पर्व 115
लक्ष्मण का मरण और लवण-अंकुश का वैराग्य
दो देव राम की मृत्यु का झूठा समाचार देकर भाइयों के प्रेम की परीक्षा लेते हैं, लक्ष्मण उसी क्षण शोक से प्राण त्याग देते हैं, और लवण-अंकुश संसार छोड़ देते हैं।
कथा खंड महान वैराग्यसारांश
रत्नचूल और मृगचूल नाम के दो देव राम-लक्ष्मण के प्रेम की परीक्षा लेने का निश्चय करते हैं और माया से राम के महल में रुदन का दृश्य रचकर, मायावी दरबारियों से लक्ष्मण को राम की मृत्यु का समाचार दिलवाते हैं। आधा ‘हाय’ कहते ही लक्ष्मण के प्राण निकल जाते हैं, और पश्चाताप से भरे देव उन्हें जीवित न कर पाने पर स्वर्ग लौट जाते हैं। राम भाई को मरा मानने को तैयार नहीं होते, वैद्यों को बुलाते हैं और बार-बार मूर्छित होते हैं, जबकि सारा राज्य रोता है। महाबली वासुदेव की मृत्यु से विचलित लवण और अंकुश अमृतेश्वर मुनि से दीक्षा ले लेते हैं, और शोक में डूबे राम को इसका पता भी नहीं चलता।
क्या हुआ
8 बिंदु
इन्द्र के सभा से उठने पर भवनवासी, व्यंतर, ज्योतिषी और विमानवासी, चारों प्रकार के देव उन्हें नमस्कार कर निर्मल भावों से अपने-अपने स्थान जाते हैं। उसी सभा के दो देव, रत्नचूल और मृगचूल, बलभद्र और नारायण के प्रेम की परीक्षा लेने का निश्चय करते हैं: राम तो लक्ष्मण को देखे बिना नहीं रहते, तो राम की मृत्यु सुनकर लक्ष्मण क्या करेंगे, शोक से उनका मुख कैसा हो जाएगा, किस पर क्रोध करेंगे और क्या कहेंगे।
ये दोनों दुराचारी देव अयोध्या आते हैं और विक्रिया से राम के महल के पूरे अंतःपुर की रानियों का रुदन दिखाते हैं, तथा द्वारपाल, उमराव, मंत्री और पुरोहित नीचा मुख किए लक्ष्मण के पास आकर कहते हैं, ‘हे नाथ, राम परलोक पधारे।’ यह सुनकर सिंहासन पर बैठे लक्ष्मण ‘हाय’ शब्द भी आधा ही कह पाते हैं और वचन रूपी वज्रपात से तत्काल प्राण छोड़ देते हैं, उनकी आँखों की पलकें जैसी थीं वैसी ही रह जाती हैं।
भाई की झूठी मृत्यु का समाचार सुनकर लक्ष्मण को मरा देख दोनों देव दुखी होते हैं, पर उन्हें जीवित करने में असमर्थ रहते हैं; यह सोचकर कि इनकी मृत्यु इसी प्रकार होनी थी, वे पश्चाताप और आश्चर्य के साथ अपने स्थान लौट जाते हैं, वहाँ खड़े होकर देख भी नहीं पाते, और उनका यह कार्य निंदनीय ठहरता है। गौतम स्वामी राजा श्रेणिक से कहते हैं कि बिना विचारे कार्य करने वाले पापियों को पछताना ही पड़ता है।
लक्ष्मण की रानियाँ उन्हें रूठा हुआ समझकर कहती हैं, ‘हे नाथ, किसने आपका मान नहीं रखा? प्रसन्न होइए, आपकी अप्रसन्नता हमारे दुख का कारण है’, और उनके शरीर से लिपटकर चरणों में गिर पड़ती हैं। कोई वीणा बजाती है, कोई मृदंग, कोई मधुर स्वर से उनके गुण गाती है, कोई मुख निहारती है और कोई उनके चरण अपने सिर पर रखती है, पर अचेतन शरीर के लिए सब प्रयत्न व्यर्थ जाते हैं, और इन्द्राणी-सी रानियाँ मोह से व्याकुल होकर तड़पती हैं और उनकी सुंदरता मुरझा जाती है।
समाचार सुनकर राम मंत्रियों सहित दुख से भरे राजलोक में आते हैं और लक्ष्मण का मुख प्रातःकाल के चन्द्रमा-सा मंद और तुरंत जड़ से उखड़े वृक्ष-सा देखते हैं। यह सोचते हुए कि सदा प्रसन्न रहने वाला भाई आज बिना कारण मुझसे क्यों रूठ गया, वे उसे उठाकर हृदय से लगाते हैं और मस्तक चूमते हैं; गरदन टेढ़ी हो गई है, शरीर ठंडा है, श्वास नहीं है और पलकें न खुलती हैं न बंद होती हैं, फिर भी राग से भरे राम लक्ष्मण को मरा हुआ नहीं कहते।
काँपते और पसीने से भीगे राम बार-बार मूर्छित होकर गिरते हैं, और सब विद्याओं के निधान होकर भी भाई के मोह में सब विद्याएँ भूल जाते हैं। वे अनेक वैद्यों और मंत्र-तंत्र जानने वालों को बुलाते हैं और अनेक औषधियाँ मँगवाते हैं, पर वे सब नीचा मुख किए बैठे रहते हैं, क्योंकि उपचार तो जीवित का ही हो सकता है; राम बेहोश होकर गिर पड़ते हैं, होश में आने पर ऐसे रोते हैं कि उनका मुख वर्षा की धाराओं के बीच चन्द्रमा-सा दिखता है, राज्य, नगर, गाँव और प्रजा के सब लोग रोने लगते हैं, और रानियाँ विलाप करती हैं कि हे नाथ, हमसे कौन-सा अपराध हुआ, पहले की तरह क्षमा कर कुछ तो बोलिए।
नारायण लक्ष्मण की मृत्यु देखकर लवण और अंकुश परम विषाद से भर जाते हैं और विचारते हैं कि धिक्कार है इस असार संसार और क्षणभंगुर शरीर को, क्योंकि जिन वासुदेव को विद्याधर भी नहीं जीत सके, उन्हें काल ने निमिष मात्र में जीत लिया, तो इस नाशवान शरीर, राज्य, संपत्ति और भोगों से हमें क्या सिद्धि होगी। फिर गर्भ में आने के भय से महारानी सीता के दोनों पुत्र पिता के चरणों में नमस्कार कर महेन्द्रोदय उद्यान जाते हैं और अमृतेश्वर मुनिराज के चरणों में महामुनि पद धारण करते हैं।
उनकी दीक्षा से लोग और भी व्याकुल होते हैं कि अब हमारी रक्षा कौन करेगा, क्योंकि शोक-सागर में डूबे राजा राम को यह सुध भी नहीं कि दोनों पुत्र दीक्षा लेकर चले गए हैं; राम को लक्ष्मण राज्य, पुत्रों, प्रियाओं और अपने प्राणों से भी अधिक प्यारे हैं। पर्व विचार करता है कि यह कर्मों की विचित्रता है; संसार का ऐसा चरित्र देख ज्ञानी जीव वैराग्य पाते हैं, उत्तम पुरुषों को थोड़ा-सा बाहरी निमित्त मिलते ही भीतर ज्ञान का सूर्य उदित होता है, पूर्वबद्ध कर्मों के क्षयोपशम से वैराग्य होता है और मुनिदीक्षा से मोक्ष मिलता है, जो गृहस्थ जीवन से नहीं मिलता।