पर्व 81
कौशल्या का शोक और नारद का संदेश
नारद पुत्रों के वियोग में तड़पती कौशल्या को देखकर उनका दुख लंका पहुँचाते हैं, और राम-लक्ष्मण लौटने का निश्चय करते हैं जबकि विद्याधर सोलह दिन में अयोध्या को नया रूप देते हैं।
कथा खंड विजय और अयोध्या वापसीसारांश
अयोध्या में कौशल्या महल के सातवें खंड पर बैठी रोती हैं और कौए से कहती हैं कि पुत्र लौटे तो उसे खीर खिलाएँगी। धातकीखंड में तेईस वर्ष बिताकर लौटे नारद उनकी कथा सुनकर शोक से मूर्च्छित होते हैं और लंका जाते हैं, जहाँ अंगद के सेवक उन्हें खींचकर राम के पास ले जाते हैं। माताओं का समाचार सुनकर राम-लक्ष्मण रो पड़ते हैं और लौटने का निश्चय करते हैं, पर विभीषण के आग्रह पर सोलह दिन और रुकते हैं। विद्याधर दूत भरत और माताओं को शुभ समाचार देते हैं, अयोध्या पर रत्नों की वर्षा करते हैं और नगर को स्वर्ग जैसी राजधानी बना देते हैं।
क्या हुआ
8 बिंदु
जब राम लंका में स्वर्ग जैसी राजलक्ष्मी भोग रहे हैं, उनकी माता कौशल्या पति और पुत्र के वियोग की अग्नि में जल रही हैं। सखियों के साथ महल के सातवें खंड में बैठी वे बछड़े से बिछड़ी गाय की तरह दसों दिशाओं में देखती हैं और छत पर बैठे कौए से कहती हैं कि मेरा राम आए तो तुझे खीर खिलाऊँगी।
वे विलाप करती हैं कि राजमहलों में पले उनके कोमल पुत्र और राजपुत्री सीता कंकड़-पत्थरों पर कैसे चलते होंगे, सर्दी-गर्मी-वर्षा कैसे सहते होंगे, उन्हें भोजन और शय्या कहाँ मिलती होगी और वे वन के क्रूर पशुओं से कैसे डरते होंगे, जबकि वे स्वयं महल में सुख से रहकर भी एक क्षण शांति नहीं पातीं। वे सोचती हैं कि घने वन में राम किस वृक्ष के नीचे विश्राम करते होंगे।
उसी समय पृथ्वी पर प्रसिद्ध, सदा ढाई द्वीप में विचरने वाले, जटाधारी और श्वेत वस्त्रधारी नारद आकाशमार्ग से आते हैं। कौशल्या आदर से उन्हें सिंहासन पर बिठाती हैं और प्रेम से उलाहना देती हैं कि वे इतने दिन क्यों नहीं आए। नारद बताते हैं कि वे धातकीखंड में तीर्थंकर का सुमेरु पर्वत पर जन्माभिषेक देखने गए थे और जिनेन्द्र दर्शन के अनुराग में तेईस वर्ष वहीं सुख से बिताए।
कौशल्या उन्हें जितना जानती हैं सब बताती हैं: भामंडल का आना और राजा बनना, दशरथ का वैराग्य, सीता और लक्ष्मण के साथ राम का विदेश गमन, सीता हरण, सुग्रीव से मिलन, रावण से युद्ध, लक्ष्मण को रावण की शक्ति लगना और द्रोणमेघ की राजपुत्री को लंका भेजना, जिसके आगे उन्हें कुछ पता नहीं। सीता के हरण और लक्ष्मण को शक्ति लगने की बात सुनकर नारद वीणा धरती पर डालकर मूर्च्छित हो जाते हैं, फिर पुत्रों का कुशल समाचार लाने की प्रतिज्ञा करते हैं।
लंका पहुँचकर नारद सोचते हैं कि राम-लक्ष्मण की बात पूछने से रावण के लोग विरोध करेंगे, इसलिए चतुराई से रावण की कुशल पूछते हैं, वह भी पद्म सरोवर पर अंतःपुर सहित क्रीड़ा करते अंगद के सेवकों से। रावण का नाम सुनते ही सेवक क्रोधित होकर उन्हें रावण का दूत समझ खींच ले जाते हैं, और अंगद हँसकर कहते हैं कि इस तापस को पद्मनाभ के पास ले जाओ। संकट में पड़े नारद जिनशासन के यक्ष देवों से रक्षा की प्रार्थना करते हैं।
विभीषण के महल में लाए जाने पर राम दूर से ही नारद को पहचानकर सिंहासन से उठते हैं, उनका सम्मान करते हैं और सेवकों को हटाते हैं। नारद बताते हैं कि उनकी माताएँ शोक-सागर में डूब रही हैं: कौशल्या और सुमित्रा दिन-रात रोती हैं, सिर और छाती पीटती हैं, खाना-पीना-सोना छोड़ चुकी हैं और कभी भी प्राण छोड़ सकती हैं, और कैकेयी तथा सुप्रभा भी दुखी हैं। राम-लक्ष्मण शस्त्र डालकर रोते हैं, नारद को सबसे बड़ा मित्र कहकर धन्यवाद देते हैं और कहते हैं कि माता-पिता का उपकार भूलने वाला महाकृतघ्न है।
राम विभीषण से कहते हैं कि उनके भवन में समय का पता ही नहीं चला, पर अब हमें माताओं और हमारी दूसरी माता अयोध्या के दर्शन की अभिलाषा है। विभीषण चरणों में सिर झुकाकर विनती करते हैं कि सोलह दिन और रुकें, तब तक दूत शुभ समाचार ले जाएँगे, और वे मान जाते हैं। दक्षिण से आते विद्याधरों को देख कौशल्या सुमित्रा से कहती हैं कि वे अवश्य शुभ समाचार लाए हैं; दूत भरत को रावण वध, विभीषण के राज्याभिषेक, लक्ष्मण के चक्ररत्न, इन्द्रजीत, मेघनाद और कुंभकर्ण की मुक्ति और निर्वाण, तथा गरुड़ेन्द्र से मिले विमानों का वृत्तांत सुनाते हैं।
विद्याधर स्वर्ण और रत्नों से भरे हजारों विद्यामयी वाहन लेकर आते हैं और नगर में इतनी रत्नवर्षा करते हैं कि हर घर में पर्वत समान ढेर लग जाते हैं; जब घोषणा होती है कि जिसे जो चाहिए ले जाए, तो लोग कहते हैं कि हमें किसी वस्तु की कमी नहीं, अयोध्या से दरिद्रता मिट गई। सोलह दिन में चतुर विद्याधर शिल्पी बारह योजन लंबी और नौ योजन चौड़ी अयोध्या को रत्नमय मंदिरों, स्वर्ण की सीढ़ियों, रत्नों के किनारों वाले कमल सरोवरों और नंदनवन जैसे उद्यानों से सजा देते हैं, और तब माताओं का ही ध्यान करते बलभद्र और नारायण लंका से प्रस्थान करते हैं।