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पर्व 99

सीता का पुंडरीकपुर जाना और राम का सीता-शोक

सीता सम्मानपूर्वक पुंडरीकपुर पहुँचकर वज्रजंघ की बहन के रूप में धर्मपूर्वक रहती हैं, जबकि अयोध्या में कृतांतवक्त्र उनका संदेश सुनाता है और पश्चाताप से भरे राम शोक से मूर्च्छित हो जाते हैं, जब तक लक्ष्मण उन्हें धैर्य नहीं बँधाते।

कथा खंड राज्य, मथुरा और सीता का परित्याग

सारांश

सुंदर पालकी में बैठकर सीता तीन दिन में वन पार करती हैं और वज्रजंघ के समृद्ध देश में पग-पग पर सम्मानित होती हुई सजे हुए पुंडरीकपुर में ऐसे प्रवेश करती हैं जैसे लक्ष्मी देवलोक में। वहाँ राजपरिवार के स्नेह के बीच वे पूजा, स्वाध्याय, तप और चार प्रकार के दान में मन लगाती हैं। अयोध्या में कृतांतवक्त्र उन्हें भयानक वन में छोड़ आने की सूचना देता है और उनका संदेश सुनाता है कि राम जिनधर्म की श्रद्धा कभी न छोड़ें और सुनी-सुनाई बात पर किसी निर्दोष को दोषी न ठहराएँ, और पश्चाताप से भरे राम मूर्च्छित होकर विलाप करते हैं। स्वयं रोते हुए लक्ष्मण बताते हैं कि सारी अयोध्या सीता के लिए शोक कर रही है और उन्हें ढूँढने का वचन देते हैं, और राम नौ महीने तक सीता के नाम से दान जारी रखते हैं तथा उन्हें कभी न भूलते हुए भी धीरे-धीरे धर्म में मन लगाते हैं।

क्या हुआ

11 बिंदु

  1. वज्रजंघ क्षणभर में सीता के लिए विमान समान अद्भुत पालकी मँगवाते हैं, जिसके खंभों में श्रेष्ठ दर्पण जड़े हैं और जो मोतियों की झालर और चँवरों से सुशोभित है, और सीता उसमें बैठकर महासेना के बीच विस्मय से कर्मों का चिंतन करती हुई चलती हैं। तीन दिन में भयानक जंगल पार कर वे रत्न, स्वर्ण और चाँदी की खानों तथा देवपुरियों जैसे नगरों वाले देश से गुजरती हैं, जहाँ नगर-नगर और गाँव-गाँव के लोग उनके चरणों में भेंट रखकर प्रणाम करते हुए कहते हैं कि हे पतिव्रता शिरोमणि, आपके दर्शन से हमारे पाप नष्ट हुए, और देवों समान अनेक राजा भी भेंट चढ़ाकर बार-बार वंदना करते हैं।

  2. उस सुखी देश के वन-उपवनों में चैत्यालय देखकर सीता प्रसन्न मन से सोचती हैं कि जहाँ का राजा धर्मात्मा होता है वहाँ की प्रजा सुखी होती है। राजा की आज्ञा से पुंडरीकपुर सजाया जाता है: भूमि पर सुगंधित वस्तुएँ छिड़की जाती हैं, गली-बाजारों में तोरण लगते हैं, द्वारों पर मंगल कलश रखे जाते हैं, मंदिरों पर ध्वजाएँ चढ़ती हैं और घर-घर मंगलगीत और नृत्य होते हैं; नगर-द्वार से राजद्वार तक लोग दर्शन के लिए खड़े हैं, बाजों और शंखों की ध्वनि से दसों दिशाएँ गूँजती हैं, और सीता नगर में ऐसे प्रवेश करती हैं जैसे लक्ष्मी देवलोक में।

  3. राजभवन की सब स्त्रियाँ, रानियाँ और दासियाँ उनकी अगवानी को आती हैं; सीता पालकी से उतरकर राजभवन के ऊँचे जिनमंदिर में जिनेन्द्र के दर्शन करती हैं और फिर राजभवन जाती हैं, जहाँ वज्रजंघ उनका वैसा ही आदर करते हैं जैसा भाई भामंडल करते। वज्रजंघ का सारा परिवार और रानियाँ विनय-भक्ति से उनकी सेवा करती हैं, सदा जयवंत रहने और युग-युग जीने की कामना करती हैं और उनकी हर आज्ञा शिरोधार्य करती हैं, सेवक उनके चरणों में खड़े रहते हैं, उनके वात्सल्य से रानियाँ और दासियाँ एक क्षण भी उन्हें अकेला नहीं छोड़ना चाहतीं, और सामंतों तथा राजाओं की भेंटें वे धर्मकार्य और दान में लगाती हैं।

