पर्व 65
राम के कटक में विशल्या का आगमन और लक्ष्मण का शक्ति रहित होना
एक ही रात में अयोध्या से लाई गई विशल्या के कटक में प्रवेश करते ही शक्ति लक्ष्मण के शरीर से निकल भागती है, और लक्ष्मण उठकर उससे विवाह करते हैं।
कथा खंड लंका का युद्धसारांश
हनुमान, भामंडल और अंगद आधी रात को अयोध्या जाकर भरत को जगाते हैं, जिनकी युद्ध-भेरी से नगर में हलचल मच जाती है। भरत केवल जल नहीं, स्वयं विशल्या को भेजते हैं; वे और माता कैकेयी राजा द्रोणमेघ को समझाते हैं और विशल्या हजार राजकन्याओं के साथ आती है। उसके आते ही अमोघविजया नाम की शक्ति-देवी लक्ष्मण का शरीर छोड़कर हनुमान के सामने अपना वृत्तांत कहती है; विशल्या के चंदन से लक्ष्मण और पूरी सेना, यहाँ तक कि बंदी राक्षस कुमार भी स्वस्थ होते हैं, और लक्ष्मण उससे विवाह करते हैं।
क्या हुआ
7 बिंदु
चन्द्रप्रतिम की प्रशंसा कर हनुमान, भामंडल, अंगद आदि मंत्रणा करके क्षणमात्र में अयोध्या पहुँचते हैं और राजभवन में सोए भरत को बाजों की ध्वनि से जगाते हैं। वे प्रणाम कर सीता-हरण, रावण से युद्ध और लक्ष्मण को शक्ति लगने का सारा समाचार कहते हैं, और शोक तथा क्रोध से भरे भरत उसी समय युद्ध की भेरी बजवाते हैं।
आधी रात को पूरी अयोध्या घबराकर जाग उठती है और लोग सोचते हैं कि क्या अतिवीर्य का पुत्र चढ़ आया है; सुभट स्त्रियों को छोड़ कवच पहन खड्ग उठाते हैं, स्त्रियाँ बालकों को लेकर इधर-उधर देखती हैं और लोग सुवर्ण-कलश तथा रत्नों के पिटारे तहखानों में रखवाते हैं। भाई शत्रुघ्न हाथी पर चढ़कर मंत्रियों और शस्त्रधारी योद्धाओं सहित राजमहल आते हैं और भरत सबको युद्ध का आदेश देते हैं।
भामंडल, हनुमान और अंगद बताते हैं कि लंका यहाँ से बहुत दूर है और बीच में समुद्र है, और सूर्योदय से पहले केवल विशल्या का स्नान-जल माँगते हैं। भरत कहते हैं, ‘जल का क्या, राजकुमारी विशल्या को ही ले जाओ, मुनिराज ने मुझसे कहा था कि वह लक्ष्मण की रानी होगी,’ और द्रोणमेघ के पास एक विश्वासी पुरुष भेजते हैं; समाचार सुनकर द्रोणमेघ महाक्रोधित होकर युद्ध को तैयार होते हैं, तब भरत और माता कैकेयी जाकर उन्हें समझाते हैं और वे विशल्या को भेजने को तैयार होते हैं।
भामंडल, हनुमान और अंगद विशल्या को एक हजार से अधिक राजकन्याओं सहित विमान में बैठाकर क्षणमात्र में रणभूमि पहुँचते हैं। जैसे-जैसे विशल्या कटक में प्रवेश करती है, लक्ष्मण की मूर्च्छा दूर होती जाती है, और देवरूपिणी शक्ति अग्नि के स्फुलिंगों के साथ लक्ष्मण के शरीर से ऐसे निकलती है मानो दुष्ट स्त्री घर से निकली हो; तब हनुमान उसे पकड़ लेते हैं।
हाथ जोड़कर वह कहती है कि मैं तीनों लोकों में प्रसिद्ध अमोघविजया नाम की शक्तिरूपी विद्या हूँ, जो साधे उसके वश होती हूँ; जब कैलाश पर्वत पर बाली मुनिराज प्रतिमा योग धारण कर खड़े थे और रावण ने जिनचैत्यालय में अपने हाथ की नस बजाकर जिनेन्द्र के गुण गाए, तब धरणेन्द्र का आसन कंपित हुआ और उसने रावण के मना करने पर भी हठपूर्वक मुझे उसे दिया। मैं जिसे लगूँ उसके प्राण हर लेती हूँ और महासती विशल्या के सिवा कोई मुझे दूर नहीं कर सकता, जिसके पूर्वभव के उग्र तप के कारण मैं उसके दर्शन मात्र से भाग रही हूँ; तब तत्वज्ञ हनुमान उसे क्षमा कर विदा कर देते हैं।
लज्जा से भरी विशल्या राम के चरणों में नमस्कार करती है और सखियों के कहने से लक्ष्मण के पास बैठकर अपने कोमल कर-कमलों से उनके चरण स्पर्श करती है और मलयागिरि चंदन से पति का सारा अंग लिप्त करती है। साथ आई हजार राजकन्याएँ विशल्या के हाथ से चंदन लेकर विद्याधरों पर छींटे देती हैं, जिससे सभी घायल और मूर्च्छित राजा, सैनिक, हाथी, घोड़े और पयादे, यहाँ तक कि मूर्च्छित इन्द्रजीत, कुंभकर्ण और मेघनाद भी स्वस्थ हो जाते हैं।
लक्ष्मण वीणा का नाद सुनकर ऐसे जागते हैं जैसे सोकर उठे हों, और क्रोध से दसों दिशाओं में देखकर कहते हैं, ‘कहाँ गया वह रावण?’; अति हर्षित राम भुजाओं में भरकर भाई से मिलते हैं और जाम्बूनद आदि विद्याधर शक्ति लगने से निकलने तक का सारा वृत्तांत सुनाते हैं। विशल्या को लक्ष्मी, इन्द्राणी या चंद्रमा की कांति समझते हुए लक्ष्मण विस्मय से देखते हैं, और जब उसकी सखियाँ विवाह-उत्सव देखने की इच्छा करती हैं तो मुस्कुराकर उसका पाणिग्रहण करते हैं, जिससे विशल्या की कीर्ति सारे जगत में फैल जाती है।