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पर्व 84

त्रैलोक्यमंडन हाथी का मौन

भरत को देखकर शांत हुआ रावण का प्रबल पट्ट हाथी अयोध्या लाया जाता है, फिर चार दिन तक भोजन, जल और निद्रा छोड़कर निश्चल खड़ा रहता है।

कथा खंड विजय और अयोध्या वापसी

सारांश

राम-लक्ष्मण शांत हुए हाथी के पास जाकर मीठे वचनों से उसे वश करते हैं और आभूषण पहनाने की आज्ञा देते हैं, जिससे नगर का भय मिट जाता है। यह त्रैलोक्यमंडन है, कभी रावण का पट्ट हाथी, जिसकी चाल विद्याधर अधिपति भी नहीं रोक सकते थे। भरत, सीता और विशल्या उस पर चढ़कर शोभायात्रा के साथ अयोध्या में आते हैं, और भरत साधुओं को आहार देकर परिवार के साथ भोजन करते हैं। जल्द ही महावत बताते हैं कि हाथी चार दिन से न खाता है, न पीता है, न सोता है, सूँड दाँतों में दबाकर चित्र की तरह खड़ा है, और कोई वैद्य, संगीत या औषधि उसे नहीं डिगा पाती।

क्या हुआ

4 बिंदु

  1. पर्वत समान ऊँचे गजराज को विनय से धर्मध्यान में लीन खड़ा देख राम-लक्ष्मण धीरे-धीरे उसके पास आते हैं, मीठे वचन बोलकर उसे पकड़ते हैं और सब आभूषण पहनाने की आज्ञा देते हैं। लोगों का भय मिट जाता है, और सारी अयोध्या उस हाथी की चर्चा करती है, जो रावण का पट्ट हाथी त्रैलोक्यमंडन है, जिसके समान बलवान कोई हाथी नहीं और जिसकी चाल विद्याधरों के अधिपति भी नहीं रोक सकते।

  2. भरत, रानी सीता और विशल्या हाथी पर चढ़कर बड़े वैभव से नगर में आते हैं, दूसरी रानियाँ अनेक वाहनों पर पीछे चलती हैं और शत्रुघ्न घोड़े पर बाजों के साथ आगे-आगे चलते हैं, मानो देव स्वर्ग में प्रवेश कर रहे हों। भरत भोजनशाला में उतरकर पहले साधुओं को आहारदान देते हैं, फिर परिवार के साथ भोजन करते हैं और सब भाभियों को भोजन कराते हैं।

  3. महावत राम-लक्ष्मण के पास आकर प्रणाम कर कहते हैं कि जिस दिन से हाथी ने क्रोध किया और शांत हुआ, उस दिन से आज चौथा दिन है, वह न खाता है, न पीता है, न सोता है, सूँड दाँतों में लेकर ध्यान में निश्चल खड़ा है, इतना स्थिर कि लोगों को भ्रम होता है कि यह सच्चा हाथी है या चित्र का। वह उनकी स्तुति और विनती की ओर ध्यान ही नहीं देता।

  4. उन्होंने सब शास्त्रों के ज्ञाता हाथियों के वैद्य को भी दिखाया, पर रोग पकड़ में नहीं आया; जिन गीतों और नृत्यों को वह पहले देखता-सुनता था, अब उनकी ओर ध्यान नहीं देता, और मंत्र, विद्या, औषधि सब निष्फल रहे। उसे न किसी वस्तु का लोभ है, न क्रोध, जैसे रूठा मित्र मनाने से भी नहीं मानता, और महावत उसे पूरी सेना का श्रृंगार बताकर निर्णय राम-लक्ष्मण पर छोड़ देते हैं, जो सोचते हैं कि यह बंधन तोड़कर क्यों निकला, क्यों क्षमाभाव को प्राप्त हुआ और अब आहार-पानी क्यों नहीं करता।