पर्व 1
पीठबंध: मंगलाचरण और कथा की रूपरेखा
जिनेन्द्रों को नमस्कार से आरम्भ होकर ग्रंथ आठवें बलभद्र राम (पद्म) का चरित्र राजा श्रेणिक के प्रश्न पर गौतम गणधर के उत्तर के रूप में प्रस्तुत करता है।
कथा खंड उद्गम: लोक और वंशों की उत्पत्तिसारांश
हिन्दी रूपान्तर पण्डित दौलतराम जी के दोहों से आरम्भ होता है, जिनमें तीर्थंकरों, आचार्यों और जिनवाणी को नमस्कार कर आठवें बलभद्र राम (पद्म), उनके भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता का परिचय दिया गया है। इसके बाद आचार्य रविषेण का मूल मंगलाचरण भगवान महावीर की वंदना करता है, बताता है कि केवल जिनमार्ग ही मोक्ष का कारण है, और विनयपूर्वक कहता है कि यह कथा महावीर से गौतम और आचार्य-परम्परा द्वारा चली आई है। फिर विपुलाचल पर्वत पर महावीर के समवशरण में राजा श्रेणिक के गौतम गणधर से प्रश्न का प्रसंग रखकर कुलकरों से लेकर राम के निर्वाण तक पूरे पद्मपुराण की रूपरेखा दी गई है।
क्या हुआ
14 बिंदु
पण्डित दौलतराम जी के आरम्भिक दोहे पंच परमेष्ठी, ऋषभ से वर्धमान तक चौबीसों तीर्थंकरों, निर्वाण आदि अतीत के चौबीस और महापद्म आदि भावी चौबीस तीर्थंकरों, तथा विदेह क्षेत्र में विराजमान सीमंधर आदि बीस विहरमान तीर्थंकरों को नमस्कार करते हैं।
वे गणधर, केवली, श्रुतकेवली, आचार्य और उपाध्यायों को; गौतम स्वामी, सुधर्म मुनीन्द्र, जम्बू केवली और भद्रबाहु को; धवल, जयधवल, महाधवल, तत्त्वार्थसूत्र, गोम्मटसार, ज्ञानार्णव और आदिपुराण जैसे ग्रंथों को; तथा कुन्दकुन्द, समन्तभद्र, अकलंक, उमास्वामी, पूज्यपाद और जिनसेन आदि आचार्यों को भी नमन करते हैं।
दोहों में कथा-नायक का परिचय है: पद्म अर्थात दशरथ-पुत्र रामचन्द्र, जो मुनिसुव्रतनाथ के पश्चात प्रकट हुए आठवें बलभद्र हैं; उनके वीर भाई लक्ष्मण हरि (नारायण) हैं, महासती सीता उनकी पत्नी हैं, और भरत व शत्रुघ्न छोटे भाई हैं।
दौलतराम जी बताते हैं कि भरत उसी भव से मोक्षगामी हुए, राम के पुत्र लव और अंकुश मुनिव्रत धारण कर मुक्त हुए, और यह कथा गौतम स्वामी ने कही, राजा श्रेणिक ने सुनी तथा रविषेणाचार्य ने रची।
आचार्य रविषेण के मूल संस्कृत मंगलाचरण में तीन लोक के मंगलस्वरूप भगवान महावीर को नमस्कार है; टीका बताती है कि मीमांसक, सांख्य, नैयायिक, वैशेषिक, बौद्ध, शून्यवादी और वेदान्ती मत मोक्ष के कारण नहीं हैं, जीव मात्र का मित्र जिनशासन ही मोक्ष का कारण है, और शिव, विष्णु, ब्रह्मा, हरि, शंकर, रुद्र आदि महावीर के ही अनेक नाम हैं।
इसके बाद चौबीसों तीर्थंकरों की एक-एक विशेषण सहित वंदना है; बताया गया है कि बीसवें तीर्थंकर मुनिसुव्रतनाथ के तीर्थकाल में श्रीरामचन्द्र जी का शुभ चरित्र प्रकट हुआ, बाईसवें अरिष्टनेमि हरिवंश के तिलक हैं और महावीर चतुर्थ काल के अंत में हुए।
