पर्व 98
वन में वज्रजंघ का आगमन और सीता को आश्वासन
हाथी पकड़कर लौटते पुंडरीकपुर के राजा वज्रजंघ रोती हुई सीता को पाते हैं, उनकी कथा सुनते हैं, जिनवाणी के उपदेश से ढाढ़स बँधाते हैं और उन्हें अपनी धर्म-बहन बना लेते हैं।
कथा खंड राज्य, मथुरा और सीता का परित्यागसारांश
वज्रजंघ के सैनिक भयानक वन में रोती सीता को पाते हैं, और जब वे डरकर अपने आभूषण देने लगती हैं तो वे अपने धर्मात्मा राजा की प्रशंसा कर उन्हें आश्वस्त करते हैं। वज्रजंघ स्वयं आकर उन्हें बहन कहते हैं, और सीता उन्हें दशरथ के वैराग्य और अपने हरण से लेकर राम की तीर्थयात्रा की योजना और उस लोकापवाद तक की पूरी कथा सुनाती हैं, जिसके कारण राम ने उन्हें निर्दोष जानते हुए भी त्याग दिया। वज्रजंघ कर्म और हर गति में जीव के दुखों का उपदेश देकर उन्हें सांत्वना देते हैं, स्वयं को पुंडरीकपुर का स्वामी बताकर उन्हें धर्म की बड़ी बहन मानते हैं और विश्वास दिलाते हैं कि राम उन्हें एक दिन अवश्य बुलाएँगे, और मानो भाई भामंडल मिल गए हों, ऐसा संतोष पाकर सीता उन्हें पूर्वभव का भाई कहती हैं।
क्या हुआ
10 बिंदु
जैसे महाविद्या से गंगा रुक जाए वैसे सेना को रुकी देखकर राजा वज्रजंघ, जिन्होंने स्वयं भी रुदन सुना था, कारण पूछते हैं, और कुछ लोग आगे जाकर पूछते हैं कि हे देवी, तुम कौन हो और इस भयानक निर्जन वन में क्यों रोती हो, जो सघन वृक्षों के अंधकार और सिंह, सर्प, बिच्छू, अजगर आदि से ऐसा भरा है कि देव और विद्याधर भी यहाँ नहीं आते। वे कहते हैं कि तुम कोई महारूपवती महारानी, देवी या नागकुमारी लगती हो, और तुम्हारे वचन और शरीर से ही तुम्हारा महागुणवान होना प्रकट है।
शस्त्रधारी पुरुषों को देखकर सीता भय से काँपने लगती हैं और अपने आभूषण उतारकर उन्हें देने लगती हैं, पर स्वामी के भय से सैनिक कहते हैं कि हे माता, डरिए मत, ये अमूल्य रत्नमय आभूषण आपके ही योग्य हैं, विश्वास कीजिए, यह राजा वज्रजंघ पृथ्वी पर प्रसिद्ध और सम्यग्दर्शन रूपी रत्न से सुशोभित हैं, जो अविनाशी है, जिसे कोई हर नहीं सकता, जो शंका आदि दोषों से रहित और सुमेरु समान अचल है। वे बताते हैं कि राजा जिनधर्म के रहस्य के ज्ञाता, शरणागत-प्रतिपालक, महादयावान, प्रजा के पिता समान रक्षक, अहिंसा धर्म के अनुयायी, दीन, अनाथ और दुर्बलों का माता की तरह पालन करने वाले, सत्यवादी, जितेन्द्रिय और परस्त्री को माता, बहन, बेटी के समान मानने वाले हैं, और उनके सब गुणों का वर्णन करना भुजाओं से समुद्र तैरने जैसा है।
