पर्व 66
रावण के द्वारा राम के पास दूत भेजना
रावण का दूत सीता और बंदियों के बदले राम को आधी लंका और सारी पृथ्वी देने का प्रस्ताव रखता है, पर राम सीता को छोड़ना स्वीकार नहीं करते।
कथा खंड लंका का युद्धसारांश
लक्ष्मण की शक्ति निकलने का समाचार सुनकर रावण हँसकर उसे टाल देता है, तब मारीच आदि मंत्री उसे सीता लौटाकर संधि करने की सलाह देते हैं। वे एक कुशल दूत भेजते हैं, पर रावण आँख के इशारे से मंत्रियों का संदेश बदल देता है। दूत सीता के बदले और रावण के भाई तथा पुत्रों की मुक्ति के लिए राम को अपार वैभव और आधी लंका देने का प्रस्ताव रखता है; राम केवल सीता चाहते हैं, बात कटु वचनों में टूट जाती है और लक्ष्मण दूत को भामंडल की तलवार से बचाते हैं।
क्या हुआ
7 बिंदु
हलकारों से लक्ष्मण के स्वस्थ होने और विशल्या से विवाह का समाचार सुनकर रावण हँसता है, ‘शक्ति निकली तो क्या, विशल्या से विवाह किया तो क्या?’ तब मारीच आदि मंत्री निर्भीक होकर कहते हैं कि सिंहवाहिनी और गरुड़वाहिनी विद्या राम-लक्ष्मण को बिना पुरुषार्थ के मिल गईं, आपके दोनों बलवान पुत्र और भाई कुंभकर्ण बंधन में हैं और आपकी दिव्य शक्ति निष्फल गई, आप जीत भी गए तो पुत्रों और भाई का नाश निश्चित है, इसलिए सीता को छोड़ो और राघव से प्रीति करो।
मंत्री संधि के लिए एक बुद्धिमान, तेजस्वी, मधुरभाषी दूत भेजने का निश्चय करते हैं, पर रावण आँखों के इशारे से मंत्रियों का कहा हुआ अर्थ दूषित कर देता है। दूत के बाजे सुनकर वानरवंशी सेना रावण के आने की आशंका से क्षुब्ध होती है, फिर द्वारपाल और भामंडल के द्वारा राम की आज्ञा से दूत को भीतर बुलाया जाता है।
दूत रावण का संदेश सुनाता है, ‘युद्ध से लोगों का क्षय होता है, मेरे साथ प्रीति ही योग्य है। मैं वह रावण हूँ जिसने इन्द्र जैसे राजाओं को बंदी बनाया और जिसकी आज्ञा पाताल, जल और आकाश में सुर-असुर भी नहीं टालते; मैं तुम्हें विद्याधरों सहित समुद्र पर्यंत पृथ्वी दूँगा और लंका के दो भाग कर आधी तुम्हें दूँगा। मेरे भाई और दोनों पुत्रों को भेज दो और सीता मुझे दो, नहीं तो मैं उन्हें बलपूर्वक छुड़ा लूँगा।’
राम उत्तर देते हैं कि मुझे न तेरे राज्य से प्रयोजन है न अन्य स्त्रियों से; हमारी सीता को भेज दो, हम तुम्हारे भाई और दोनों पुत्रों को भेज देंगे, तुम्हारी लंका और सारा राज्य तुम्हारे ही पास रहे, और मैं सीता सहित वन में सुख से विचरूँगा। दूत कहता है कि तुम राजनीति नहीं समझते, बुद्धिमान अपने शरीर की रक्षा करते हैं, स्त्री और धन पर दृष्टि नहीं रखते; गरुड़ेन्द्र के भेजे सिंहवाहन-गरुड़वाहन और छल से बाँधे गए पुत्र और भाई पर गर्व रावण के जीते जी व्यर्थ है, जिसके मारे हुए शत्रुओं की हड्डियों के ढेर कैलाश के शिखर जैसे हैं।
क्रोधित भामंडल दूत को पापी, सियार कहकर मारने के लिए खड्ग निकालते हैं, पर लक्ष्मण उनका हाथ पकड़ लेते हैं और मंत्री समझाते हैं कि स्त्री, बालक, दूत, पशु, पक्षी, वृद्ध, रोगी, सोया हुआ, शस्त्ररहित, शरणागत, तपस्वी और गाय मारने योग्य नहीं होते, दूत तो तोते की तरह स्वामी के ही शब्द बोलता है। तब राम दूत से कहते हैं कि रावण से कहना, मूढ़ मंत्रियों के बहकावे में मत आ, सीता का मिथ्या हठ छोड़कर पुष्पक विमान में विचरता हुआ सम्पूर्ण पृथ्वी का इन्द्र बनकर रह, और बाकी लोग दूत को फिर बोलने न देकर निरादर से निकाल देते हैं।
लंका लौटकर दूत रावण से कहता है कि मैंने राम को रत्नों और विद्याधर-नगरों से भरी समुद्र पर्यंत पृथ्वी, हाथी, घोड़े, रथ, पुष्पक विमान, आपके परिवार की तीन हजार राजकन्याओं से विवाह, सूर्य समान सिंहासन और चंद्र समान छत्र देने को कहा, और यह भी कि आप थोड़ी विभूति रखकर बेंत के आसन पर बैठेंगे, फिर भी राम सीता को ऐसे नहीं छोड़ते जैसे मुनि अट्ठाईस मूलगुण नहीं छोड़ते। राम ने कहा कि ऐसे वचन राजाओं को शोभा नहीं देते, सीता के बिना इन्द्र के भोग भी व्यर्थ हैं, मैं वन के फल खाकर सीता सहित विचरूँगा, और जो परस्त्री हरकर मरने को तैयार है उसे मैं अपनी स्त्री के लिए क्यों न मारूँ।
सुग्रीव ने हँसकर कहा था कि क्या तेरा स्वामी शनि ग्रह के वश है या उसे वात रोग हुआ है, क्या लंका में कोई वैद्य या मंत्रवादी नहीं, नहीं तो संग्राम में लक्ष्मण उसके सारे रोग दूर कर देंगे; दूत ने उसे हाथी के पीछे भौंकने वाला कुत्ता कहा, विराधित को अकेले युद्ध की चुनौती दी और राम से कहा कि जैसे कमल-पत्र की हवा से सुमेरु नहीं डिगता, वैसे ही कैलाश उठाने वाले दशानन को तुम नहीं जीत सकते। भामंडल ने मारने को खड्ग निकाला तो लक्ष्मण ने यह कहकर रोका कि सिंह सियार पर कोप नहीं करता, कपिवंशी कुमारों ने दूत को ललकार कर निकाल दिया, और दूत मानता है कि लक्ष्मण न होते तो उसकी मृत्यु निश्चित थी; गौतम स्वामी कहते हैं कि अनेक शास्त्रों के ज्ञाता और निपुण मंत्रियों वाले भी मोहकर्म से प्रकाशहीन हो जाते हैं।