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पर्व 55

राम-लक्ष्मण को विभीषण का समागम

सीता को लौटाने की सलाह देने पर रावण के क्रोध और धमकी का सामना कर विभीषण तीस अक्षौहिणी सेना सहित लंका छोड़कर राम की शरण आता है।

कथा खंड लंका का युद्ध

सारांश

राम की सेना निकट आने पर विभीषण रावण को कीर्ति बचाने के लिए सीता लौटाने की सलाह देता है; इंद्रजीत उसे कायर कहता है, विभीषण इंद्रजीत को फटकारता है, और रावण भाई पर खड्ग लेकर दौड़ता है, तो विभीषण भी वज्रमय स्तंभ उखाड़ लेता है, पर मंत्री दोनों को अलग करते हैं। रावण की आज्ञा से निकाला गया विभीषण तीस अक्षौहिणी सेना और सामंतों सहित हंसद्वीप आता है; राम के मंत्री दृष्टांतों के साथ उसकी निष्ठा पर विचार करते हैं, और राम उसका आदर कर उसे लंका का अधिपति बनाने का वचन देते हैं। भामंडल आ पहुँचता है, सेना रणभूमि की ओर बढ़ती है, और युद्ध के अवसर से हर्षित रावण राम की दो हजार अक्षौहिणी के सामने चार हजार अक्षौहिणी सेना जुटाता है।

क्या हुआ

7 बिंदु

  1. राम की सेना निकट जानकर लंका के लोग प्रलयकाल की तरंगों के समान क्रोधित हुए और मारीच, अमलचंद्र, भास्कर, सिंहप्रभ, हस्त, प्रहस्त आदि अनेक योद्धा शस्त्रों सहित स्वामी के पास आए। तब विभीषण ने रावण को प्रणाम कर शास्त्रसम्मत वचन कहे कि हे प्रभो! कुंद के पुष्प समान उज्ज्वल आपकी कीर्ति परस्त्री के कारण क्षणमात्र में नष्ट हो जाएगी, श्रीराम बड़े पुरुष हैं, आपके समान हैं, इसलिए जानकी को शीघ्र उनके पास भेज दो, क्योंकि अपनी वस्तु ही प्रशंसा योग्य है और पराई वस्तु यश का नाश करती है।

  2. पिता के मन की बात जानकर रावण के पुत्र इंद्रजीत ने विभीषण से कहा कि तुमसे किसने पूछा, किसने अधिकार दिया जो उन्मत्त के समान बोल रहे हो, युद्ध से डरते हो तो घर के कोने में बैठे रहो, ऐसा दुर्लभ स्त्रीरत्न पाकर अज्ञानी के सिवा कौन छोड़ेगा। विभीषण ने तिरस्कार से कहा, रे पापी! तू पुत्र होकर शत्रु है, तेरा कुबुद्धि पिता सीता नहीं, राक्षस रूपी सर्पों के बिल लंका में विषनाशक जड़ी लाया है, और सुमित्रा का पुत्र लक्ष्मण क्रोधित सिंह के समान है, जिसके हाथ में सागरावर्त धनुष और आदित्यमुख अमोघ बाण हैं, और जिससे महेंद्र, मलय, हनुमान, सुग्रीव, त्रिपुर, नल, नील, रत्नद्वीप का स्वामी वेलंधर आदि अनेक महाबली विद्याधर आ मिले हैं।

  3. महाक्रोधित रावण म्यान से खड्ग निकालकर विभीषण को मारने दौड़ा, तो विभीषण ने भी युद्ध के लिए वज्रमय स्तंभ उखाड़ लिया, और मंत्रियों ने समझाकर उग्रतेज वाले दोनों भाइयों को रोका; फिर रावण ने कुंभकर्ण और इंद्रजीत से कठोर शब्दों में कहा कि यह दुरात्मा विभीषण मेरे अहित में तत्पर है, इसे मेरी नगरी से निकाल दो, यह लंका में रहे और मैं इसे न मारूँ तो मेरा जीवन निरर्थक है। ‘क्या मैं रत्नश्रवा का पुत्र नहीं?’ कहकर विभीषण तीस अक्षौहिणी सेना (छह लाख छप्पन हजार एक सौ हाथी, उतने ही रथ, उन्नीस लाख अड़सठ हजार तीन सौ घोड़े और बत्तीस लाख अस्सी हजार पाँच सौ पयादे) तथा विद्युद्घन, इंद्रवज्र, इंद्रप्रचंड, चपल, उद्धत, अशनिसंघात, काल और महाकाल आदि प्रमुख सामंतों और उनके परिवारों सहित लंका से निकला।

