पर्व 97
लोकापवाद के भय से सीता का परित्याग और वन में विलाप
लक्ष्मण की विनतियों को ठुकराकर राम गर्भवती सीता को तीर्थदर्शन के बहाने गंगा पार के वन में अकेली छुड़वा देते हैं, जहाँ वे मूर्च्छित होती हैं, राम के लिए निःस्वार्थ संदेश भेजती हैं और अपने पूर्वकर्मों पर विलाप करती हैं, तभी राजा वज्रजंघ की सेना उनका रुदन सुनती है।
कथा खंड राज्य, मथुरा और सीता का परित्यागसारांश
राम लक्ष्मण को लोकापवाद बताते हैं, और लक्ष्मण पहले निंदकों को दंड देने का प्रण करते हैं, फिर विनती करते हैं कि सीता सर्वथा निर्दोष हैं, फिर भी राम इक्ष्वाकु वंश की कीर्ति बचाने के लिए उन्हें त्यागने का निश्चय करते हैं। वे कृतांतवक्त्र को आज्ञा देते हैं कि जुड़वाँ गर्भ वाली सीता को चैत्यालयों के दर्शन कराकर निर्जन सिंहनाद अटवी में अकेली छोड़ आए। गंगा के पार सच जानकर सीता मूर्च्छित होती हैं, फिर राम को प्रजा की रक्षा करने और सम्यग्दर्शन कभी न छोड़ने का संदेश भेजती हैं, और पराधीनता को धिक्कारते कृतांतवक्त्र के लौट जाने पर अकेली विलाप करती हुई केवल अपने पूर्वकर्मों को दोष देती हैं। उनका रुदन हाथी पकड़कर लौटते पुंडरीकपुर के राजा वज्रजंघ की सेना तक पहुँचता है, और सारी सेना विस्मित होकर ठहर जाती है।
क्या हुआ
14 बिंदु
मन को कठोर कर राम लक्ष्मण को बुलवाते हैं; लक्ष्मण तुरंत घोड़े पर चढ़कर आते हैं, नमस्कार कर सिंहासन से नीचे भूमि पर राम के चरणों की ओर देखते बैठ जाते हैं, और राम उठकर उन्हें आधे सिंहासन पर बैठाते हैं, जबकि शत्रुघ्न आदि राजा, विराधित आदि विद्याधर, पुरोहित, सेठ, मंत्री और सेनापति यथास्थान बैठते हैं। राम से लोकापवाद का वृत्तांत सुनकर लक्ष्मण की आँखें क्रोध से लाल हो जाती हैं और वे योद्धाओं को आज्ञा देते हुए कहते हैं कि मैं अभी उन दुर्जनों का नाश कर पृथ्वी को अपवाद-रहित करूँगा, झूठे वचनों से महारानी सीता को कलंकित कहने वालों की जीभ काट डालूँगा और अनुपम शीलवती महासती सीता की निंदा करने वालों को मार डालूँगा।
राम उन्हें शांत करते हुए कहते हैं कि समुद्रपर्यंत इस पृथ्वी की रक्षा भगवान ऋषभदेव ने की और भरत चक्रवर्ती ने इसका पालन किया, और इक्ष्वाकु वंश के उन बड़े-बड़े राजाओं की कीर्ति-चाँदनी से यह जगत प्रसिद्ध है जिनकी पीठ रण में शत्रुओं ने कभी नहीं देखी, अतः मैं क्षणभंगुर राग के लिए अपने यश को कलंकित कैसे करूँ। थोड़ा-सा अपयश दूर न किया जाए तो वह महावृक्ष बन जाता है, यह अपवाद शस्त्रों से नष्ट नहीं होता, और जैसे सूर्य भी रात होते ही अस्त हो जाता है वैसे अपवाद से उत्तम पुरुषों की कांति नष्ट होती है; सीता महानिर्दोष और शीलवती है, यह मैं जानता हूँ, फिर भी तीर्थंकरों के उज्ज्वल कुल को कलंक न लगे, इसलिए मैं उसे तजूँगा।