  4. पुंडरीकपुर में सीता श्रावक के षट् आवश्यक पालती हैं, अष्टद्रव्य से जिनेन्द्र की पूजा करती हैं, और प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग चारों अनुयोगों का वाचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, आम्नाय और धर्मोपदेश रूप में स्वाध्याय करती हैं। वे चतुर्विध संघ की यथायोग्य वैयावृत्ति करती हैं, षट्काय जीवों की रक्षा करती हैं, पाँचों इन्द्रियों और मन को वश में रखती हैं, अपनी शक्ति के अनुसार अनशन, अवमौदर्य, वृत्तिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्तशय्यासन और कायक्लेश तप करती हैं, और आहार, औषध, ज्ञान और अभय चारों दान नित्य देती हैं, संघ को नवधा भक्ति से आहार और दुखी, रोगी, दीन, अनाथों को दया से भोजन-औषध देती हैं। मानव जीवन को अमूल्य रत्न मानकर, प्रमाद और चिंता छोड़कर वे धर्मध्यान में मन लगाती हैं और वज्रजंघ के राजभवन में रानियों के साथ आनंद से रहती हैं।

  5. सीता के दुख की अग्नि में जलता कृतांतवक्त्र घोड़ों की थकान मिटाकर राम के पास लौटता है, और उनके चरणों में नमस्कार कर कहता है कि आपकी आज्ञा अनुसार मैं महासती सीता को भयानक वन में अकेली छोड़ आया हूँ, उनके साथ केवल गर्भ ही सहायक है। वह उस अंधकारमय वन का वर्णन करता है जहाँ सिंह और जंगली भैंसे लड़ते हैं, उल्लू विरस शब्द करते हैं, गुफाओं में सिंहों की दहाड़ गूँजती है और अजगर, साँप, बिच्छू और मधुमक्खियाँ विचरती हैं, और फिर सीता का संदेश सुनाता है।

  6. सीता कहती हैं कि हे स्वामी, यदि आप आत्मकल्याण चाहते हैं तो जैसे मुझे छोड़ा वैसे जिनेन्द्र की भक्ति मत छोड़ना, और जैसे अनुराग होते हुए भी लोगों के कहने से मुझे छोड़ा वैसे किसी के कहने से जिनशासन की श्रद्धा मत छोड़ना; किसी का न्याय करें तो विचारकर करें और किसी के कहने से किसी निर्दोष को झूठा दोष न लगवाएँ, जैसे मुझे लगाया गया। मुझे छोड़ने का दुख इस भव में थोड़ा ही होगा, पर सम्यग्दर्शन छोड़ने से जन्म-जन्म में दुख होगा: रत्न, स्त्री, निधि, राज्य, धन सब सुलभ हैं, पर सम्यग्दर्शन रत्न महादुर्लभ है, राज्य में पाप कर नरक जाना पड़ता है, और ऊर्ध्वगमन केवल सम्यग्दर्शन के प्रभाव से होता है।

  7. कृतांतवक्त्र कहता है कि जानकी के ये वचन सुनकर किसकी धर्मबुद्धि न जागेगी, और सोचता है कि स्वभाव से कायर सीता विषैले सर्पों, सूखते सरोवरों की ओर व्यर्थ दौड़ते मतवाले हाथियों और हिरणों, गर्म हवाओं, जल को मलिन करते जंगली सूअरों और सुई से भी नुकीली काँटों-पत्थरों भरी भूमि वाले उस वन में एक क्षण भी कैसे जीवित रहेगी। यह सुनकर राम सोचते हैं कि मैंने अज्ञानी दुष्टों के कहने से बहुत विपरीत कार्य किया, कहाँ वह भयंकर वन और कहाँ वह राजपुत्री, और मूर्च्छित हो जाते हैं; शीतोपचार से होश में आकर वे विलाप करते हैं कि मैंने तुम्हें वन में छोड़ा फिर भी तुम्हारे मन में द्वेष नहीं, उल्टे तुमने हमें धर्म का संबोधन दिया।

