकगिरि के चार और कुंडलगिरि के चार।

  5. ऊर्ध्वलोक में चौरासी लाख सत्तानवे हजार तेईस चैत्यालय हैं: सौधर्म में बत्तीस लाख, ऐशान में अट्ठाईस लाख, सनत्कुमार में बारह लाख, माहेन्द्र में आठ लाख, ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर में चार लाख, लांतव-कापिष्ठ में पचास हजार, शुक्र-महाशुक्र में चालीस हजार, शतार-सहस्रार में छह हजार, आनत-प्राणत और आरण-अच्युत में सात सौ, अधो ग्रैवेयक में एक सौ ग्यारह, मध्य ग्रैवेयक में एक सौ सात, ऊर्ध्व ग्रैवेयक में इक्यानवे, अनुदिशों में नौ और अनुत्तर विमानों में पाँच। ये अनादिनिधन चैत्यालय किसी के बनाए नहीं हैं और कभी नष्ट नहीं होंगे; हर एक में एक सौ आठ गर्भगृहों में एक सौ आठ रत्नमयी प्रतिमाएँ और एक सौ आठ-एक सौ आठ की संख्या में आठों मंगल द्रव्य हैं, और इनकी वंदना से सम्यक्त्व तथा परंपरा से मोक्ष मिलता है।

  6. इन्द्र वीतराग प्रभु की महिमा गाते हैं, जिन्हें जन्म कल्याणक में देव सुमेरु पर ले जाकर क्षीरसागर के जल से एक हजार आठ कलशों से अभिषेक करते हैं, और जिन्होंने पृथ्वी रूपी स्त्री को छोड़कर सिद्धि रूपी वनिता को पाया। उन्हें अरहंत, स्वयंभू, सुगत, महादेव, हिरण्यगर्भ, ईश्वर, महेश्वर, ब्रह्मा, विष्णु, धर्मचक्री, परमात्मा, तीर्थंकर आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है; इन्द्र, धरणेन्द्र और चक्रवर्ती उनकी स्तुति करते हैं, उनकी भक्ति से जीव कर्मों से छूटता है, इसलिए इन्द्र देवों से कहते हैं कि अपने हृदय में जिनेन्द्र प्रभु को विराजमान करो।

  7. वे कहते हैं कि धिक्कार है उन्हें जो दुर्लभ मनुष्य जन्म पाकर भी न अरहंत का ध्यान करते हैं, न उनके कहे व्रत धारण करते हैं। मिथ्या तप से कोई भवनत्रिक का हीन देव बनता है और फिर स्थावर योनि में गिरकर महाकष्ट पाता है, और ऐसे हीन देव महाऋद्धिधारी देवों को देखकर पछताते हैं कि मध्यलोक में मनुष्य होकर हमने अरहंत का मार्ग नहीं जाना; धिक्कार उन्हें भी जो कुशास्त्र रचकर जीवों को कुमार्ग में भटकाते हैं। बड़े-बड़े देव भी स्वर्ग से च्युत होते समय मरण का और इष्ट-वियोग का महादुख पाते हैं, इसलिए धन्य हैं वे जो मनुष्य पर्याय पाकर आत्म-कल्याण करते हैं।

  8. इन्द्र कहते हैं कि वह दिन कब आएगा जब स्वर्ग की आयु पूरी कर, मनुष्य पर्याय पाकर, विषय रूपी शत्रुओं को जीतकर, तप के प्रभाव से मुक्ति प्राप्त करूँ। तब एक देव कहता है कि स्वर्ग में तो सब ऐसा ही कहते हैं पर मनुष्य बनकर भूल जाते हैं; पाँचवें स्वर्ग के ब्रह्मेन्द्र अब रामचन्द्र हुए हैं, जो यहाँ ऐसा ही कहते थे, पर अब वैराग्य का विचार भी नहीं करते।

  9. इन्द्र उत्तर देते हैं कि सब बंधनों में स्नेह रूपी राग का बंधन सबसे बड़ा है: जिसके हाथ, पैर और कंठ बँधे हों वह तो छूट जाए, पर स्नेह से बँधा प्राणी कैसे छूटे। रामचन्द्र को लक्ष्मण से अति अनुराग है, वे उन्हें अपने प्राणों से भी अधिक मानते हैं और क्षण भर भी न देखें तो व्याकुल हो जाते हैं, तो लक्ष्मण को छोड़कर वैराग्य कैसे लें; कर्मों की ऐसी विचित्रता है कि बुद्धिमान भी राग से मूर्ख हो जाता है, और अपने सब पूर्वभव सुन चुके विवेकी राम भी आत्महित नहीं करते। इन्द्र का यह उपदेश सुनकर देवों का मन निर्मल होता है और जन्म, जरा और मरण से डरकर वे मनुष्य भव पाकर मुक्ति पाने की अभिलाषा करने लगते हैं।