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पर्व 59

हस्त-प्रहस्त और नल-नील के पूर्वभव का वर्णन

गौतम स्वामी बताते हैं कि नल-नील ने हस्त-प्रहस्त को इसलिए मारा क्योंकि पूर्वभव में उन दोनों ने इनकी हत्या की थी।

कथा खंड लंका का युद्ध

सारांश

श्रेणिक पूछते हैं कि विद्या में प्रवीण हस्त-प्रहस्त जैसे सामंतों को नल-नील ने कैसे मारा, तो गौतम स्वामी इस बैर को पूर्वभव से जोड़ते हैं: कुशस्थल नगर के धर्मात्मा ब्राह्मण भाई इंधक और पल्लव को राजा के दान के समय दो क्रूर विरोधियों ने मार डाला था। मारे गए भाई भोगभूमि, स्वर्ग, श्रावक-व्रत और फिर स्वर्ग से होते हुए किष्किंधापुर में नल-नील हुए, जबकि हत्यारे चूहे और मिथ्या तपस्वी के भवों से होते हुए अरिंजयपुर के राजा अग्निकुमार के पुत्र हस्त-प्रहस्त हुए। अंत में गौतम स्वामी उपदेश देते हैं कि जो जिसे मारता है वह उससे मारा जाता है, पुण्य ही रक्षा करता है, और सम्यक्त्व मिथ्यात्व के अंधकार को नष्ट कर मोक्ष तक पहुँचाता है।

क्या हुआ

5 बिंदु

  1. श्रेणिक ने आश्चर्य से पूछा कि विद्या में प्रवीण हस्त-प्रहस्त जैसे सामंतों को नल-नील ने कैसे मारा, क्या यह पूर्वभव का बैर था या इसी भव का; गणधर देव ने कहा कि कर्मों से बँधे संसारी जीवों की अनेक योनियाँ हैं, और पूर्वकर्म की यही परंपरा है कि जिसने जिसको मारा वह उसको अवश्य मारेगा, और जिसने जिसको छुड़ाया वह उसको छुड़ाएगा।

  2. कुशस्थल नगर में एक माता के पुत्र दो निर्धन ब्राह्मण भाई इंधक और पल्लव खेती करते थे, जिनका स्त्री-पुत्रादि परिवार दयावान और साधुओं की भक्ति में तत्पर था, और एक जैनी मित्र के प्रभाव से वे दान आदि धर्म के धारी हुए; एक दूसरा निर्धन जोड़ा महानिर्दयी और मिथ्यामार्गी था, जिसने राजा के यहाँ दान बँटते समय ब्राह्मणों में कलह होने पर इंधक और पल्लव को मार डाला। दान के प्रभाव से इंधक और पल्लव मध्यम भोगभूमि में जन्मे, वहाँ दो पल्य की आयु भोगकर मरे और दोनों देव हुए।

  3. उन्हें मारने वाले क्रूर, अधर्मी पापी मरकर कालिंजर नाम के वन में चूहे हुए, क्योंकि साधुओं के निंदक, कपटी मिथ्यादृष्टियों की ऐसी ही गति होती है; तिर्यंच गति में भ्रमण कर वे मनुष्य होकर तापसी बने, फल-पत्ते खाकर तीव्र तप से शरीर कृश किया, और कुज्ञान सहित मरकर विजयार्ध की दक्षिणश्रेणी के अरिंजयपुर में राजा अग्निकुमार और रानी अश्विनी के पुत्र हुए, जो जगत-प्रसिद्ध रावण के सेनापति हस्त और प्रहस्त बने।

  4. इंधक और पल्लव देवलोक से चयकर मनुष्य हुए, फिर श्रावक के व्रत पालकर स्वर्ग में उत्तम देव हुए और स्वर्ग से चयकर किष्किंधापुर में नल और नील दोनों भाई हुए; पहले भव में हस्त-प्रहस्त के जीवों ने नल-नील के जीवों को मारा था, इसीलिए अब नल-नील ने हस्त-प्रहस्त को मारा।

  5. गौतम स्वामी ने उपदेश दिया कि जो जिसे मारता है वह उससे मारा जाता है, जो जिसका पालन करता है वह उसका पालन करता है, और जो जिससे उदासीन होता है वह उससे उदासीन होता है; किसी को देखकर बिना कारण क्रोध आए तो जानो कि वह पूर्वभव का शत्रु है और प्रेम हो तो पूर्वभव का मित्र। जहाज का फटना, मगरमच्छों का दुख और म्लेच्छों की बाधा पाप का फल है, पुण्य के बिना हाथी-घोड़ों और अपार सेना वाले राजा की भी कोई देव या बंधु रक्षा नहीं करता, पात्रदान, व्रत, शील और सम्यक्त्व से ही जीव की रक्षा होती है, क्षमा के समान कोई तप नहीं, और जैसे सूर्य के प्रकाश में मार्ग दिखता है वैसे ज्ञान रूपी सूर्य मिथ्यात्व का अंधकार मिटाकर जीव को अविनाशीपुर मोक्ष तक पहुँचाता है।