पर्व 58
युद्ध में हस्त-प्रहस्त के मरण का वर्णन
पहली बड़ी मुठभेड़ में वानरवंशी वीर नल और नील रावण के सेनापति हस्त और प्रहस्त को मार डालते हैं और राक्षस सेना शिथिल पड़ जाती है।
कथा खंड लंका का युद्धसारांश
रावण की समुद्र समान सेना के सामने राम के वीर हाथियों और सिंहों के रथों पर निकले, विभीषण रत्नप्रभ विमान में और राम, लक्ष्मण, सुग्रीव तथा हनुमान हंस विमान में। बाजों और पशुओं के कोलाहल के बीच सेनाएँ टकराईं; पहले राक्षसों ने वानरों को दबाया, वानरों के संभलने पर हस्त-प्रहस्त ने धावा बोलकर उन्हें भगाया, तब सुग्रीव के चचेरे भाई नल और नील उनसे भिड़े। नल ने हस्त को और नील ने प्रहस्त को मारा, और सेनापतियों के मरते ही राक्षस सेना टूटी माला के दानों की तरह बिखरने लगी।
क्या हुआ
5 बिंदु
रावण की समुद्र समान सेना देखकर राम के कार्य में तत्पर नल, नील, हनुमान, जामवंत आदि अनेक उदार शूरवीर हाथियों के रथों पर निकले, महेंद्र, रतिवर्धन, भानुमंडल, अनुधर, शर्वद, शरभ आदि विद्याधर सिंहों के रथों पर निकले, और कई राजा हनुमान के साथ चले। रावण का भाई और अब श्रीराम का अतिप्रशंसनीय हितकारी विभीषण रत्नप्रभ विमान पर चढ़ा, और राम, लक्ष्मण, सुग्रीव तथा हनुमान हंस विमान पर बैठकर निकले।
प्रलयकाल के मेघ समान भयंकर झंझा, भेरी, मृदंग, कंपाल आदि बाजे बजे, सिंहों, हाथियों, भैंसों, ऊँटों, पक्षियों और मृगों के शब्दों से दिशाएँ गूँज उठीं, और राम-रावण की सेनाओं का आमना-सामना होते ही पृथ्वी और पर्वत काँप गए तथा सबको जीवन का संदेह हुआ। योद्धा एक-दूसरे को ललकारकर करौत, कुठार, खड्ग, सेल, गदा, शक्ति और बाणों से लड़ने लगे, एक-दूसरे पर गिरते और शत्रु सेना में घुसते रहे।
लंका की सेना ने वानरवंशियों को ऐसे दबाया जैसे शेर गज को दबाता है, फिर वानरवंशियों की प्रबल सेना ने राक्षसों को मारकर अपनी सेना को धैर्य बँधाया; अपनी सेना को दबी देख महायोद्धा हस्त और प्रहस्त हाथियों के रथों पर चढ़कर वानरवंशियों पर दौड़े, अपने सामंतों से बोले कि भय मत करो, और वानरवंशी योद्धाओं को भगा दिया।
तब वानरवंशियों के नायक, सुग्रीव के चाचा के पुत्र शूरवीर नल और नील महाक्रोधित होकर हस्त और प्रहस्त से भिड़े, दोनों ओर के अनेक योद्धा मरे, और नल ने उछलकर हस्त को और नील ने प्रहस्त को मार डाला।
दोनों के मरते ही राक्षसों की सेना शिथिल हो गई, और गौतम स्वामी ने श्रेणिक से कहा कि सेना तभी तक रण में ठहरती है जब तक सेनापति को देखती है, उसके मरते ही माला टूटने पर दानों की तरह बिखर जाती है; बड़े-बड़े राजा भी प्रधान पुरुष के बिना कार्य सिद्ध नहीं कर पाते, जैसे राहु के योग से सूर्य की किरणें मंद हो जाती हैं, और पुण्य के योग से ही सब सुख-साधन अनायास मिलते हैं।