उसी समय राजा वज्रजंघ स्वयं आते हैं, हाथी से उतरकर पवित्र मन से बड़ी विनय के साथ सीता को बहन कहकर पूछते हैं कि वह वज्र जैसे कठोर हृदय वाला महाअज्ञानी कौन है जिसने तुम्हें ऐसे भयानक वन में छोड़ा, छोड़ते समय क्या उसका हृदय नहीं फटा, और कहते हैं कि विश्वास करो, भय मत करो और गर्भ की चिंता मत करो। सीता शोक से रो पड़ती हैं, तो राजा बार-बार मधुर शब्दों से ढाढ़स बँधाते हैं, और तब सीता आँसू बहाती हुई गद्गद वाणी से अपनी कथा कहती हैं।
वे बताती हैं कि मैं राजा जनक की पुत्री, विद्याधरों के स्वामी भामंडल की बहन और राजा दशरथ के पुत्र राम की रानी सीता हूँ: कैकेयी को दिए वरदान के कारण भरत को राज्य देकर दशरथ ने दीक्षा ली, मैं राम-लक्ष्मण के साथ वन गई, रावण छल से मुझे हर ले गया और ग्यारहवें दिन पति का समाचार सुनकर मैंने भोजन किया, और राम ने सुग्रीव के यहाँ रहकर अनेक विद्याधर राजाओं के साथ आकाशमार्ग से समुद्र पार कर लंका में रावण को जीता और मुझे ले आए। फिर भरत ने राज्यरूपी कीचड़ से निकलकर दीक्षा ली और मोक्ष पाया, और शोकाग्नि में जलती कैकेयी ने आर्यिका बनकर महातप से स्त्रीलिंग का छेद किया और स्वर्ग में देव हुईं, जो फिर मनुष्य होकर मोक्ष पाएँगी।
जब राम-लक्ष्मण अयोध्या में इन्द्र समान राज्य कर रहे थे, तब वहाँ के दुर्जन निःशंक होकर कहने लगे कि रावण सीता को हर ले गया और महाविवेकी, न्यायवान राम ने उसे लाकर घर में रख लिया, जिससे प्रजा मर्यादा छोड़ने लगी। उस समय मैं गर्भवती थी और जिनपूजा की अभिलाषा रखती थी, और पति ने मुझे यात्रा कराने की योजना बनाई थी: पहले कैलाश पर ऋषभदेव के निर्वाण क्षेत्र की वंदना, फिर तीर्थंकरों की जन्मभूमि अयोध्या, कंपिला में विमलनाथ, रत्नपुरी में धर्मनाथ, श्रावस्ती में संभवनाथ, चंपापुर में वासुपूज्य, मिथिला में मल्लिनाथ, हस्तिनापुर में शांतिनाथ, कुंथुनाथ और अरनाथ, और राजगृह में मुनिसुव्रतनाथ, जिनका तीर्थकाल अभी चल रहा है, तथा पुष्पक विमान से सुमेरु पर्वत के चारों वनों के और ढाई द्वीप के सब चैत्यालयों की वंदना।
राम उनसे कहते थे कि भावसहित अर्हंत भगवान को एक बार भी नमस्कार करने से अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं, और बताते थे कि भोगभूमि में जब धर्म की प्रवृत्ति नहीं थी तब ऋषभदेव ने भव्य जीवों को मोक्षमार्ग का उपदेश दिया, और भरत चक्रवर्ती ने कैलाश पर स्वर्ण-रत्नों के चैत्यालय बनवाकर पाँच सौ धनुष ऊँची रत्नमय प्रतिमाएँ विराजमान कराईं, जिनकी पूजा आज भी देव, विद्याधर, गंधर्व और किन्नर करते हैं। उसी समय नगर के लोगों ने आकर लोकापवाद की कठोर बात कही, और राम ने सोचा कि लोग स्वभाव से ही कुटिल हैं, किसी और उपाय से अपवाद नहीं मिटेगा, इसलिए प्रियजन को तजना ही अच्छा है; सीता कहती हैं कि मैं निर्दोष हूँ और पति यह भली भाँति जानते हैं, देवर लक्ष्मण ने बहुत कहा पर उन्होंने नहीं माना, और उत्तम क्षत्रिय कुल के शास्त्रज्ञ पुरुषों की यही रीति है कि वे किसी से नहीं डरते, केवल लोकापवाद से डरते हैं।
