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पर्व 63

लक्ष्मण के मूर्च्छित होने पर राम का विलाप

लक्ष्मण को मूर्च्छित देख राम स्वयं मूर्च्छित होकर विलाप करते हैं और भाई के साथ अग्नि में प्रवेश का निश्चय करते हैं, तब बुद्धिमान जाम्बूनद उन्हें रोकते हैं।

कथा खंड लंका का युद्ध

सारांश

राम उस स्थान पर पहुँचते हैं जहाँ लक्ष्मण पड़े हैं, मूर्च्छित हो जाते हैं और सचेत होने पर गहरा विलाप करते हैं; वे सुग्रीव और भामंडल को लौट जाने को कहते हैं, विभीषण का उपकार न चुका पाने का पश्चाताप करते हैं और भाई के साथ अग्नि में प्रवेश का निश्चय करते हैं। बुद्धिमान जाम्बूनद उन्हें लक्ष्मण को छूने से रोकते हैं और आश्वासन देते हैं कि नारायण की अभी मृत्यु नहीं हो सकती। सूर्योदय के बाद लक्ष्मण का जीना कठिन जानकर विद्याधर कपड़ों के तंबू खड़े करते हैं और सात चौकियों तथा हर द्वार पर पहरा बैठाते हैं।

क्या हुआ

6 बिंदु

  1. शोक से व्याकुल राम वहाँ आते हैं जहाँ लक्ष्मण गिरे पड़े हैं, और शक्ति से मूर्च्छित भाई को देखकर स्वयं मूर्च्छित हो जाते हैं। बहुत देर बाद सचेत होकर वे विलाप करते हैं, ‘हम समुद्र पार कर यहाँ आए, तू सदा मेरी भक्ति में तत्पर रहा, मुझसे बात कर! माता-पिता ने तुझे मुझे धरोहर के रूप में सौंपा था, अब मैं निर्लज्ज उन्हें क्या उत्तर दूँगा?’

  2. राम कहते हैं कि लक्ष्मण के बिना उनका जीवन और पुरुषार्थ निष्फल है, ‘तेरे बिना मुझे सीता से और अन्य पदार्थों से भी क्या? काम और अर्थ तो पृथ्वी पर कहीं भी मिल जाते हैं, पर माता, पिता और भाई नहीं मिलते।’ वे सुग्रीव से कहते हैं कि तुमने अपनी मित्रता दिखा दी, अब अपने स्थान जाओ, भामंडल को भी लौट जाने को कहते हैं, और बताते हैं कि उन्होंने सीता और जीवन दोनों की आशा छोड़ दी है तथा वे भाई के साथ निश्चय ही अग्नि में प्रवेश करेंगे।

  3. राम विभीषण से अपना सबसे बड़ा दुख कहते हैं कि उत्तम पुरुष पहले ही उपकार करते हैं, मध्यम पुरुष उपकार के बदले उपकार करते हैं और अधम पुरुष बाद में भी नहीं करते; विभीषण उत्तम पुरुष हैं जिन्होंने भाई से विरोध कर पहले ही उपकार किया, पर वे बदले में उनका कुछ भी उपकार नहीं कर सके। फिर वे भामंडल और सुग्रीव से चिता रचने को कहते हैं और लक्ष्मण को स्पर्श करने लगते हैं।

  4. महाबुद्धिमान जाम्बूनद उन्हें रोकते हैं, ‘हे देव! इन्हें स्पर्श मत करो, आपका भाई दिव्य अस्त्र से मूर्च्छित हुआ है और अच्छा हो जाएगा, शक्ति से ऐसा ही होता है। विलाप करना क्षुद्र लोगों का काम है, सुभट को उचित नहीं; संकट में उपाय ही काम आता है। आपका भाई नारायण है, अवश्य जीवित रहेगा, अभी उसकी मृत्यु नहीं है।’

  5. फिर भी विद्याधर चिंतित हैं कि इस दिव्य शक्ति को कोई औषधि दूर नहीं कर सकती और सूर्य उदय हो गया तो लक्ष्मण का जीना कठिन है। वे कवच-शस्त्र उतारकर क्षणमात्र में भूमि शुद्ध करते हैं, कपड़ों के तंबू बनाते हैं और सात चौकियाँ बैठाते हैं: पहली पर धनुष-बाण लिए नील, दूसरी पर गदा लिए नल, तीसरी पर त्रिशूल लिए और कल्पवृक्ष की माला पहने ईशान इन्द्र समान विभीषण, चौथी पर तरकश बाँधे कुमुद, पाँचवीं पर बरछी लिए सुषेण, छठी पर भिंडिपाल लिए सुग्रीव और सातवीं पर तलवार सँभाले स्वयं भामंडल।

  6. पूर्व के द्वार पर अष्टापद की ध्वजा वाले एक महाबली राजा, पश्चिम के द्वार पर एक अन्य राजा, और उत्तर के द्वार पर मंत्रियों सहित बाली का महाबलवान पुत्र चन्द्ररश्मि बैठता है, और वानरवंशी महासुभट दक्षिण दिशा की चौकियों पर रहते हैं। लक्ष्मण के जीवन के संदेह से सब महाशोक में बैठे हैं, और पर्व का उपदेश है कि अपने कर्मों का फल कोई मनुष्य, देव, नागकुमार या असुरकुमार नहीं टाल सकता, तथा दयामय शुभ परिणामों से दीर्घायु और निरोग शरीर मिलता है।