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पर्व 96

सीता का लोकापवाद और राम की चिंता

सीता की दाहिनी आँख अपशकुन से फड़कती है, और नगर के मुखिया राम से कहते हैं कि सारे राज्य में चर्चा है कि उन्होंने रावण के घर रही रानी को वापस रख लिया, और राम सीता के प्रेम और अपयश के भय के बीच फँस जाते हैं।

कथा खंड राज्य, मथुरा और सीता का परित्याग

सारांश

दरबार के उद्यान में रहते सीता की दाहिनी आँख फड़कती है और उन्हें नए दुख का भय होता है; रानियों की सलाह पर वे प्रसूति तक निरंतर दान और पूजा की आज्ञा देती हैं, और भंडारी भद्रकलश मंदिरों को चढ़ावे से भर देता है तथा नगर भर में दान की घोषणा होती है। इधर नगर के मुखिया राम के सामने आते हैं, जो अभयदान मिलने तक भय से बोल नहीं पाते, और उनका मुखिया विजय बताता है कि हर जगह चर्चा है कि राम ने रावण के घर रही सीता को वापस रख लिया, और इस उदाहरण से सारी मर्यादा टूट रही है। मानो मुगदर की चोट खाकर राम अपवाद मिटाने के कर्तव्य और निर्दोष सीता के प्रति गहरे प्रेम के बीच डोलते हैं, और पर्व इस सीख के साथ पूरा होता है कि राग ही सब दुखों का मूल है।

क्या हुआ

10 बिंदु

  1. राम के उद्यान में रहते प्रजा के लोग उनके दर्शन की अभिलाषा से आते हैं, और द्वारपालियाँ राजसभा में जाकर उनके आने की सूचना देती हैं। उसी समय सीता की दाहिनी आँख फड़कने लगती है, और वे सोचती हैं कि यह किसी दुख के आगमन की सूचना है; क्या समुद्र के बीच महादुख भुगवाने वाले मेरे दुष्ट कर्म अब भी संतुष्ट नहीं हुए, क्योंकि राग-द्वेष से बाँधे कर्मों का फल अवश्य मिलता है और किसी के टाले नहीं टलता।

  2. सीता अन्य रानियों से आँख फड़कने का फल पूछती हैं। महाप्रवीण रानी अनुमति कहती है कि इस जीव ने जो शुभ-अशुभ कर्म बाँधे हैं वही उसे अच्छा-बुरा फल देते हैं, कर्म को ही काल कहो, विधि कहो या ईश्वर, सब संसारी जीव कर्मों के अधीन हैं और केवल सिद्ध परमेष्ठी कर्मरहित हैं; गुण-दोष की ज्ञाता रानी गुणमाला सीता को रोती देखकर ढाढ़स बँधाती है कि आप पति की सबसे श्रेष्ठ महारानी हैं, आपको कोई कष्ट नहीं होगा।

  3. अन्य रानियाँ कहती हैं कि बहुत सोचने से क्या, पूजा कराइए और किमिच्छक दान दीजिए, जो जिसकी इच्छा हो वह ले जाए, क्योंकि दान और पूजा से अशुभ कर्म दूर होते हैं। प्रसन्न होकर सीता मानती हैं कि दान विघ्नों और बैर का नाशक तथा पुण्य और यश का मूल है, और भंडारी भद्रकलश को बुलाकर आज्ञा देती हैं कि जब तक मेरी प्रसूति न हो, तब तक निरंतर किमिच्छक दान देते रहना।

  4. भद्रकलश सब चैत्यालयों में अनेक प्रकार के उपकरण और बर्तन चढ़ाता है, सभी में नृत्य, गान और वाद्य कराता है, भगवान के चरित्र और पुराण आदि ग्रंथ जिनमंदिरों में विराजमान कराता है, और जिनेन्द्र के अभिषेक के लिए दूध, दही, घी, जल और मिष्ठान से भरे कलश मंदिरों में भेजता है। सब खोजों का प्रधान सुंदर वस्त्राभूषण पहनकर हाथी पर बैठ नगर में घोषणा करता है कि जिसकी जो इच्छा हो वह ले जाए; लोग पाप छोड़कर पूजा, दान और तप में लीन होते हैं, और सीता शांत मन से धर्मध्यान में अनुरक्त हो जाती हैं।