राम के स्नेह में तत्पर महाबुद्धिमान लक्ष्मण कहते हैं कि महारानी सीता को शोक देना उचित नहीं: लोग तो मुनियों और जिनधर्म का भी अपवाद करते हैं, तो क्या लोकापवाद से धर्म छोड़ दें, और सब सतियों के मस्तक पर विराजमान महासती सीता किसी प्रकार निंदा के योग्य नहीं। अज्ञानी, आगमज्ञान से रहित, स्वयं दोषी लोग चन्द्रमा को भी काला देखते हैं पर चन्द्रमा श्वेत ही है, शीलवानों का साक्षी उनका अपना आत्मा है, विवेकी पुरुष नीचों के अपवाद पर वैसे ही क्रोध नहीं करते जैसे गजराज कुत्ते के भौंकने पर, और जो दूसरों के गुण सह नहीं सकते तथा सदा परनिंदा और आत्मप्रशंसा करते हैं वे नरक-निगोद में जन्म लेते हैं।
राम कहते हैं कि हे भाई, तुम जो कहते हो वह सब सत्य है और तुम्हारा मन राग-द्वेष रहित और मध्यस्थ है, परंतु शुद्ध न्यायमार्गी पुरुष लोकविरुद्ध कार्य छोड़ते हैं: जिसके अपयश का दावानल दसों दिशाओं में जल रहा हो उसे जगत में कहाँ सुख और उसका जीवन क्या, अनर्थ करने वाले धन, विष मिली औषधि और शरणागत की रक्षा न करने वाले बल से क्या लाभ। लोकापवाद की बात छोड़ भी दें, तो मेरा यह महादोष है कि परपुरुष द्वारा हरी गई सीता को मैं फिर घर ले आया, जो राक्षस के भवन के महाउद्यान में बहुत दिन रही, जहाँ रावण ने दूतियाँ भेजकर मनचाही प्रार्थनाएँ कीं, पास आकर दुष्ट दृष्टि से देखा और जो मन में आया कहा; वे स्वयं को संसार के मायारूपी राग में फँसा मूर्ख कहते हैं।
राम आज्ञा देते हैं कि शीघ्र कृतांतवक्त्र सेनापति को बुलाओ, और यद्यपि सीता दो बालकों के गर्भ सहित है, फिर भी उसे तत्काल मेरे घर से निकालो। लक्ष्मण हाथ जोड़कर विनती करते हैं कि राजा जनक की दुलारी, शीलवती, जिनधर्मिणी, कोमल शरीर वाली, भोली और सदा सुख में पली सीता गर्भ के भार के साथ अकेली वन में कहाँ जाएगी और किसकी शरण लेगी, और केवल देखे जाने से क्या दोष, जैसे जिनराज के सामने चढ़ाया द्रव्य सब देखते हैं और अभक्ष्य वस्तुएँ भी आँखों से दिखती हैं, पर दोष उन्हें ग्रहण करने में है।
अत्यंत विरक्त होकर क्रोध के आवेश में राम कहते हैं कि लक्ष्मण, अब कुछ मत कहना, मैंने निश्चय कर लिया है कि शुभ हो या अशुभ, मैं महारानी को ऐसे निर्जन वन में अकेली और बिना सहायता छोड़ूँगा जहाँ मनुष्य का नाम भी नहीं सुनाई देता, वह अपने कर्मों के योग से जिए या मरे, और वह एक क्षण भी मेरे देश, नगर या किसी के घर में नहीं रहेगी, क्योंकि वह मेरी अपकीर्ति का कारण है। कृतांतवक्त्र चार घोड़ों के रथ पर बड़ी सेना सहित छत्र, चढ़े धनुष और कवच के साथ राजमार्ग से आता है, नगर के नर-नारी चर्चा करते हैं कि आज यह किस पर क्रोधित है, और वह राम को शीश नवाकर आज्ञा माँगता है।
