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पर्व 57

रावण का युद्ध के लिये सदल-बल प्रयाण

पत्नियों से विदा लेकर लंका के योद्धा हस्त-प्रहस्त के पीछे युद्ध को निकलते हैं, और अपशकुनों के बावजूद रावण पुष्पक विमान में चल पड़ता है।

कथा खंड लंका का युद्ध

सारांश

शत्रु के निकट आने पर लंका के योद्धा अपनी पत्नियों से विदा लेते हैं, जो उन्हें कभी पीठ न दिखाने और घावों को आभूषण मानने को कहती हैं और आँसुओं को अमंगल मानकर रोक लेती हैं, जबकि योद्धा प्रतिज्ञा करते हैं कि भागते, निहत्थे, बालक, वृद्ध और दीन पर वार नहीं करेंगे। रावण की आज्ञा की प्रतीक्षा किए बिना हस्त और प्रहस्त सबसे पहले निकलते हैं, फिर सिंहों और व्याघ्रों के रथों पर अनेक योद्धा, ढाई करोड़ राक्षसवंशी राजकुमार, मेघवाहन, इंद्रजीत, कुंभकर्ण और पुष्पक विमान में स्वयं रावण। शल्यकी के रोने और गिद्धों के मँडराने जैसे अपशकुनों की परवाह न कर, भामंडल और सुग्रीव पर विशेष क्रोधित राक्षस राम की सेना की ओर बढ़ते हैं।

क्या हुआ

5 बिंदु

  1. सिंह के समान घरों से निकलते योद्धाओं को पत्नियों ने हृदय से लगाया: एक बोली कि आपके कुल की रीति है कि रण से पीछे न हटें, आप भागकर आए तो सुनते ही प्राण त्याग दूँगी, क्योंकि लोग कायरों की स्त्रियों को धिक्कारते हैं, और छाती पर घाव लेकर, टूटे बख्तर के साथ योद्धाओं से प्रशंसित लौटोगे तो सुवर्ण के कमलों से जिनेश्वर की पूजा कराऊँगी; दूसरी बोली कि भागकर आए तो हमारा कोई संबंध नहीं; तीसरी बोली कि पुराने घाव भर गए, अब नए घाव शरीर की शोभा होंगे। कोई नवोढ़ा पति को रण में जाते देख प्रसन्न हुई, कोई रूठी स्त्री मान छोड़कर गले लगी और रण योग्य शिक्षा दी, और किसी क्षत्राणी ने पति के वक्ष पर नख का चिह्न बनाकर शत्रुओं पर होने वाले घात का संकेत किया।

  2. योद्धाओं ने प्रियाओं से कहा कि वही नर श्रेष्ठ है जो रण में प्रशंसा पाए, युद्ध में घाव सहकर मरने वालों की कीर्ति शत्रु भी गाते हैं, और क्षत्रियों का धर्म है कि कायर और शरणागत को न मारें न मारने दें, भागते और निहत्थे से युद्ध न करें, बालक, वृद्ध और दीन को छोड़ योद्धाओं से ही लड़ें। कोई स्त्री बख्तर पहने पति से लिपटी पर शरीर का स्पर्श न होने से दुखी हुई, कोई पति के वक्ष पर कवच देखकर ईर्ष्या करने लगी कि हमें छोड़ कौन स्त्री इनके हृदय से लगी है, तो पति ने कहा कि यह आधा बख्तर है, स्त्री नहीं; स्त्रियों ने आँसुओं को अमंगल मानकर रोक लिया, कोई योद्धा जल्दी में बख्तर पहनना भूल गया और किसी के पुराने घाव हर्ष से फटकर बहने लगे।

  3. सबसे पहले हस्त और प्रहस्त राजा हाथियों के रथों पर चढ़कर रावण से बिना पूछे ही निकले, क्योंकि स्वामी की आज्ञा बिना कार्य करना दोष है, पर बिना आज्ञा स्वामी का कार्य करना महागुण है। मारीच, स्वयंभू, शंभु, शुक, चारण, मकर, वज्रघोष, कुंभ, माल्यवान, जंबूमाली, महाबल आदि योद्धा सिंहों के रथों पर और वज्रोदर, शक्रधनु, चंद्र, महामाली, कनक आदि अनेक राजा व्याघ्रों के रथों पर निकले, और अनेक योद्धा पवन समान तेज घोड़ों या हाथियों के रथों पर चले।

  4. सबसे आगे निर्मल वंश में जन्मे, इंद्र समान पराक्रमी ढाई करोड़ राक्षसवंशी राजकुमार निकले, फिर महाबली मेघवाहन और इंद्रजीत, और ज्योतिप्रभ नाम के विमान में त्रिशूल लेकर कुंभकर्ण। स्वयं रावण पुष्पक विमान में बैठकर देवोपनीत शस्त्रों और अनेक सामंतों सहित, सेना से आकाश को ढकता हुआ लंका से निकला, और अनेक योद्धा रथ, घोड़े, हाथी, सिंह, बैल, भैंसे, ऊँट, भेड़िये, मृग, अष्टापद, मगरमच्छ और पक्षियों के, विद्या से बने दिव्य वाहनों पर उसके साथ चले।

  5. भामंडल और सुग्रीव पर रावण का महाक्रोध था, इसलिए राक्षसवंशी उनसे युद्ध करने चले, और रावण के प्रयाण के समय अनेक अपशकुन हुए: दाहिनी ओर शल्यकी (सेही) मंडल बाँधकर भयानक शब्द करती मानो युद्ध को रोक रही थी, गिद्ध आकाश में भयंकर शब्द करते मँडरा रहे थे मानो रावण की मृत्यु बता रहे हों, और रोने के शब्द आदि हुए। सब शास्त्रों के ज्ञाता होते हुए भी रावण आदि शूरवीरता के मान से अपशकुनों को न गिनकर निर्भय होकर राम की सेना के सामने आए, क्योंकि कर्मों के उदय से जब काल आता है तो इंद्र भी उसे नहीं टाल सकता, और पापों के बढ़ने से पुण्य क्षीण हो जाता है।