  5. राम मंडप में आकर विराजते हैं और द्वारपाल नगर के लोगों को उनसे मिलाता है; स्वर्ण-रत्नों से बनी अद्भुत सभा देखकर लोग चकित हो जाते हैं और काँपते शरीर तथा भयभीत मन से हाथ जोड़कर नमस्कार करते हैं। राम उनके आने का कारण पूछते हैं, तो विजय, मधुमान, काश्यप, पिंगल, कालक्षेम आदि नगर के मुखिया एकाग्र होकर राम के चरणों की ओर देखते रह जाते हैं; राम के प्रभाव से वे कुछ बोल नहीं पाते, और बार-बार शांति से पूछे जाने पर भी हिरन के बच्चों जैसे भयभीत होकर चित्र या ठूँठ की तरह खड़े रहते हैं।

  6. आखिर उनका मुखिया विजय काँपते शब्दों में कहता है, हे देव, अभयदान का आशीष दीजिए। राम कहते हैं कि किसी बात का भय मत करो, मन में जो है वैसा ही कहो, मैं तुम्हारा दुख दूर कर शांति दूँगा और तुम्हारे गुण ही ग्रहण करूँगा, अवगुण नहीं, जैसे हंस पानी छोड़कर दूध ही ग्रहण करता है।

  7. बड़ी कठिनाई से, धीरे-धीरे और धीमे स्वर में विजय हाथ जोड़कर कहता है कि अब सारी प्रजा मर्यादा छोड़कर चल रही है: लोग स्वभाव से कुटिल हैं और सामने एक उदाहरण दिख जाए तो खोटे काम में क्या भय, जैसे चंचल बंदर दर्पण देख ले तो क्या कहना; बलवान पापी अवसर पाकर निर्बलों की युवा, रूपवती स्त्रियों को बलपूर्वक हर ले जाते हैं, और कोई पति-वियोग से दुखी शीलवती स्त्री दूसरे के घर हो तो उसे सहायता देकर अपने घर ले आते हैं। नदियों के किनारे, वन-उपवन, कुएँ, तालाब, सरोवर और समुद्र-तट पर, गाँव-गाँव और घर-घर यही अपवाद की कथा है कि सब शास्त्रों के ज्ञाता दशरथ-पुत्र राम की पटरानी सीता को रावण हर ले गया और राम उन्हें वापस लाकर घर में रखे हैं, तो दूसरों का क्या दोष, क्योंकि जैसा राजा वैसी प्रजा।

  8. विजय प्रार्थना करता है कि ऐसा उपाय कीजिए जिससे धर्म की रक्षा हो और प्रजा का दुख मिटे, क्योंकि आपके समान बड़ा राजा कोई नहीं, आप रक्षा नहीं करेंगे तो कौन करेगा, और निरंकुश होकर अपवाद फैलाने वाले दुष्टों को दंड दीजिए; वह कहता है कि यह एक अपवाद न होता तो आपका राज्य इन्द्र से भी बढ़कर होता। यह सुनकर राम एक क्षण के लिए ऐसे विषादग्रस्त हो जाते हैं मानो किसी ने मुगदर मारा हो, और उन्हें लगता है कि उनके यशरूपी कमलों का वन अपयश की अग्नि में जलने लगा है।

  9. द्विधा में पड़े राम सोचते हैं कि जिस सीता के लिए उन्होंने समुद्र पार कर रण में शत्रु को जीता, वही उनके कुलरूपी दर्पण को और सुग्रीव, हनुमान, विभीषण जैसे महासुभटों वाले उनके गोत्र को कलंकित कर रही है, और लोग जो कहते हैं वह सत्य है कि वे पापी रावण के घर रही सीता को ले आए; फिर भी सीता महापतिव्रता, निर्दोष और शीलवती है, उसके क्षणभर के वियोग से भी वे आकुल हो जाते हैं, तो उसे कैसे छोड़ें। व्यथा में वे स्त्री को बल नष्ट करने वाली और निर्वाण-सुख में विघ्न डालने वाली कीचड़ तक कह डालते हैं और सोचते हैं कि प्रजा के दुख दूर करने के लिए उसे ऐसे छोड़ दें जैसे सर्प केंचुली छोड़ता है, पर तीव्र स्नेह उन्हें रोक लेता है।

  10. एक ओर लोकापवाद का भय और दूसरी ओर सीता के दुर्निवार प्रेम का भय, दोनों उनके पीछे लगे हैं, और सिंह-ध्वजा वाले राम को लगता है कि पृथ्वी पर उनके समान कोई दुखी नहीं, जैसे जेठ की दोपहर का सूर्य मनुष्यों को तपाता है। पर्व की सीख है कि राग ही महादुख का कारण है: जब तक राग जीव के साथ है तब तक संसार है, और राग के नाश से ही मुक्ति मिलती है, इसलिए संसारी प्राणी को त्याग की भावना करनी चाहिए।