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पर्व 64

शक्ति के निवारण का उपाय और विशल्या के पूर्वभव

चन्द्रप्रतिम विद्याधर बताता है कि पूर्वभव के तप से पवित्र राजकुमारी विशल्या का स्नान-जल ही लक्ष्मण की शक्ति दूर कर सकता है।

कथा खंड लंका का युद्ध

सारांश

लंका में रावण बंदी भाई और पुत्रों के लिए गुप्त रूप से शोक करता है, और सीता लक्ष्मण के लिए विलाप करती हैं, जब तक सखियाँ उन्हें धैर्य नहीं बँधातीं। रात में चन्द्रप्रतिम नाम का विद्याधर राम के कटक में आकर बताता है कि राजा भरत ने सुगंधित जल से उसकी शक्ति दूर की थी; यह राजा द्रोणमेघ की पुत्री विशल्या का स्नान-जल था, जिससे अयोध्या की महामारी भी मिटी थी। वह सर्वहित मुनि द्वारा कहा गया विशल्या का पूर्वभव सुनाता है, जब वह चक्रवर्ती की पुत्री अनंगशरा थी और जिसके तप तथा अजगर को दिए अभयदान से उसे यह प्रभाव मिला, तथा उसका हरण करने वाले पुनर्वसु की कथा भी, जो लक्ष्मण बनकर उससे विवाह करने वाला है।

क्या हुआ

9 बिंदु

  1. रावण अपने भाई और दोनों पुत्रों को मरा हुआ ही जानकर गुप्त रूप से शोक करता है, ‘हाय भाई कुंभकर्ण! हाय इन्द्रजीत, मेघनाद, मेरी भुजा समान दृढ़! मैंने शत्रु का भाई मारा है, न जाने व्याकुल शत्रु तुम्हारा क्या करेगा।’ उधर लक्ष्मण को शक्ति लगने का समाचार सुन सीता बड़े भाई की सेवा में लीन लक्ष्मण के गुण याद कर विलाप करती हैं, तब विद्याधरी सखियाँ धैर्य बँधाती हैं कि देवर की मृत्यु निश्चित नहीं है और पृथ्वी पर अनेक उपाय हैं।

  2. भामंडल कटक के द्वार पर एक अपरिचित योद्धा को रोकते हैं, जो कहता है कि उसे बहुत दिनों से राम के दर्शन की अभिलाषा है और वह लक्ष्मण के जीवन का उपाय जानता है। राम के सामने वह बताता है कि वह देवगति नगर के राजा शशिमंडल और रानी सुप्रभा का पुत्र चन्द्रप्रतिम है, और राजा वेलाध्यक्ष के पुत्र सहस्रविजय ने, जो इसलिए शत्रु बना था कि चन्द्रप्रतिम ने उसकी मनचाही राजकुमारी से विवाह किया, आकाश में युद्ध कर उस पर चंडरवा नाम की शक्ति चलाई।

  3. वह आकाश से अयोध्या के महेन्द्र उद्यान में गिरा, जहाँ राजा भरत ने उसके घायल वक्षस्थल पर चंदन मिले गंधोदक के छींटे दिए, जिससे शक्ति निकलकर भाग गई और उसका रूप पहले से भी सुंदर हो गया। भरत ने उसे बताया था कि उनके देश में उरोघात, महादाहज्वर, सर्वशूल और फोड़े आदि रोग फैल गए थे, और प्रजा सहित निरोग राजा द्रोणमेघ ने उसी सुगंधित जल से भरत, उनके राजभवन, नगर और देश के सब लोगों को रोगमुक्त किया।

  4. द्रोणमेघ ने बताया था कि यह उनकी पुत्री विशल्या के स्नान का जल है, जो सब विद्याओं में प्रवीण और जिनपूजा में तत्पर है, जिसके गर्भ में आते ही उनके देश के सारे रोग नष्ट हो गए थे और जिसके शरीर की सुगंध से यह जल महासुगंधित है। आश्चर्यचकित भरत ने उसके नगर जाकर राजकुमारी की स्तुति की और चार ज्ञान के धारी सर्वहित मुनिराज से उसका चरित्र पूछा।

