पर्व 56
राम और रावण की सेना का प्रमाण वर्णन
गौतम स्वामी अक्षौहिणी का प्रमाण बताते हैं, और दोनों पक्षों के लोग रावण की चार हजार और राम की दो हजार अक्षौहिणी सेना के बल पर चर्चा करते हैं।
कथा खंड लंका का युद्धसारांश
श्रेणिक के पूछने पर गौतम स्वामी (इंद्रभूति) पत्ति से अनीकिनी तक सेना के आठ भेद बताते हैं, जिनमें हर भेद पिछले का तिगुना है, और दस अनीकिनी की एक अक्षौहिणी होती है। रावण की चार हजार अक्षौहिणी सेना विशाल है, फिर भी राम की भक्ति से निर्भय सुग्रीव की सेना उसके सामने डटती है। दोनों ओर लोग चर्चा करते हैं: कोई कहता है कि अठारह हजार रानियों से तृप्त न होकर रावण एक सीता के कारण क्षय की ओर जा रहा है, कोई हनुमान के कार्यों और लक्ष्मण द्वारा खरदूषण के वध की प्रशंसा करता है, तो सुवक्र विद्याधर हँसता है कि रावण के समुद्र के आगे वानरवंशियों का बल गाय के खुर जितना है।
क्या हुआ
5 बिंदु
श्रेणिक के पूछने पर इंद्रभूति गणधर ने मगध के राजा से आगम में बताए सेना के आठ भेद कहे: पत्ति, सेना, सेनामुख, गुल्म, वाहिनी, पृतना, चमू और अनीकिनी। एक रथ, एक हाथी, पाँच पयादे और तीन घोड़े पत्ति कहलाते हैं, तीन रथ, तीन हाथी, पंद्रह पयादे और नौ घोड़े सेना, और नौ रथ, नौ हाथी, पैंतालीस पयादे और सत्ताईस घोड़े सेनामुख।
गुल्म में सत्ताईस रथ, सत्ताईस हाथी, एक सौ पैंतीस पयादे और इक्यासी घोड़े; वाहिनी में इक्यासी रथ, इक्यासी हाथी, चार सौ पाँच पयादे और दो सौ तैंतालीस घोड़े; पृतना में दो सौ तैंतालीस रथ, दो सौ तैंतालीस हाथी, बारह सौ पंद्रह पयादे और सात सौ उनतीस घोड़े; चमू में सात सौ उनतीस रथ, सात सौ उनतीस हाथी, छत्तीस सौ पैंतालीस पयादे और इक्कीस सौ सत्तासी घोड़े; और अनीकिनी में इक्कीस सौ सत्तासी रथ, इक्कीस सौ सत्तासी हाथी, दस हजार नौ सौ पैंतीस पयादे और पैंसठ सौ इकसठ घोड़े होते हैं, इस प्रकार हर भेद तिगुना बढ़ता है। दस अनीकिनी की एक अक्षौहिणी होती है, जिसमें इक्कीस हजार आठ सौ सत्तर रथ, इक्कीस हजार आठ सौ सत्तर हाथी, एक लाख नौ हजार तीन सौ पचास पयादे और पैंसठ हजार छह सौ दस घोड़े होते हैं।
ऐसी चार हजार अक्षौहिणी सेना सहित रावण अति बलवान था, फिर भी किष्किंधापुर के स्वामी सुग्रीव की सेना श्रीराम की भक्ति से निर्भय होकर उसके सामने डटी। सेनाएँ निकट आने पर अनेक पक्षों के लोग चर्चा करने लगे कि विमान रूपी नक्षत्रों का स्वामी, शास्त्रों में प्रवीण रावण रूपी चंद्रमा परस्त्री की इच्छा रूपी बादलों से ढक गया है, अठारह हजार महारूपवती रानियों से तृप्त नहीं हुआ और एक सीता के कारण क्षय को प्राप्त हो रहा है।
कोई राम के पक्ष के योद्धाओं का यश गाता, कोई समुद्र से भी गंभीर रावण की सेना का वर्णन करता, कोई दंडकवन में खरदूषण और लक्ष्मण के युद्ध का वर्णन करता कि अति बलवान लक्ष्मण ने खरदूषण को मारा, और कोई कहता कि राम-लक्ष्मण तो महापुरुष हैं, अकेले हनुमान ने ही मंदोदरी का तिरस्कार किया, सीता को धैर्य दिया, रावण की सेना को जीता और लंका के कोट और दरवाजे तोड़े।
तब सुवक्र नामक विद्याधर ने हँसकर कहा कि कहाँ समुद्र समान रावण की सेना और कहाँ गाय के खुर समान वानरवंशियों का बल; रावण इंद्र को पकड़ लाया, अनेकों को जीता, मनुष्यों के सरताज इस चक्रवर्ती का नाम सुनकर कौन धैर्य रख सकता है, उसका त्रिशूलधारी भाई कुंभकर्ण प्रलयकाल की अग्नि समान है, और जो मरना चाहते हैं वही उसके चंद्रमा समान छत्र के सामने आएँगे। इस प्रकार दोनों सेनाओं में राग-द्वेष भरे वचन चलते रहे, और ग्रंथ कहता है कि जैसा कर्म का उदय होता है वैसी ही जीव की प्रवृत्ति होती है।