  4. विभीषण सपरिवार हंसद्वीप में जल के किनारे ऐसे ठहरा जैसे नंदीश्वर द्वीप में देव ठहरते हैं; उसके आने से वानरवंशियों की सेना काँप उठी, लक्ष्मण ने सागरावर्त धनुष और सूर्यहास खड्ग की ओर देखा और राम ने वज्रावर्त धनुष उठाया, पर विभीषण के भेजे बुद्धिमान द्वारपाल ने कहा कि सीता को लाने के समय से दोनों भाइयों में विरोध है जो आज पूरी तरह बिगड़ गया, इसलिए आपके भक्त विभीषण आपकी शरण आए हैं और जो आज्ञा होगी वही करेंगे। मंत्री सुमतिकांत ने कहा कि हो सकता है रावण ने कपट से भेजा हो, राजाओं की अनेक चेष्टाएँ होती हैं और भाइयों का फिर मिल जाना कोई आश्चर्य नहीं।

  5. महाबुद्धिमान मतिसमुद्र ने कहा कि दोनों भाइयों का विरोध सब सुनते हैं, विभीषण महाधर्मात्मा, नीतिवान, शास्त्रज्ञ, दयावान और मित्रता में दृढ़ है, और भाई होने से कुछ नहीं होता, कर्म का उदय सबका अलग होता है: राजा सूर्यमेघ और रानी मतिक्रिया ने चावलों में छिपाकर गुप्त रूप से जो सोना दान किया, उसके लोभ में कपटी ब्राह्मण गिरि ने अपने भाई गोभूत को मार डाला। और कौशांबी के गृहस्थ बृहद्धन के पुत्र अहिदेव-महिदेव ने परदेश में सब धन बेचकर एक रत्न खरीदा, जिसे हाथ में लेते ही एक-दूसरे को मारने के भाव होते, माता को देने पर उसके भी वही भाव हुए, और कालिंदी नदी में फेंकने पर मछली के पेट से वह उनकी बहन के हाथ आया तो उसके भी वही भाव हुए; तब सबने रत्न चूर डाला और माता, बहन और दोनों भाइयों ने जिनदीक्षा ली, अर्थात् धन के लोभ से भाइयों में भी बैर होता है और ज्ञान होने पर मिट जाता है।

  6. राम ने द्वारपाल से प्रेम से बात कर विभीषण को आदर से बुलाया; विभीषण ने प्रतिज्ञा की कि श्री जिननाथ इस भव और परभव के स्वामी हैं और रघुनाथ इस लोक के स्वामी हैं, और राम ने कहा कि मैं निःसंदेह तुझे लंका का अधिपति बनाऊँगा। उसी समय अनेक विद्याएँ सिद्ध किए विजयार्ध पर्वत का अधिपति भामंडल भी आ गया, जिससे सब महाहर्षित हुए, और हंसद्वीप में आठ दिन रहकर सेना वानरवंशियों को आगे रखकर लंका की ओर बीस योजन चौड़ी रणभूमि में पहुँची।

  7. सेना का कोलाहल सुनकर रावण हर्षित हुआ कि बहुत दिनों में रण का उत्साह हुआ है, और उसने सब सामंतों को युद्ध की तैयारी की आज्ञा दी; भास्करपुर, पयोधपुर, कंचनपुर, व्योमपुर, कंपनपुर, विशालपुर, अश्वपुर, रत्नपुर आदि नगरों के बड़े-बड़े विद्याधर अपनी सेनाओं सहित आए और रावण ने उन्हें शस्त्र, वाहन और बख्तर दिए। रावण के पास चार हजार अक्षौहिणी सेना हुई और राम के पास दो हजार, जिनमें हजार भामंडल की और हजार सुग्रीव की थी, और गौतम स्वामी कहते हैं कि पुण्य के प्रभाव से महापुरुषों के शत्रु भी मित्र हो जाते हैं और पुण्यहीनों के मित्र भी शत्रु।