पर्व 83
राम का वैभव, भरत का वैराग्य और त्रैलोक्यमंडन हाथी
राम के राज्य के अपार वैभव के बीच भरत केवल वैराग्य चाहते हैं, और जब उन्मत्त त्रैलोक्यमंडन हाथी उनकी ओर दौड़ता है, तो पूर्वभव का स्मरण कर शांत हो जाता है।
कथा खंड विजय और अयोध्या वापसीसारांश
गौतम स्वामी राम-लक्ष्मण का वैभव बताते हैं: विशाल सेनाएँ, राम के चार और लक्ष्मण के सात रत्न, अद्भुत महल, आठ हजार और सोलह हजार रानियाँ, और देश भर में बनवाए हजारों जिनमंदिर, यद्यपि कुछ अज्ञानी लोग सीता के विषय में कानाफूसी करने लगे हैं। इन सबसे अछूते भरत भोगों की असारता पर विचार कर वन जाने को तैयार होते हैं; राम, लक्ष्मण, कैकेयी और रानियाँ उन्हें रोककर सरोवर पर जलक्रीड़ा के लिए ले जाती हैं, जहाँ वे केवल स्नान और पूजा करते हैं। तभी महागज त्रैलोक्यमंडन बंधन तोड़कर उनकी ओर दौड़ता है, पर भरत को देखते ही छठे स्वर्ग की मित्रता याद कर विनय से उनके सामने खड़ा हो जाता है।
क्या हुआ
9 बिंदु
राम-लक्ष्मण की लक्ष्मी के विषय में पूछने पर गौतम स्वामी उसका कुछ भाग बताते हैं: बयालीस लाख हाथी और इतने ही रथ, नौ करोड़ घोड़े और बयालीस करोड़ पैदल, और तीन खंड के देव तथा विद्याधर सेवक। राम के चार रत्न हैं, हल, मूसल, रत्नमाला और गदा, और लक्ष्मण के सात, शंख, चक्र, गदा, खड्ग, दंड, नागशय्या और कौस्तुभमणि।
उनके महल में पर्वत जैसा ऊँचा चतुश्शाल कोट, वैजयंत नाम की सभा, दसों दिशाएँ देखने वाला ऊँचा प्रभासकूट महल, वर्धमान नाम की नृत्यशाला, शीतकाल का शयनकक्ष, ग्रीष्म की दोपहर के लिए धारामंडप, वर्षाऋतु का शयनकक्ष, पद्मरागमणि के सिंहाकार पायों वाली स्वर्ण शय्याएँ, और विषमोचक नाम की खड़ाऊँ हैं जिनसे वे आकाश में चलते हैं। उनके पास पचास लाख हल, एक करोड़ से अधिक गायें और अक्षय भंडार हैं; राम की आठ हजार और लक्ष्मण की सोलह हजार रानियाँ हैं।
हरिषेण चक्रवर्ती की तरह राम हर देश, नगर, वन और गली में हजारों जिनमंदिर बनवाते हैं, और पुण्यहीन लोगों को मकान, भूमि, धन और भोग-सामग्री देकर सबको देवों जैसा सुखी करते हैं, जिससे हर मुख पर दोनों भाइयों का यश है। फिर भी सीता के पूर्व पापकर्म के उदय से कुछ अज्ञानी लोग अपवाद करने लगते हैं कि रावण सीता को हर ले गया और राम उसे फिर घर ले आए; महापुरुष के घर यह रीति है तो सामान्य लोगों का क्या।
स्वर्ग को लजाने वाली अयोध्या में भरत को भोगों में सुख नहीं मिलता। वे सोचते हैं कि यह मनुष्य जन्म बड़े कष्ट से मिला है, भोग बुलबुले के समान, जीवन स्वप्न के समान और परिवार उन पक्षियों के समान है जो रात को वृक्ष पर बैठते और सुबह उड़ जाते हैं; शरीर रोगों का घर है; और इंद्रियाँ कभी तृप्त नहीं होतीं, जैसे ईंधन से अग्नि और नदियों से समुद्र, क्योंकि बाईस सागर तक देवों के और तीन पल्य तक भोगभूमि के भोग भी तृप्ति नहीं दे सके। वे राजा सौदास को याद करते हैं जो अभक्ष्य के लोभ में राज्यभ्रष्ट हुआ, और उस कौए को जो गंगा में बहते मरे हाथी का मांस खाते-खाते समुद्र में डूब मरा।