विनयपूर्वक ग्रंथकार कहते हैं कि राम के चरित्र को गणधर भी किंचित मात्र ही कह सकते हैं, फिर भी जैसे हाथियों के मार्ग पर हिरण चलते हैं, वैसे वे महामुनियों के बताए मार्ग पर चलते हैं; महापुरुषों की कथा में लगे कान, मस्तक और होंठ ही सार्थक हैं, और सज्जन हंस की तरह दूध-पानी में से गुण ग्रहण करते हैं, जबकि दुर्जन कौए की तरह मोती छोड़कर मांस ही चुनते हैं।
कथा की परम्परा बताई गई है: श्री वर्धमान स्वामी की दिव्यध्वनि में जो खिरा उसे गौतम गणधर ने धारण किया, फिर सुधर्माचार्य, जम्बूस्वामी, पाँच श्रुतकेवली और आचार्यों की परम्परा से होता हुआ यह कथन रविषेणाचार्य तक पहुँचा।
ग्रंथ के छह महाधिकार बताए गए हैं: लोकस्थिति, वंशों की उत्पत्ति, वनविहार और संग्राम, लव-अंकुश की उत्पत्ति, भवों का वर्णन, और रामचन्द्र जी का निर्वाण।
समस्त कथा के मूल वक्ता श्री वर्धमान हैं, जिन्हें अतिवीर और महावीर भी कहते हैं: राजगृह नगरी के विपुलाचल पर्वत पर उनके समवशरण में राजा श्रेणिक उनके मुख्य गणधर गौतम स्वामी से, जिनका नाम इन्द्रभूति भी है, प्रश्न करते हैं।
फिर सम्पूर्ण पुराण की रूपरेखा है: युग और कुलकरों का वर्णन, नाभिराजा और मरुदेवी से ऋषभदेव का जन्म, कर्मभूमि की स्थापना, भरत-बाहुबली का युद्ध, ब्राह्मणों तथा इक्ष्वाकु आदि वंशों की उत्पत्ति, संजयंत मुनि पर विद्युद्दंष्ट्र का उपसर्ग, अजितनाथ के समय राक्षस द्वीप की प्राप्ति और सगर चक्रवर्ती का चरित्र।
आगे किष्किंधापुर के वानरवंश, रथनूपुर के इन्द्र विद्याधर के हाथों माली की मृत्यु, रत्नश्रवा और केकसी से रावण का जन्म, उसकी विद्या-सिद्धि और मंदोदरी से विवाह, वैश्रवण, यम और इन्द्र पर उसकी विजय, बाली मुनि पर क्रोध कर कैलाश पर्वत उठाना और मुनि के अँगूठा दबाने से उसका नीचे दबना, ‘जो परस्त्री मुझे न चाहे उसे ग्रहण नहीं करूँगा’ का उसका नियम, तथा अंजना और पवनंजय से हनुमान का जन्म वर्णित है।
रूपरेखा के उत्तरार्ध में दशरथ और केकई का वरदान, राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, सीता और भामंडल का जन्म, सीता का स्वयंवर, वनवास, सीता-हरण, सुग्रीव से मैत्री, वह युद्ध जिसमें रावण का चक्र लक्ष्मण के हाथ में आता है और रावण मारा जाता है, तथा इन्द्रजीत और कुंभकर्ण की दीक्षा का उल्लेख है।
अंत में अयोध्या लौटना, भरत का वैराग्य, मथुरा में शत्रुघ्न का राज्य, सीता का वनवास और राजा वज्रजंघ के यहाँ लव-अंकुश का जन्म, सीता के शील के प्रभाव से अग्निकुंड का शीतल जल बनना, लक्ष्मण की मृत्यु और राम का मुनिव्रत, केवलज्ञान तथा निर्वाण वर्णित है; कहा गया है कि इस पुराण को पढ़ने-सुनने से अनेक जन्मों के पाप नष्ट होते हैं।