पर्व 53
हनुमान का लंका में जाकर सीता से भेंट कर लंका को नष्ट-भ्रष्ट करना
हनुमान ने सीता को राम की मुद्रिका दी, उन्हें भोजन के लिए मनाया, उनका चूड़ामणि लिया, और फिर रावण की जंजीरें तोड़कर लंका को तहस-नहस कर दिया।
कथा खंड सीता हरण और हनुमान का दौत्यसारांश
लंका में हनुमान ने पहले विभीषण से रावण को समझाने को कहा और जाना कि सीता ग्यारह दिन से निराहार हैं। प्रमद उद्यान में उन्होंने सीता की गोद में राम की मुद्रिका डाली, प्रकट होकर उनके व्याकुल प्रश्नों के उत्तर दिए, रावण की दूती बनकर आई मंदोदरी को फटकारा और क्रोधित रानियों से सीता की रक्षा की; सीता ने भोजन किया, पति की आज्ञा बिना जाने से मना किया और राम के लिए रहस्य की पहचानें तथा अपना चूड़ामणि भेजा। फिर हनुमान ने उद्यान और नगर को उजाड़ा, इंद्रजीत के नागपाश से पकड़े जाकर रावण के सामने लाए गए, उसके विनाश की भविष्यवाणी की, जंजीरें तोड़ीं और लंका का बड़ा द्वार तथा रावण का राजभवन लातों से गिराकर आकाश में चले गए।
क्या हुआ
13 बिंदु
थोड़े से सेवकों के साथ निःशंक होकर लंका में प्रवेश कर हनुमान विभीषण के राजभवन गए, और सम्मान पाकर बोले कि क्या तीन खंड के स्वामी रावण को दरिद्र मनुष्य की तरह चोरी से परस्त्री लाना उचित है, जैसे नदी का मूल पर्वत है वैसे राजा मर्यादा का मूल है, इसलिए जगत के कल्याण के लिए रावण को शीघ्र समझाओ। विभीषण ने कहा कि मैंने भाई को बहुत बार समझाया पर वह नहीं मानता, जिस दिन से सीता को लाया है हमसे बात भी नहीं करता, और आज ग्यारहवाँ दिन है कि सीता ने आहार तो क्या जल भी ग्रहण नहीं किया, फिर भी रावण को दया नहीं आती।
करुणा से भरे हनुमान भोगभूमि के वन समान सुंदर प्रमद उद्यान में गए और दूर से सम्यग्दर्शन सहित महासती सीता को देखा, जो निर्धूम अग्नि के समान थीं, आँखों में आँसू भरे, मुख पर हाथ रखे बैठी थीं, केश बिखरे थे और शरीर कृश हो गया था; उन्होंने निश्चय किया कि ऐसी महामाता को श्रीराम से मिलाऊँगा, चाहे शरीर ही क्यों न देना पड़े। अपना रूप अदृश्य कर उन्होंने श्रीराम की मुद्रिका सीता की गोद में डाली, जिसे देखकर सीता प्रसन्न हुईं और उनका मुख कुछ खिल उठा।
दासियों से सीता के प्रसन्न होने का समाचार सुनकर रावण ने संतुष्ट होकर उन्हें वस्त्र-रत्न दिए और मंदोदरी आदि सब रानियों को सीता के पास भेजा; मंदोदरी ने कहा कि अब तीन खंड के स्वामी रावण की रानी बनो, तो सीता ने क्रोध से कहा, हे खेचरी! आज मेरे पति के समाचार आए हैं, वे आनंद से हैं, इसलिए मुझे हर्ष हुआ है, और मंदोदरी ने समझा कि ग्यारह दिन के उपवास से यह बहकी बातें कर रही है। तब सीता ने कहा कि जो मेरे भाई समान श्रेष्ठ पुरुष पति की मुद्रिका लाया है वह प्रकट हो, और हनुमान ने सोचा कि उपकार करना चाहकर कायर बनकर छिपना अधम पुरुष का काम है, इसलिए मंदोदरी आदि रानियों के देखते-देखते वे सीता के पास आए और हाथ जोड़कर नमस्कार किया, मानो भाई भामंडल लेने आया हो।
हनुमान ने पहले अपना कुल, गोत्र, माता-पिता का नाम और फिर अपना नाम बताया और श्रीराम का संदेश कहा कि हे साध्वी! श्रीराम स्वर्ग-विमान समान राजमहलों में हैं, पर आपके वियोग रूपी समुद्र में मग्न हैं, सब भोग-उपभोग छोड़कर मौन से आपका ध्यान करते हैं, वीणा, स्त्रियों के गीत और राग भरी कथाएँ कभी नहीं सुनते, प्रतिसमय आपकी ही कथा करते हैं और केवल आपको देखने के लिए जीवित हैं। अति आनंदित सीता ने आँसू भरकर कहा कि भाई, मैं आपको क्या दूँ, तो हनुमान बोले कि आपके दर्शन ही मेरा महालाभ है।
