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पर्व 95

सीता का गर्भ धारण और जिनपूजा का दोहला

सीता स्वप्न में दो अष्टापदों को मुख में प्रवेश करते देखती हैं और राम जुड़वाँ पुत्रों का फल बताते हैं; जब उन्हें सब चैत्यालयों में जिनपूजा का दोहला होता है, तो राम सारे देश में उत्सव कराते हैं और उन्हें महेन्द्र उद्यान में पूजा के लिए ले जाते हैं।

कथा खंड राज्य, मथुरा और सीता का परित्याग

सारांश

एक रात सीता स्वप्न में देखती हैं कि दो तेजस्वी अष्टापद उनके मुख में प्रवेश करते हैं और पवन के झोंके से वे पुष्पक विमान से गिर पड़ती हैं; राम पहले स्वप्न का फल जुड़वाँ पुत्र बताते हैं और दूसरे के अशुभ फल की शांति के लिए दान का उपाय कहते हैं। बसंत में महेन्द्र उद्यान खिल उठता है और गर्भ बढ़ने पर सीता की एक ही अभिलाषा होती है कि चैत्यालयों के दर्शन कर स्वर्ण-रत्नमय पुष्पों से जिनपूजा करें। राम सब जिनमंदिरों और निर्वाण क्षेत्रों में महोत्सव की आज्ञा देते हैं, उद्यान के चैत्यालय को भव्य रूप से सजवाते हैं, और सीता, लक्ष्मण, रानियों और सारे नगर के साथ वहाँ जाकर पूजा करते हैं और कुछ दिन वन में सुख से रहते हैं।

क्या हुआ

8 बिंदु

  1. राम-लक्ष्मण धर्म, अर्थ और काम तीनों पुरुषार्थों का मनचाहा सुख भोग रहे थे। एक रात विमान समान सुंदर महल में शरद के मेघ जैसी उज्ज्वल सेज पर सोई महासती सीता रात के पिछले पहर में दो स्वप्न देखती हैं और दिव्य बाजों की ध्वनि सुनकर जागती हैं; प्रातः स्नान और श्रृंगार कर वे सहेलियों सहित पति के पास जाकर स्वप्नों का फल पूछती हैं।

  2. पहले स्वप्न में शरद के चन्द्रमा जैसे उज्ज्वल, क्षुब्ध समुद्र जैसी गर्जना वाले, कैलाश के शिखर समान, सुंदर आभूषणों, मनोहर केसर और उज्ज्वल दाढ़ों वाले दो महाबलवान अष्टापद उनके मुख में प्रवेश करते हैं, और दूसरे में महाप्रबल पवन के झोंके से वे पुष्पक विमान के शिखर से पृथ्वी पर गिर पड़ती हैं। राम बताते हैं कि दो अष्टापदों के मुख में प्रवेश का फल यह है कि तुम्हारे एक साथ दो पुत्र होंगे; पुष्पक विमान से गिरना शुभ नहीं, फिर भी चिंता मत करो, दान के प्रभाव से क्रूर ग्रह और शत्रु शांत हो जाएँगे।

  3. बसंत ऋतु राजा के समान आती है: फूले हुए तिलक वृक्ष उसका कवच हैं, फूले नीम उसका गजराज हैं, और आम, कमल और केसर मानो उसके धनुष, बाण, तरकश और खड्ग जैसी सेना हैं। नंदनवन समान सुंदर महेन्द्र उद्यान फल-फूलों से शोभित होता है, और हंस, सारस, चकवा आदि पक्षी मानो मधुर स्वर से उस राजा का गुणगान करते हैं।

  4. गर्भ के भार से सीता का शरीर दुर्बल होने लगता है, तब राम पूछते हैं कि हे जगतप्रसिद्ध जानकी, तेरे मन में जो अभिलाषा हो वह शीघ्र बता, मैं तत्काल पूरी करूँगा। सीता संकोच और हर्ष से कहती हैं कि हे नाथ, मेरी इच्छा अनेक चैत्यालयों के दर्शन करने, लोक में मंगलरूप पाँचों वर्ण की जिनप्रतिमाओं को नमस्कार करने और स्वर्ण-रत्नमय पुष्पों से जिनेन्द्र भगवान की पूजा करने की है, और क्या इच्छा करूँ।

