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पर्व 70

रावण की विद्या-साधना और वानरवंशी कुमारों द्वारा लंका में उपद्रव

रावण बहुरूपिणी विद्या की साधना में बैठा है, तब वानरवंशी कुमार लंका में उपद्रव मचाते हैं, जिन्हें यक्षेन्द्र पूर्णभद्र और मणिभद्र खदेड़ देते हैं।

कथा खंड लंका का युद्ध

सारांश

यह जानकर कि रावण चौबीस दिनों में बहुरूपिणी विद्या सिद्ध कर लेगा, वानरवंशी उसे क्रोध दिलाकर साधना भंग करना चाहते हैं, पर राम पूजा में बैठे व्यक्ति पर उपद्रव करने से मना कर देते हैं। लक्ष्मण की जानकारी में विद्याधर अपने कुमारों को लंका भेजते हैं, जो नगर में आतंक फैलाकर द्वार तोड़ देते हैं, जबकि मंदोदरी अपने पिता मय को युद्ध से रोक देती है। जिनशासन के देव और फिर यक्षेन्द्र पूर्णभद्र और मणिभद्र कुमारों को भगा देते हैं और राम को उलाहना देने आते हैं, पर लक्ष्मण के उत्तर और सुग्रीव की बात से शांत होकर लौट जाते हैं।

क्या हुआ

8 बिंदु

  1. हलकारे राम के कटक में समाचार लाते हैं कि रावण बहुरूपिणी विद्या साधने शांतिनाथ के मंदिर में बैठा है, जो चौबीस दिनों में सिद्ध होगी और देवों के मद को भी चूर्ण कर देगी। वानरवंशी सोचते हैं कि उसे क्रोध दिलाया जाए तो विद्या सिद्ध नहीं होगी, क्योंकि सिद्ध हो गई तो इन्द्रादि भी उसे नहीं जीत सकेंगे; विभीषण शीघ्र उपाय करने को कहते हैं और सब राम से कहते हैं कि लंका लेने और रावण की विद्या में विघ्न डालने का यही समय है।

  2. राम कहते हैं, ‘हे विद्याधरो! आप अज्ञानता की बात करते हो, यह क्षत्रियकुल का धर्म नहीं है; हमारे कुल की परंपरा है कि भय से भागने वाले का भी वध नहीं करना, तो जो नियमपूर्वक जिनमंदिर में बैठा है उस पर उपद्रव कैसे करें? यह नीच कर्म कुलवानों को योग्य नहीं।’ सब कहते हैं कि हमारे प्रभु राम महाधर्मात्मा हैं, उनकी अधर्म में कभी प्रवृत्ति नहीं होती।

  3. तब लक्ष्मण की जानकारी में विद्याधर अपने राजकुमारों को उपद्रव के लिए लंका भेजते हैं, और सुग्रीव आदि बड़े राजा आठ दिन का नियम लेकर जप-तप करते हैं। प्रीतिंकर, दृढ़रथ, रतिवर्धन, नल, नील, अंग, अंगद आदि कुमार सिंह, व्याघ्र, गज और अष्टापद के रथों, विमानों और घोड़ों पर चढ़कर लंका में प्रवेश करते हैं और आश्चर्य करते हैं कि कुंभकर्ण, इन्द्रजीत और मेघनाद बंधन में हैं, हस्त-प्रहस्त और अक्ष आदि अनेक योद्धा मारे गए, फिर भी लंका के लोग निश्चिंत बैठे हैं।

  4. विभीषण का पुत्र सुभूषण कपिकुमारों से कहता है कि निर्भय होकर लंका में प्रवेश करो, बालक, वृद्ध और स्त्रियों को कुछ मत कहना, शेष लोगों को परेशान करो; कुमार नगर में और जिनपूजा में लीन राजकन्याओं वाले रावण के राजमहल में भी महाउपद्रव मचाते हैं। मंदोदरी का पिता राजा मय कवच पहन, आयुध लेकर सेना सहित राजद्वार पर आता है, पर मंदोदरी कहती है कि लंकेश्वर आज्ञा दे गए हैं कि कोई कषाय न करे, ये धर्मध्यान के दिन हैं, युद्ध से स्वामी की आज्ञा भंग होगी; तब मय शांत होकर शस्त्र डाल देता है।

  5. मर्यादा तोड़कर वानरवंशी कुमार नगर का कोट तोड़ते हैं और वज्र के कपाट भंग करते हैं; भयभीत नगरवासी रावण के महल की ओर भागते हैं, स्त्रियाँ बालकों को गोद में लिए भागती हैं, उनके हार टूटते और मोती बिखरते हैं। यह देख जिनशासन के देव शांतिनाथ मंदिर से महाभैरव रूप में निकलते हैं और क्षण में सिंह, हाथी, घोड़ा, सर्प, वायु, वृक्ष और पर्वत का रूप बनाकर कपिकुमारों को दुखी करते हैं, तब कटक के देव उनकी सहायता करते हैं और दोनों ओर के देवों में भयंकर युद्ध होता है।

  6. यक्षों का स्वामी क्षेत्रपाल पूर्णभद्र क्रोधित होकर कहता है कि आहार-पानी और शरीर का ममत्व छोड़ विद्या साध रहे शांतचित्त रावण पर ये कपिकुमार उपद्रव कर रहे हैं, यह योद्धाओं की क्रिया नहीं; मणिभद्र कहता है कि रावण का मन इन्द्र भी नहीं डिगा सकता। तब दोनों धीर, सम्यग्दृष्टि, जिनधर्मी यक्षेन्द्र युद्ध को तैयार होते हैं, महावायु चलाते हैं, पत्थर बरसाते हैं और गर्जना करते हैं, जिससे वानरवंशी कुमार और उनके पक्ष के देव सूखे पत्तों की तरह उड़कर भाग जाते हैं।

  7. दोनों यक्ष राम को उलाहना देने आते हैं: पूर्णभद्र कहता है कि महाधर्मात्मा राजा दशरथ के पुत्र होकर आपकी सेना रत्नों से भरी लंका में उपद्रव करे, यह कैसी बात है, जो किसी का धन हरता है वह उसके प्राण हरता है। लक्ष्मण उत्तर देते हैं कि रघुनंदन की प्राणप्रिया महासती सीता को वह दुरात्मा रावण कपट से हर ले गया, उसका पक्ष आप क्यों लेते हैं, हमने आपका क्या अपराध किया जो भौंहें टेढ़ी और आँखें लाल करके उलाहना देने आए हो?

  8. सुग्रीव भयभीत होकर पूर्णभद्र को अर्घ चढ़ाते हैं और कहते हैं कि हम लंका में उपद्रव नहीं चाहते, पर रावण बहुरूपिणी विद्या साध रहा है और सिद्ध होने पर कोई उसके सामने नहीं ठहरेगा, इसलिए उसे क्रोध दिलाकर विद्या रोकना चाहते हैं। पूर्णभद्र कहते हैं कि ऐसा करो, पर लंका के लोगों को और रावण के शरीर को कष्ट मत दो, यद्यपि रावण अतिदृढ़ है, उसे क्रोध आना कठिन है; फिर भव्यजीवों के प्रति वात्सल्य वाले, मुनिभक्त दोनों यक्षेन्द्र लक्ष्मण के वचनों से लज्जित होकर अपने स्थान लौट जाते हैं।