पर्व 82
राम-लक्ष्मण का अयोध्या आगमन
पुष्पक विमान से सुमेरु पर्वत और वनवास के स्थानों के ऊपर से उड़ते हुए राम-लक्ष्मण घर लौटते हैं, भरत उनका स्वागत करते हैं, और हर्षित अयोध्या में प्रवेश कर वे चारों माताओं से मिलते हैं।
कथा खंड विजय और अयोध्या वापसीसारांश
सूर्योदय होते ही बलभद्र और नारायण विद्याधर अधिपतियों के साथ पुष्पक विमान में प्रस्थान करते हैं, और राम सीता को सुमेरु पर्वत, दंडकवन, वंशस्थल पर्वत और वे नगर दिखाते हैं जहाँ लक्ष्मण का विवाह हुआ था। भरत हाथी पर सवार होकर उनकी अगवानी करते हैं, चरणों में प्रणाम करते हैं और विमान में बिठा लिए जाते हैं। दोनों भाई संगीत, पुष्पवर्षा और आशीषों के बीच नए रूप वाली नगरी में प्रवेश करते हैं जबकि नगरवासी एक-एक वीर को पहचानते हैं, और पुत्र-स्नेह से जिनके स्तनों से दूध झरने लगता है वे चारों माताएँ उन्हें हृदय से लगाती हैं। राम-लक्ष्मण अब एकछत्र तीन खंड का राज्य करते हैं।
क्या हुआ
7 बिंदु
सूर्योदय होते ही बलभद्र और नारायण पुष्पक विमान में बैठकर अयोध्या की ओर चलते हैं, और विद्याधरों के अधिपति परिवार सहित अनेक वाहनों पर उनके साथ चलते हैं, जिनके छत्र, चँवर और ध्वजाएँ सूर्य की प्रभा को रोक लेती हैं। लवण समुद्र पार करते हुए वे प्रसन्न होकर पर्वत, वन, उपवन और नगर देखते जाते हैं।
सीता पूछती हैं कि जंबूद्वीप के बीच स्वर्ण जैसा मनोहर क्या दिख रहा है, तो राम बताते हैं कि यह रत्नमय अकृत्रिम सुमेरु पर्वत है, जहाँ इन्द्रादि देवों ने मुनिसुव्रतनाथ का जन्माभिषेक किया था। वे दंडकवन दिखाते हैं जहाँ से लंकापति ने उनका हरण किया और जहाँ उन्होंने चारण मुनियों को आहार दिया था, वंशस्थल पर्वत जहाँ देशभूषण-कुलभूषण मुनियों का उपसर्ग दूर हुआ और उन्हें केवलज्ञान हुआ, बालिखिल्य का नगर जहाँ लक्ष्मण का कल्याणमाला से विवाह हुआ, और दशांगनगर जहाँ रूपवती के पिता परम श्रावक वज्रकर्ण राज्य करते हैं।
इन्द्रपुरी जैसे भवनों वाली नगरी देखकर सीता पूछती हैं कि यह कौन सी नगरी है, जिसे उन्होंने पहले कभी नहीं देखा; राम बताते हैं कि यह अयोध्या है, जिसे विद्याधरों के चतुर शिल्पियों ने लंका की शोभा को भी जीतने वाला बनाया है। भरत इन्द्र जैसी विभूति के साथ हाथी पर चढ़कर सामने आते हैं; राम पुष्पक को भूमि पर उतारते हैं, भरत दोनों भाइयों को नमस्कार कर चरणों में भेंट रखते हैं और आरती उतारते हैं, और वे उन्हें हृदय से लगाकर कुशल पूछते हैं और विमान में बिठा लेते हैं।
दोनों भाई सजी हुई नगरी में ऐसे प्रवेश करते हैं कि विमानों, रथों, हाथियों और घोड़ों से मार्ग में जगह नहीं रहती, और शंख, झाँझ, भेरी, वीणा, बाँसुरी, बंदीजनों की विरुदावली और नृत्य से दिशाएँ गूँज उठती हैं। प्रजा कदम-कदम पर अर्घ्य चढ़ाती, आरती उतारती और चिरंजीव होने की आशीष देती है, छतों से पुष्प और मोतियों के अक्षत बरसाती है, और भीड़ में टूटे मोतियों के हार ऐसे बिखरते हैं मानो मोतियों की वर्षा हो रही हो।
झरोखों और छतों पर बैठी स्त्रियाँ पूर्णिमा के चन्द्र जैसे राम और नीलमणि जैसे लक्ष्मण को दिखाती हैं और वीरों के नाम लेती हैं: जनक और विदेहा की पुत्री सीता; राम जिन्होंने सुग्रीव का रूप बनाकर आए साहसगति को मारा; लक्ष्मण जिन्होंने लंकेश्वर को चक्र से मारा; राम के मित्र सुग्रीव; भामंडल, जिन्हें जन्म के समय देव हर ले गया, चन्द्रगति ने पाला और देवों के पहनाए कुंडलों की आभा से जिनका नाम भामंडल पड़ा; चन्द्रोदर के पुत्र विराधित; और कपिध्वज हनुमान।
राम-लक्ष्मण के राजमहल पहुँचने पर पुत्र-स्नेह से प्रतीक्षा करती माताओं के स्तनों से दूध झरने लगता है। कौशल्या, सुमित्रा, कैकेयी और सुप्रभा पुत्रों के पास आती हैं; दोनों भाई पुष्पक से उतरकर अपनी रानियों सहित हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं, और चारों माताएँ आशीष देकर उन्हें बार-बार हृदय से लगाती हैं, सिर पर हाथ फेरती हैं और आनंद के आँसुओं के साथ सुख-दुख की बातें पूछती हैं।
साधुओं की भक्त और जैनधर्म की अनुरागिनी माताएँ अपने पुत्रों की हजारों रानियों को देखकर परम हर्षित होती हैं, उनके मनोरथ आशा से अधिक पूर्ण होते हैं और वे जगत में पूज्य होती हैं। राम-लक्ष्मण को समुद्र पर्यंत शत्रु रहित पृथ्वी पर तीन खंड का एकछत्र राज्य मिलता है और सब उनके आज्ञाकारी होते हैं। पर्व का फल बताया गया है कि यह अध्याय पढ़ने-सुनने वाले को मनवांछित संपदा मिलती है, और उपदेश है कि दृढ़ता और शुद्ध भाव से पाला गया छोटा सा नियम भी महान कल्याण करता है।