  8. वे उन्हें अपने प्राणों का आधार कहते हैं, जो दुख के समय आगे-आगे और सुख के समय पीछे चलती थीं और आठ हजार रानियों के ऊपर शिरोधार्य पटरानी थीं, और कल्पना करते हैं कि उनके कोमल चरण कंकड़-पत्थरों पर कैसे चलेंगे, कृत्य-अकृत्य न जानने वाले म्लेच्छ भील उन्हें कहीं ले जाएँगे, अँधेरी रात में वे हाथियों के नीचे दब गई होंगी, गर्मी की धूप में बर्फ-सी पिघल गई होंगी और गर्भ के दोनों बालक भूख-प्यास से दुखी होंगे, या मुझ निर्दयी में मन लगाए वेदना से मर गई होंगी। वे प्रार्थना करते हैं कि जैसे पहले रत्नजटी ने सीता का समाचार दिया था वैसे कोई अब उनकी कुशल बताए, और कृतांतवक्त्र से पूछते हैं कि क्या तू सचमुच उसे भयानक वन में छोड़ आया, कहीं अच्छी जगह छोड़ा हो तो अमृत वचन बोल; पर सेनापति नीचा मुख किए मौन बैठा रहता है, और राम फिर मूर्च्छित होकर गिर पड़ते हैं।

  9. तब लक्ष्मण आकर कहते हैं कि हे देव, व्याकुल क्यों होते हो, समता और संतोष रखो, यह पूर्वभव के पापों का फल है, केवल महारानी ही नहीं, अशुभ कर्म के उदय से सारी प्रजा दुखी है, सुख-दुख किसी निमित्त से स्वयं आते हैं और पूर्ण पुण्य से प्राणी की कहीं भी रक्षा होती है; पर फिर वे स्वयं भी रो पड़ते हैं, गर्मी से मुरझाए कमल-सा उनका मुख म्लान हो जाता है, और वे विलाप करते हैं कि हे माता, राजहंस राम के मन के लिए मानसरोवर जैसी तुम कहाँ गईं, जैसे सूर्य बिना आकाश और चन्द्रमा बिना रात्रि की शोभा नहीं, वैसे तुम्हारे बिना अयोध्या की क्या शोभा। वे राम से कहते हैं कि सारा नगर वीणा, बाँसुरी और मृदंग की ध्वनि से रहित होकर रात-दिन रुदन से भरा है, गली-गली, बाजार-बाजार, घर-घर, चौराहों और नदी-तटों पर लोग ऐसे रोते हैं कि आँसुओं से धरती पर कीचड़ हो गया है मानो फिर वर्षाकाल आ गया हो, और सब उस माता को याद कर, जिसने सबका पुत्र के समान पालन किया, उन्हें वापस बुलाना चाहते हैं।

  10. लक्ष्मण कहते हैं कि हे प्रभो, चिंता छोड़िए, चिंता से कार्य सिद्ध नहीं होता; आपका मन प्रसन्न हो तो हम महारानी को ढूँढकर ले आएँगे, और उनके पुण्य के प्रभाव से उन्हें कोई कष्ट नहीं होगा। यह सुनकर राम को कुछ शांति मिलती है, वे शोक छोड़कर कर्तव्य में मन लगाते हैं और भंडारी भद्रकलश को आज्ञा देते हैं कि सीता की आज्ञा से जैसा किमिच्छक दान देते थे, वैसा ही उनके नाम से देते रहना, और नौ महीने तक यह दान चलता रहता है।

  11. आठ हजार रानियाँ होते हुए भी राम एक क्षण भी सीता को नहीं भूलते, बार-बार सीता-सीता कहते हैं, उन्हें सब दिशाएँ सीतामय दिखती हैं और स्वप्न में भी वे सीता को पर्वत की गुफा में गिरी पड़ी देखते हैं, फिर भी लक्ष्मण के उपदेश और सिद्धांत के श्रवण से उनका शोक कुछ घटता है और वे धर्मध्यान में मन लगाते हैं। गौतम स्वामी श्रेणिक से कहते हैं कि हल-मूसल के धारी राम और चक्रधारी लक्ष्मण, दोनों न्यायवान और अखंड प्रीति वाले भाई, समुद्रपर्यंत पृथ्वी की रक्षा करते हुए सौधर्म और ईशान इन्द्र के समान राज्य करते हैं, क्योंकि अनेक पूर्वभवों में साधुपद धारण कर तप से कमाए महापुण्य का फल उन्हें बलभद्र और नारायण पद के रूप में मिला है, और वही पुण्य आगे उन्हें अरहंत पद तक पहुँचाएगा।