राम कहते हैं कि महारानी सीता को शीघ्र ले जाओ, मार्ग में जिनमंदिरों, सम्मेदशिखर आदि निर्वाण क्षेत्रों और चैत्यालयों के दर्शन कराकर उसकी इच्छा पूरी करो, और फिर सिंहनाद नाम की अटवी में, जहाँ मनुष्यों का आना-जाना और नाम तक नहीं, उसे अकेली छोड़ आओ। कृतांतवक्त्र मधुर स्वर में सीता से कहता है कि हे माता, रथ में बैठिए और चैत्यालयों में जिनबिंबों के दर्शन की अभिलाषा पूरी कीजिए; सीता रथ पर चढ़ते समय भगवान को नमस्कार कर कहती हैं कि चतुर्विध संघ जयवंत हो, जिनधर्मी राम जयवंत हों, मेरे कारण किसी का अविनय हुआ हो तो जिनधर्म के अधिष्ठाता देव क्षमा करें, साथ चलने को उद्यत सखियों से कहती हैं कि तुम सुख से यहीं रहो, मैं शीघ्र दर्शन करके आऊँगी, और सिद्ध परमेष्ठी को नमस्कार कर प्रसन्नता से रथ पर बैठ जाती हैं।
कृतांतवक्त्र रत्न-स्वर्णमय रथ को भरत चक्रवर्ती के छोड़े बाण की तरह तेज चलाता है। मार्ग में अपशकुन होते हैं, सूखे पेड़ पर बैठा कौआ कठोर स्वर में बोलता और बार-बार सिर धुनता है और सामने बिखरे बालों वाली शोकाकुल स्त्री रोती दिखती है, पर जिनभक्ति में एकाग्र सीता उन पर ध्यान नहीं देतीं; गरुड़ के वेग वाले घोड़ों से पहाड़, गुफाएँ और वन लाँघते हुए वे गाँव, नगर, कमलों से भरे सरोवर, दावानल से जले और पतझड़ से सूने वन, भीलों के शब्द से भागते मृग और फल-फूलों से झुके वृक्ष देखती हैं, और राम में मन लगाए वे हर मधुर ध्वनि को राम के महल में बजती दुंदुभी जैसी मानती हैं।
पवन के वेग वाले घोड़े रथ को मछलियों और मगरों से भरी गंगा के पार ले जाते हैं, जैसे साधु संसार-समुद्र से पार होते हैं। किनारे पर पहुँचकर मेरु समान अचल मन वाला सेनापति भी दया से महादुखी हो जाता है, रथ रोककर ऊँचे स्वर से रोने लगता है, और जब सीता पूछती हैं कि जिनवंदना के उत्सव के दिन वह क्यों विषाद करता है, तो वह विष, अग्नि और शस्त्र जैसे वचनों में सच बताता है कि दुर्जनों के कहने और अपकीर्ति के भय से राम ने आपको वैसे ही त्याग दिया है जैसे मुनि राग को त्यागते हैं और इस भयानक वन में छोड़ने की आज्ञा दी है; लक्ष्मण ने आपके पक्ष में जितना कहा जा सकता था सब कहा पर राम ने हठ नहीं छोड़ा, इसलिए अब धर्म ही आपकी शरण है और सिंह, बाघ और हाथियों से भरा यह वन ही आपका आश्रय।
यह सुनकर सीता वज्रपात से आहत-सी मूर्च्छित होकर गिर पड़ती हैं, और होश आने पर गद्गद वाणी से कहती हैं कि मुझे शीघ्र मेरे प्राणनाथ से मिलाओ, पर कृतांतवक्त्र कहता है कि नगरी और राम का दर्शन अब बहुत दूर है। आँसुओं से मुख धोती हुई वे राम के लिए संदेश देती हैं कि मुझे छोड़ने का विषाद न करें, परम धैर्य से प्रजा की रक्षा ऐसे करें जैसे पिता पुत्र की, क्योंकि राजा वही है जिसे प्रजा शरद पूर्णिमा के चन्द्रमा जैसा चाहे; दुष्टों की निंदा के भय से सम्यग्दर्शन कभी न छोड़ें, जो समुद्र में गिरे अमूल्य रत्न की तरह फिर मिलना कठिन है, दान और वात्सल्य से प्रजा को प्रसन्न रखें, साधु-आर्यिकाओं को नवधा भक्ति से आहार दें, चतुर्विध संघ की सेवा करें, और क्रोध को क्षमा से, मान को मार्दव से, माया को सरलता से और लोभ को संतोष से जीतें।
