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पर्व 60

राम-लक्ष्मण को अनेक विद्याओं का लाभ

इंद्रजीत और मेघवाहन द्वारा सुग्रीव और भामंडल को नागपाश में बाँधने पर राम गरुड़ेंद्र का वर याद करते हैं, और दोनों भाइयों को दिव्य विद्याएँ और शस्त्र मिलते हैं।

कथा खंड लंका का युद्ध

सारांश

युद्ध दो दिन तक चलता है: मारीच आदि राक्षस हस्त-प्रहस्त का बदला लेने आते हैं, हनुमान वज्रोदर को मारते, रावण के पुत्र जंबूमाली को भगाते और स्वयं रावण तक पहुँचते हैं, और कुंभकर्ण निद्रा विद्या से वानरों को सुला देता है, जिन्हें सुग्रीव प्रतिबोधिनी विद्या से जगाता है। फिर इंद्रजीत और मेघवाहन दिव्य बाणों से सुग्रीव और भामंडल को परास्त कर नागपाश में बाँध लेते हैं, कुंभकर्ण हनुमान को पकड़ लेता है, जो अंगद द्वारा कुंभकर्ण का वस्त्र खींच लेने पर छूट जाते हैं, और दोनों भतीजे चाचा विभीषण से लड़ने के बजाय हट जाते हैं। राम गरुड़ेंद्र का वर याद करते हैं, जो चिंतावेग देव के हाथ सिंहवाहिनी और गरुड़वाहिनी विद्याएँ तथा अनेक दिव्य शस्त्र भेजता है।

क्या हुआ

8 बिंदु

  1. हस्त-प्रहस्त के मरण से क्रोधित मारीच, सिंहजघन, स्वयंभू आदि राक्षस योद्धा मदन, मदनांकुर, नंदन आदि वानरवंशियों से लड़े; मारीच ने संताप को और उद्यान ने विघ्न को मारा, और सूर्यास्त होने पर पतियों को प्राणरहित सुनकर रोती स्त्रियों की रात महादीर्घ हो गई। दूसरे दिन वज्राक्ष, मृगेंद्र, विधि आदि जीवन से निःस्पृह होकर लड़े: शार्दूल ने वज्रोदर को घायल किया, शंभु ने विशालद्युति को, स्वयंभू ने विजय को लोहे के शस्त्र से और विधि ने वितापि को गदा से मारा, तब सेना को दुखी देख सुग्रीव स्वयं युद्ध में आए और हनुमान हाथियों के रथ पर चढ़कर लड़ने लगे, जिन्हें देख राक्षस सिंह को देख गायों की तरह डरे और कहने लगे कि यह वानरध्वज आज बहुतों की स्त्रियों को विधवा करेगा।

  2. हनुमान ने माली को पराङ्मुख किया, वज्रोदर का रथ दो बार तोड़कर उसे मार डाला, और जब रावण के महाबली पुत्र जंबूमाली ने उनकी ध्वजा छेदकर वक्ष में तीक्ष्ण बाण मारे, जो उन्हें नए कमल की डंडी के स्पर्श-से लगे, तो हनुमान ने उसका बख्तर भेदा, धनुष तोड़ा और चंद्रवक्र नामक बाण से उसका रथ तोड़ दिया, जिससे उसके सिंह भाग छूटे और रावण की सेना दसों दिशाओं में भागी। सिंह के रथ पर रावण के पास पहुँचे हनुमान से पहले महोदर और फिर सारे राक्षस भिड़े, पर जैसे दुर्जनों के बाण संयमी को नहीं डिगाते वैसे उनका एक भी बाण हनुमान को नहीं लगा, तब सुषेण, नल, नील, विराधित, जाम्बूनद, महाबल आदि वानरवंशी राजाओं ने आकर राक्षस सेना का विध्वंस कर दिया।

  3. रावण युद्ध को चला तो कुंभकर्ण उसे नमस्कार कर स्वयं युद्ध को चला; चंद्ररश्मि, रतिवर्धन, अंग, अंगद, कुमुद, रत्नजटी आदि राम के अनेक योद्धा उससे लड़े, पर कुंभकर्ण ने निद्रा नामक विद्या से सबको वश कर लिया, वानरवंशी नींद से झूमने लगे और उनके हाथों से हथियार गिर पड़े, तब सुग्रीव ने प्रतिबोधिनी विद्या प्रकट की और सब जाग उठे। कपिध्वजों में फिर उत्साह आया और रावण की सेना पीछे हटी, तब रावण स्वयं युद्ध को आया, पर बड़े बेटे इंद्रजीत ने प्रणाम कर कहा कि हमारे होते आप युद्ध करें तो हमारा जन्म निष्फल है, आप निश्चिंत रहें, और हाथी पर चढ़कर युद्ध करने लगा।

