पर्व 67
बहुरूपिणी विद्या साधन के लिये रावण द्वारा शांतिनाथ मंदिर में पूजा का आयोजन
बंदी भाई-पुत्रों और क्षत्रिय-स्वाभिमान के द्वंद्व में फँसा रावण बहुरूपिणी विद्या सिद्ध करने का निश्चय कर शांतिनाथ मंदिर में पूजा का आदेश देता है।
कथा खंड लंका का युद्धसारांश
दूत की बात सुनकर रावण चिंतित होता है कि शत्रु को जीतने से भाई और पुत्रों का अमंगल होगा, और उन्हें बलपूर्वक छुड़ाकर लाने में शूरवीरता की हीनता है। वह बहुरूपिणी विद्या सिद्ध करने का निश्चय करता है, शांतिनाथ मंदिर को सजवाता है और पूजा का कार्य मंदोदरी को सौंपता है। गौतम स्वामी बताते हैं कि बीसवें तीर्थंकर मुनिसुव्रतनाथ के समय भरतक्षेत्र में जगह-जगह जिनमंदिर थे, और रावण के राजभवन के बीच शांतिनाथ भगवान का चैत्यालय सुशोभित था।
क्या हुआ
5 बिंदु
दूत के वचन सुनकर और मंत्रियों से मंत्रणा कर रावण गाल पर हाथ रखे, नीचे देखते हुए सोचता है कि यदि युद्ध में शत्रुओं को जीतता हूँ तो भाई और पुत्रों का अकुशल है, और यदि शत्रु के कटक से उन्हें बलपूर्वक ले आऊँ तो शूरवीरता में हीनता दिखती है, जो क्षत्रियों को योग्य नहीं।
वह बहुरूपिणी विद्या सिद्ध करने का निश्चय करता है और सेवकों को आज्ञा देता है कि श्री शांतिनाथ भगवान के मंदिर को तोरणों आदि से सजाओ और चैत्यालय में विशेष पूजा कराओ; पूजा का कार्य वह मंदोदरी को सौंपता है।
गौतम गणधर श्रेणिक से कहते हैं कि यह बीसवें तीर्थंकर मुनिसुव्रतनाथ का समय था, जब भरतक्षेत्र में जगह-जगह जिनमंदिर थे, उनमें चारों प्रकार के संघ का विहार होता था, और नगरों में राजा, सेठ और प्रजा सभी जैनी थे जो जिनमंदिर बनवाते थे, जिनकी रक्षा जिनशासन के भक्त देव करते थे।
पर्वत-पर्वत, गाँव-गाँव, नगर-नगर, वन-वन और घर-घर में जिनेन्द्र भगवान के मंदिर थे, जो गीतों और बाजों की ध्वनि से गूँजते, सुगंधित धूप और पुष्प-मालाओं से महकते, झालर, घंटे और ध्वजाओं से शोभित रहते, जिनमें पंचवर्ण की स्वर्णमयी प्रतिमाएँ ऊँचे शिखरों के नीचे विराजमान थीं, जहाँ लोग तीनों काल दर्शन को आते और साधुओं का समागम रहता था।
रावण के राजभवन के मध्य में जगत के जीवों द्वारा वंदनीय श्री शांतिनाथ भगवान का चैत्यालय है। पर्व का उपदेश है कि ऐसे चैत्यालय में पूजा, पाठ, स्वाध्याय, जाप और सामायिक से मन को शांति और सुख मिलता है, जिनदर्शन से जन्म-जन्म के पाप नष्ट होते हैं, और जैसे सूर्य के प्रकाश में आँखों वाले सब पदार्थ देखते हैं वैसे जिनधर्म के प्रभाव से भव्यजीव स्वर्ग-मोक्ष के सुख पाते हैं।