यह कहकर कि आप सब शास्त्रों के ज्ञाता हैं, हम स्त्रियाँ आपको उपदेश देने में समर्थ नहीं, और कभी हँसी में कोई अविनय भरा शब्द कहा हो तो क्षमा कीजिए, वे रथ से उतरती हैं और तृण, कंकड़, पत्थर और काँटों से भरी भूमि पर मूर्च्छित होकर गिर पड़ती हैं, मानो रत्नों की राशि पड़ी हो। स्वामी की आज्ञा और अपनी दया के बीच फँसा कृतांतवक्त्र पराधीनता को धिक्कारता है कि चाकर से कूकर भला, जो स्वाधीन होकर अपनी आजीविका चलाता है, और सेवक तो कठपुतली, यंत्र या विमान की तरह दूसरे के चलाए चलता है; और जैसे कोई धर्म को छोड़ता है, वैसे ही वह निर्दोष महासती को वन में छोड़कर दुखी मन से अयोध्या की ओर लौट जाता है।
उसके जाने के बहुत देर बाद सीता की मूर्च्छा टूटती है और वे महादुखी हिरनी की तरह आक्रंदन करती हुई रोती हैं, मानो वन की सारी वनस्पति भी उनके साथ रो रही हो। वे कमलनयन राम को रक्षा के लिए पुकारती हैं, फिर भी कहती हैं कि आपमें लेश मात्र दोष नहीं, मैं अपने ही कर्मों का फल भोग रही हूँ: शायद पूर्वभव में मैंने किसी का अपवाद किया, गुरु से लिया व्रत भंग किया, कठोर वचनों से किसी का अपमान किया, चकवा-चकवी, हंस-हंसिनी या कबूतर के जोड़ों का बिछोह कराया, मुनि-आर्यिकाओं की निंदा की, दान-पूजा में विघ्न डाला, गाँव या वन जलाया, अनछना पानी पिया, रात्रि में भोजन किया या अभक्ष्य खाया।
वे विलाप करती हैं कि राम की जो पटरानी रत्न-स्वर्ण के महलों में सुंदर सेज पर वीणा, बाँसुरी और मृदंग की मधुर ध्वनि सुनते हुए सोती थी और जिसकी सेवा हजारों दासियाँ करती थीं, वह अब पशुओं के भयंकर शब्दों के बीच कंकड़, पत्थर और काँटों की भूमि पर अकेली कैसे सोएगी, और इस पहाड़ जैसे वज्रमय अपवाद में फँसकर भी उनका हृदय सौ टुकड़े क्यों नहीं होता, सो वह वज्र का है। वे राम, देवर लक्ष्मण, पिता जनक, माता विदेहा और विद्याधरों के स्वामी भाई भामंडल को पुकारती हैं कि जिस स्वामी ने उनके साथ परम विभूति से जिनदर्शन-पूजा का विचार किया था, उसी ने उन्हें इस वन में निकाल दिया।
उसी समय पुंडरीकपुर के स्वामी राजा वज्रजंघ, जो हाथी पकड़ने वन में आए थे, हाथी पकड़कर बड़ी विभूति के साथ अपने नगर लौट रहे थे। कमर में कटार आदि शस्त्र बाँधे उनके पैदल सैनिक रुदन सुनकर संशय और भय से एक पग भी आगे नहीं बढ़ पाते, घुड़सवार भी ठहर जाते हैं, और सब सोचते हैं कि सिंह, बाघ, गैंडे और अष्टापद जैसे भयंकर पशुओं से भरे इस वन में चन्द्रकला जैसे मधुर स्वर से कौन रो रही है, क्या सौधर्म स्वर्ग से आई कोई देवांगना है, किसी चक्रवर्ती की पटरानी, कोई किन्नरी या इन्द्राणी शची; और समुद्र के समान विशाल और गरजती सारी सेना एकाग्र होकर वहीं खड़ी हो जाती है।