  4. इंद्रजीत ने आते ही वानरवंशियों की सेना को विह्वल कर दिया, सुग्रीव की सेना में ऐसा कोई सुभट न रहा जो उसके बाणों से घायल न हुआ हो, और लोग कहने लगे कि यह इंद्रजीत नहीं, अग्निकुमार या सूर्य है; सुग्रीव और भामंडल स्वयं उससे लड़ने आए, इंद्रजीत ने सुग्रीव को धिक्कारा कि हे पापी, स्वामीद्रोही वानरवंशी! रावण जैसे स्वामी को छोड़कर शत्रु का किंकर हुआ है, क्या वे दोनों भूमिगोचरी भाई तेरी रक्षा करेंगे, तो सुग्रीव ने कहा कि मान के शिखर पर चढ़े तेरा मान अभी नष्ट करता हूँ। मेघवाहन ने भामंडल को ललकारा, और विराधित तथा वज्रनक्र ने चक्र रूपी शस्त्रों से एक-दूसरे के बख्तर पीस डाले, जिनसे उछले अग्नि-कण उल्कापात के समान गिरने लगे।

  5. सुग्रीव ने वज्रदंड से इंद्रजीत के शस्त्र दूर किए; इंद्रजीत ने हाथी से उतरकर सिंह के रथ पर चढ़ सुग्रीव पर मेघबाण चलाया जिससे सब दिशाएँ जलमय हो गईं, तो सुग्रीव ने पवनबाण चलाकर मेघबाण को विलीन कर दिया और इंद्रजीत का छत्र और ध्वजा उड़ा दी। मेघवाहन के अग्निबाण से भामंडल का धनुष भस्म हुआ और सेना में आग लग गई, तो भामंडल ने मेघबाण से उसे बुझाया; फिर मेघवाहन ने भामंडल का रथ तोड़ा, तामस बाण से उसकी सेना में अंधकार कर दिया और नागपाश से उसे बाँध लिया, जिससे चंदन के वृक्ष पर नागों की तरह मायामयी सर्प उसके शरीर से लिपट गए, और इसी तरह इंद्रजीत ने सुग्रीव को नागपाश से बाँधा और दोनों धरती पर गिर पड़े।

  6. विद्याबल में महाप्रवीण विभीषण ने हाथ जोड़कर राम-लक्ष्मण से कहा कि मंदोदरी के दोनों पुत्रों ने हमारी सेना के दोनों मूल योद्धा सुग्रीव और भामंडल पकड़ लिए हैं, कुंभकर्ण ने महायुद्ध में हनुमान को पकड़ लिया है, जिनके छत्र, ध्वजा, धनुष और बख्तर उसके बाणों से टूट गए, और निराश्रय सेना भाग रही है, इसलिए इंद्रजीत और मेघवाहन उन्हें ले जाएँ उससे पहले मैं उन्हें लेने जाता हूँ। उसी समय सुग्रीव का पुत्र अंगद चुपके से कुंभकर्ण के पास गया और उसका नीचे का वस्त्र खींच लिया, और जब वह लज्जा से कपड़े सँभालने लगा तो हनुमान पिंजरे से पक्षी की तरह उसके हाथों से निकल गए और अंगद के साथ एक विमान में जा बैठे, जबकि अंगद का भाई अंग और विराधित लक्ष्मण सहित सुग्रीव और भामंडल की भागती सेना को धैर्य देकर रोकने लगे।

  7. विभीषण को आता देख इंद्रजीत ने सोचा कि न्याय से हमारे पिता और चाचा में कोई भेद नहीं, इसलिए चाचा विभीषण से युद्ध करना उचित नहीं और उनके सामने से हट जाने में कोई दोष नहीं, और नागपाश से बँधे भामंडल और सुग्रीव तो अवश्य ही मर जाएँगे; ऐसा सोचकर दोनों अभिमानी भाई विभीषण से टलकर निकल गए, और विभीषण त्रिशूल लेकर रथ से उतरे और सुग्रीव तथा भामंडल को नागपाश से बँधे और मूर्छित देखकर दुखी हुए।

  8. लक्ष्मण ने राम से कहा कि विद्याधरों के अधिपति, महासेना के स्वामी ये दोनों महाशक्तिशाली रावण के पुत्रों द्वारा शस्त्ररहित कर नागपाश में बाँध लिए गए हैं, इनके बिना रावण को कैसे जीतेंगे; तब राम ने गरुड़ेंद्र का वर याद किया, जो उसने वंशस्थल पर्वत पर देशभूषण-कुलभूषण मुनियों का उपसर्ग दूर करने पर दिया था, और स्मरण करते ही गरुड़ेंद्र का सिंहासन काँपा, अवधिज्ञान से राम-लक्ष्मण का कार्य जानकर उसने चिंतावेग नाम के देव को भेजा, जिसने राम को सिंहवाहिनी और लक्ष्मण को गरुड़वाहिनी विद्या दी। उस देव ने अपनी ओर से जलबाण, अग्निबाण, पवनबाण आदि दिव्य शस्त्र, चंद्र-सूर्य समान छत्र-चमर, अनेक ज्योतिर्मय रत्न, लक्ष्मण को विद्युद्वक्त्र नाम की गदा और राम को शत्रुओं को भयभीत करने वाले हल-मूसल दिए, और दोनों भाइयों ने उसका बहुत सम्मान कर जिनेंद्र प्रभु की पूजा की और गरुड़ेंद्र की बहुत प्रशंसा की।