पिंजरे में बंद वन को तरसते सिंह की तरह भरत घर छोड़ने का निश्चय करते हैं। कैकेयी राम को बताती हैं, और राम-लक्ष्मण भरत का हाथ पकड़कर कहते हैं कि पिता ने तुम्हें राज्य दिया है, इसलिए तुम रघुवंशियों के स्वामी हो; मैं तुम्हारे सिर पर छत्र लेकर खड़ा रहूँगा, शत्रुघ्न चँवर ढोरेंगे और लक्ष्मण तुम्हारे मंत्री होंगे, और यदि तुम नहीं मानोगे तो मैं फिर विदेश चला जाऊँगा, यद्यपि बाद में मैं भी तुम्हारे साथ मुनि बनूँगा। भरत उत्तर देते हैं कि राज्य जीवों का शत्रु है और वे जन्मरूपी लहरों और राग-द्वेषरूपी जलचरों वाले भयानक संसार सागर को मुनिव्रत रूपी जहाज से पार करेंगे।
राजा रोते हुए विनती करते हैं कि बड़े भाई के लिए कुछ दिन और राज्य करें, पर भरत कहते हैं कि उन्होंने बहुत दिन राज्य किया, प्रजा का पुत्रवत पालन किया, दान-पूजा की और साधुओं की सेवा की, अब वे वही करना चाहते हैं जो पिता ने किया। जब वे बिना पूछे वन को चलते हैं, तो लक्ष्मण उनका हाथ पकड़ लेते हैं, माता कैकेयी रोती हुई आती हैं, और राम की आज्ञा से सीता, उर्वशी, भानुमती, विशल्या, रत्नवती, गुणवती, सुभद्रा, नलकूबरा, कल्याणमाला, मनोरमा, प्रियनंदा, कलावती, सरस्वती, श्रीकांता, पद्मावती आदि रानियाँ उन्हें खिले कमलवन की तरह घेर लेती हैं।
देवर कहकर रानियाँ उन्हें मनाती हैं कि भाइयों और माताओं को दुख न हो, इसलिए सरोवर पर जलक्रीड़ा करने चलें। वे जल में क्रीड़ा करती हैं और उन पर सुगंधित लेप लगाती हैं, पर भरत विनय से किनारे खड़े रहते हैं, किसी पर जल नहीं डालते और उनका मन जलक्रीड़ा में नहीं लगता; वे केवल स्नान कर किनारे के जिनमंदिर में भगवान की पूजा करने जाते हैं।
उसी समय त्रैलोक्यमंडन हाथी गजबंधन तोड़कर मद झराता और भयानक गर्जना करता बाहर निकलता है; अयोध्या के लोग काँप उठते हैं, दूसरे महावत अपने हाथी लेकर भाग जाते हैं, और वह नगर का द्वार तोड़कर मंदिर की ओर आता है। रानियाँ डरकर भरत के पास आती हैं, कैकेयी पुत्र के स्नेह में रो पड़ती हैं, और हाथी बाँधने में प्रवीण राम-लक्ष्मण उसे पकड़ने दौड़ते हैं, जबकि भरत निर्भय होकर रानियों के आगे खड़े हो जाते हैं।
भरत को देखते ही हाथी को जातिस्मरण होता है, वह शांत होकर सूँड ढीली कर विनय से उनके सामने खड़ा हो जाता है। भरत मधुर वाणी में पूछते हैं कि गजराज, तुमने क्रोध क्यों किया, तो वह उन्हें देखता रहता है और जान जाता है कि भरत छठे स्वर्ग में उसके परम मित्र थे, जो पुण्य से उत्तम पुरुष हुए, जबकि वह पापकर्म से पशु हुआ। इस जन्म को धिक्कार कर वह आत्मकल्याण का पुरुषार्थ करने का निश्चय करता है; गौतम स्वामी उपदेश देते हैं कि अशुभ कर्म छोड़कर जिनधर्म धारण करो और शुभ-अशुभ से परे होकर निर्वाण पाओ।