पर्व 69
रावण का अष्टाह्निका पर्व में लोगों को व्रत-नियम धारण करने का आदेश
शांतिनाथ मंदिर में विद्या-साधना आरंभ करने से पहले रावण मंदोदरी के द्वारा घोषणा करवाता है कि सारी लंका व्रत-नियम पाले, पूजा करे और किसी प्रकार का कलह न करे।
कथा खंड लंका का युद्धसारांश
रावण अपने राजभवन के मध्य स्थित शांतिनाथ मंदिर में जाकर भगवान का अभिषेक-पूजन करता है और विद्या-साधना के लिए स्फटिक की माला लेकर कायोत्सर्ग में खड़ा होता है। भीतर जाने से पहले वह मंदोदरी को आज्ञा देता है कि मंत्री और कोतवाल से घोषणा करवाओ कि सब प्रजा व्यापार छोड़ जिनपूजा करे, दीनों को दान दे और क्रोध न करे, अन्यथा दंड पाएगी। मंदोदरी मंत्री और यमदंड कोतवाल को यह आदेश देती है और सारी लंका संयम, तप और पूजा में लीन हो जाती है।
क्या हुआ
5 बिंदु
शांति का कारण श्री शांतिनाथ का मंदिर, कैलाश के शिखर समान ऊँचा, रावण के राजभवन के मध्य सुमेरु पर्वत के समान सुशोभित है। विद्या-साधन की इच्छा से रावण अद्भुत द्रव्यों से, अनेक बाजों की ध्वनि और मंत्रों की शुद्धिपूर्वक भगवान का अभिषेक करता है, फिर मनोहर द्रव्य, सुगंधित धूप, रत्नमय दीपक और अष्टद्रव्य से पूजा करता है।
सफेद वस्त्र पहने, मस्तक पर महाज्योतिमय चूड़ामणि वाला मुकुट धारण किए रावण दोनों हाथ जोड़कर मन, वचन और काय से शांतिनाथ भगवान को अष्टांग नमस्कार करता है, और भगवान के सम्मुख पवित्र भूमि पर स्फटिक मणि की माला हाथ में लेकर कायोत्सर्ग मुद्रा में खड़ा होता है।
मंदिर में जाने से पहले रावण ने मंदोदरी को आज्ञा दी थी कि मंत्री और कोतवाल को बुलाकर नगर में घोषणा करवाओ कि सब प्रजा नियमपूर्वक धर्मकार्य में रत रहे, सारा व्यापार छोड़ जिनबिंब की पूजा करे, दीनों को मनवांछित दान दे, अहंकार छोड़े, और जब तक मेरा नियम पूरा न हो तब तक श्रद्धा और संयम का पालन करे।
यदि कोई कष्ट दे तो सहन करना, बलवान हो तो बल का गर्व न करना, और इन दिनों जो क्रोध करेगा वह अवश्य दंड पाएगा; रावण ने कहा कि मेरे पिता समान पूज्य व्यक्ति भी इन दिनों कलह करेंगे तो मैं उन्हें मारूँगा, और कोई भी पाप-क्रिया नहीं करेगा।
मंदोदरी मंत्री और यमदंड कोतवाल को बुलाकर पति की आज्ञा सुनाती है; वे कहते हैं कि जो आप आज्ञा करेंगी वही करेंगे, और लंका की सारी प्रजा सब कार्य छोड़ निर्मल भावों से जिनपूजा, संयम, तप और त्याग में लीन हो जाती है। पर्व का उपदेश है कि तप से कर्मों की निर्जरा होती है, शुभ भावों से संसार के सुख मिलते हैं, और फल की इच्छा रहित शुद्ध भावों से मोक्ष-सुख प्राप्त होता है।