राम की महारानी को धूल से सनी रोती देखकर उत्तम धर्म के ज्ञाता वज्रजंघ बड़े आदर से संतोष देते हैं कि हे शुभमते, तुम जिनशासन में प्रवीण हो, शोक मत करो, यह आर्तध्यान दुख बढ़ाने वाला है, तुम तो अनित्य, अशरण, एकत्व, अन्यत्व आदि बारह अनुप्रेक्षाओं का चिंतन करने वाली हो। वे याद दिलाते हैं कि मोक्षमार्ग न जानने वाले इस मूढ़ जीव ने हर गति में इष्ट-वियोग और अनिष्ट-संयोग सहे हैं: तिर्यंच योनि में शीत, उष्ण और वर्षा के दुख, नरक में छेदन-भेदन, और अल्पऋद्धि वाला देव होकर भी महाऋद्धि वाले देवों को देखकर दुख, यहाँ तक कि अधो, मध्य और ऊर्ध्व लोक में ऐसा कोई स्थान नहीं जहाँ इसने जन्म-मरण न किए हों।
वे कहते हैं कि पुण्य के उदय से तुम्हें राम जैसे पति और महासुख मिले, और अशुभ कर्म के उदय से रावण के हरण, पति का समाचार न मिलने तक ग्यारह दिन भोजन न करने और पति-दर्शन तक आभूषण, सुगंध और श्रृंगार के त्याग जैसे दुख सहे; अब फिर अशुभ कर्म उदय में आया है और लोकापवाद रूपी सर्प के डसने से मूर्च्छित-से तुम्हारे पति ने बिना समझे तुम्हें भयंकर वन में छोड़ दिया। फिर भी अब भी तुम्हारे पुण्य का ही उदय है, क्योंकि तुम्हारे शील के प्रभाव से ही मैं हाथी पकड़ने इस निर्जन वन में आया हूँ।
वे अपना परिचय देते हैं कि मैं पुंडरीकपुर का अधिपति वज्रजंघ हूँ, शुभ आचरण वाले सोमवंशी राजा और रानी सुबंधु का पुत्र, और धर्म के विधान से तुम मेरी बड़ी बहन हो, इसलिए शोक छोड़कर पुंडरीकपुर चलो, क्योंकि शोक से कोई कार्य सिद्ध नहीं होता। वे विश्वास दिलाते हैं कि अपने प्रमाद से ऐसा अमूल्य गुणवान रत्न खोकर राम भी पश्चाताप से व्याकुल होंगे और विवेकी होने से तुम्हें अवश्य ढूँढकर आदर से बुलाएँगे।
मानो भाई भामंडल ही मिल गए हों, ऐसा संतोष पाकर सीता वज्रजंघ की प्रशंसा करती हैं कि तुम मेरे उत्तम भाई, महायशस्वी, शूरवीर, बुद्धिमान, शांतस्वभावी और साधर्मियों के प्रति वात्सल्य रखने वाले महापुरुष हो। गौतम स्वामी श्रेणिक से कहते हैं कि राजा वज्रजंघ अधिगमज सम्यग्दृष्टि थे, जिन्होंने गुरु के उपदेश से सम्यक्त्व पाया था, और वे पवित्रात्मा, साधु समान भाव वाले तथा व्रत, गुण और शील से युक्त थे। सीता कहती हैं कि तुम अवश्य मेरे पूर्वभव के भाई या मित्र रहे होगे, क्योंकि संसार में हर जीव का हर जीव से किसी न किसी भव में माता, पिता, भाई, बहन या पुत्र का नाता रहा है और पुण्य के उदय से शत्रु भी मित्र हो जाता है, इसीलिए इस संकट में तुमने मुझे धर्म की बहन बनाकर मेरी रक्षा की।