  5. परम हर्षित राम द्वारपाली को बुलाकर मंत्रियों तक आज्ञा पहुँचवाते हैं कि नगर के सब जिनमंदिरों और चैत्यालयों में विशेष प्रभावना हो, महेन्द्र उद्यान के चैत्यालय की अनुपम शोभा कराई जाए, और प्रजा जिनमंदिरों को स्वर्ण, रत्न और वस्त्रों के तोरण, ध्वजा, घंटा, झालर और चंदोवों से सजाकर सब पूजा-उपकरण दुगुने चढ़ाए। वे कैलाश, सम्मेदशिखर, चंपापुर, गिरनार, पावापुर, शत्रुंजय, मांगीतुंगी, गजपंथा, बावनगजा आदि निर्वाण क्षेत्रों में भी पूजा का विशेष आयोजन कराने को कहते हैं, क्योंकि सीता को कल्याणरूप और पुण्यदायी उत्तम दोहला उत्पन्न हुआ है, और कहते हैं कि हम सीता सहित शीघ्र ही सब धर्मक्षेत्रों में विहार करेंगे।

  6. द्वारपाली अपने स्थान पर दूसरी को रखकर मंत्रियों तक राम की आज्ञा पहुँचाती है, और मंत्री अपने-अपने सेवकों को काम में लगाते हैं। मंदिरों के द्वारों पर कलश रखे जाते हैं, दीवारें मोतियों के हारों से सजती हैं, मणियों के चित्र बनते हैं, खंभों पर शुद्ध मणियों के दर्पण लगते हैं, पाँच प्रकार के रत्नों के चूर्ण से मंडल बनते हैं, सहस्रदल कमलों से शोभा होती है, पाँच वर्ण के मणियों के डंडों पर सुंदर वस्त्रों की ध्वजाएँ शिखरों पर चढ़ाई जाती हैं, और अनेक वादित्रशालाएँ और नृत्यशालाएँ बनती हैं, जिससे महेन्द्र उद्यान मानो नंदनवन ही बन जाता है।

  7. इन्द्र समान राम नगर की सारी प्रजा, राजपरिवार और रानियों के साथ वन में पधारते हैं; सीता सहित हाथी पर आरूढ़ वे ऐसे लगते हैं जैसे शची सहित इन्द्र, और लक्ष्मण भी ठाठ के साथ वन जाते हैं; सबका भोजन-पानी वन में ही होता है, रानियाँ लताओं के मंडपों और केलों के बीच ठहरती हैं और बाकी लोग यथायोग्य स्थानों पर। राम हाथी से उतरकर निर्मल जल के सरोवर में ऐसे क्रीड़ा करते हैं जैसे इन्द्र क्षीरसागर में, फिर स्नान कर बाहर आकर दिव्य सामग्री से विधिपूर्वक महारानी सीता के साथ जिनेन्द्र भगवान की पूजा करते हैं।

  8. देवांगना समान आठ हजार रानियों के बीच, जो वनलक्ष्मी जैसी लगती हैं, राम मानो साक्षात बसंत या तारों सहित चन्द्रमंडल जैसे शोभते हैं, और अमृत समान आहार, सुगंधित लेपन, मनोहर सेज और आसन तथा सुगंधित मालाएँ, पाँचों इन्द्रियों के सब मनोज्ञ विषय उन्हें प्राप्त होते हैं। जिनमंदिरों में भक्तिपूर्वक विधि से पूजा और नृत्य होता है, पूजा-प्रभावना में राम का अनुराग बहुत बढ़ता है, और सूर्य से अधिक तेजस्वी राम अपनी रानियों सहित कुछ दिन वन में सुख से रहते हैं।