  5. मुनिराज ने बताया कि विदेहक्षेत्र के पुंडरीक देश में त्रिभुवनानंद नगर में चक्रधर नामक चक्रवर्ती राज्य करता था; उसकी रूपवती पुत्री अनंगशरा को चक्रवर्ती का योद्धा, प्रतिष्ठितपुर का विद्याधर राजा पुनर्वसु मोहित होकर विमान में बैठाकर ले गया। चक्रवर्ती की सेना ने उसका विमान चूर कर दिया तो व्याकुल पुनर्वसु ने उसे आकाश से गिरा दिया, और वह उसकी पर्णलघु विद्या से हिंसक पशुओं से भरे श्वापदरौरव नामक महाभयानक वन में आ गिरी, जहाँ विद्याधर भी नहीं जाते।

  6. वन में अकेली राजकुमारी माता-पिता को याद कर रोती, गिरे हुए फल खाकर रहती, भयंकर गर्मी, वर्षा और शीत के दुख सहती, बेला-तेला आदि अनेक उपवास करती और दिन में एक बार फल-जल से पारणा करती; इस प्रकार उसने तीन हजार वर्ष तक तप किया। अंत में उसने चारों प्रकार के आहार-पानी का त्याग कर सल्लेखना व्रत धारण किया और नियम लिया कि सौ हाथ भूमि से बाहर नहीं जाऊँगी।

  7. आयु के छह दिन शेष रहने पर सुमेरु पर्वत की वंदना कर लौटते अर्हद्दास नामक विद्याधर ने उसे देखा; व्रत के कारण उसने साथ चलने से मना किया, तो वह शीघ्र ही चक्रवर्ती को ले आया, और उनके पहुँचने के समय एक भयंकर अजगर राजकुमारी को निगल रहा था। पिता को देख अनंगशरा ने अजगर को अभयदान दिलाया और उसे मारने नहीं दिया, फिर समाधिमरण कर तीसरे स्वर्ग में जन्म लिया, और पुत्री की यह दशा देख चक्रवर्ती ने बाईस हजार पुत्रों सहित वैराग्य धारण कर मुनिपद ग्रहण किया।

  8. पुनर्वसु वन-वन में अनंगशरा को खोजता रहा पर वह नहीं मिली; तब दुखी होकर उसने द्रुमसेन मुनि के चरणों में मुनि बनकर महातप किया, स्वर्ग में देव हुआ और वहाँ से आकर लक्ष्मण हुआ, और अनंगशरा स्वर्ग से च्युत होकर राजा द्रोणमेघ की पुत्री विशल्या हुई। पुनर्वसु ने अनंगशरा के लिए निदान किया था, इसलिए अब लक्ष्मण विशल्या से विवाह करेंगे, और उसके पूर्वभव के तप तथा अजगर को दिए अभयदान के फल से ही उसके स्नान-जल से सब शक्तियाँ और रोग शांत होते हैं।

  9. भरत के पूछने पर कि उनके देश में रोग क्यों फैले, मुनि ने बताया कि हस्तिनापुर का विंध्य नामक धनवान व्यापारी गधे, ऊँट और भैंसे लादकर अयोध्या आया और ग्यारह महीने रहा; अधिक बोझ से घायल एक भैंसा रोग से वहीं मरकर अकाम निर्जरा के कारण अश्वकेतु नामक वायुकुमार देव हुआ। अवधिज्ञान से यह जानकर कि कीचड़ में पड़े होने पर लोग उसके सिर पर पैर रखकर आते-जाते थे, उसने बदले में अयोध्या में अनेक रोग फैलाए, जो विशल्या के गंधोदक से नष्ट हुए; चन्द्रप्रतिम राम से कहता है कि शीघ्र विशल्या का स्नान-जल मँगाओ, यही एकमात्र उपाय है।