सीता ने व्याकुल होकर पूछा कि जलचरों से भरा भयानक समुद्र तुम कैसे पार कर आए, मेरे प्राणनाथ को कहाँ देखा, युद्ध में गए लक्ष्मण कुशल हैं या नहीं, और कहीं मेरे स्वामी परलोक तो नहीं गए, या मुनि तो नहीं बन गए, या वियोग से शरीर शिथिल होने से अँगूठी उँगली से तो नहीं गिर गई; हनुमान ने विस्तार से बताया कि लक्ष्मण को सूर्यहास खड्ग सिद्ध हुआ, चंद्रनखा ने पति खरदूषण को क्रोध दिलाया, रावण ने कपट से सिंहनाद किया, राम ने वन-वन खोजते हुए मरते जटायु को णमोकार मंत्र और चार आराधनाएँ सुनाकर उसका समाधिमरण कराया, लक्ष्मण ने खरदूषण को मारा, चंद्रोदय का पुत्र विराधित आकर मिला और राम ने सुग्रीव का रूप बनाए साहसगति को मारा। उन्होंने कहा कि अब मैं श्रीराम का भेजा आपको छुड़ाने आया हूँ, युद्ध ठीक नहीं, और लंकापति दयावान, धर्म-अर्थ-काम का ज्ञाता और लोकापवाद से डरने वाला है, वह मेरी बात मानकर आपको श्रीराम के पास भेज देगा।
सीता ने पूछा कि हे कपिध्वज! तुम्हारे समान पराक्रमी मेरे पति के पास कितने हैं, तो मंदोदरी बोली कि भरतक्षेत्र में इन हनुमान के समान दूसरा कोई नहीं, यह पवन का पुत्र, अंजना का प्यारा सुत, रावण का भानजा-जमाई है जिसने चंद्रनखा की पुत्री अनंगकुसुमा से विवाह किया है, इसने कई बार रावण की सहायता की है और लंकापति इसे भाई से भी अधिक मानते हैं, फिर भी आश्चर्य है कि यह भूमिगोचरियों का दूत बनकर आया है। हनुमान ने कहा कि तुम राजा मय की पुत्री और अर्धचक्रवर्ती की पटरानी होकर पति को विष भरा भोजन करने से रोकने के बजाय परस्त्री के लिए उसकी दूती बनी हो, इसलिए अब मैं तुम्हें महिषी (पटरानी) नहीं, महिषी (भैंस) समझता हूँ।
मंदोदरी ने क्रोधित होकर कहा कि रावण को पता चला तो तुझे ऐसा दंड देंगे जो किसी को नहीं दिया, और जिसने रावण के बहनोई को मारा उसके सेवक बने सुग्रीव आदि मंदबुद्धि रंक मृत्यु के निकट हैं; तब सीता ने कहा कि मेरे पति के वज्रावर्त धनुष का शब्द सुनकर महायोद्धा भाग जाते हैं, वे लक्ष्मण सहित समुद्र तिरकर शीघ्र आएँगे और तू थोड़े ही समय में अपने पति को मरा देखेगी और विधवा होकर बहुत रोएगी। यह सुनकर मंदोदरी और अठारह हजार रानियाँ कटु वचन कहती हुई सीता को हाथों से मारने दौड़ीं, पर हनुमान ने वैद्य के समान बीच में आकर उन्हें रोका, और मानभंग होकर सब रानियाँ रावण के पास चली गईं।
फिर हनुमान ने सीता से आहार की प्रार्थना की कि समुद्रपर्यंत पृथ्वी श्रीराम की है, इसलिए यहाँ का अन्न भी श्रीराम का है, शत्रुओं का नहीं, और आपकी प्रतिज्ञा भी थी कि पति के समाचार सुनकर ही भोजन करूँगी; उन्होंने ईरा नाम की दासी को उत्तम भोजन-सामग्री लाने की आज्ञा दी और स्वयं विभीषण के यहाँ भोजन किया। ईरा चार मुहूर्त में सोने के पात्रों में घी, बूरा, दाल, चावल आदि ले आई, सीता ने विधिपूर्वक नाना व्यंजन बनाए, ईरा आदि सखियों को निमंत्रण दिया, हनुमान से भाई का भाव रखा, भगवान को नमस्कार कर उत्तम, मध्यम और जघन्य तीनों पात्रों को आहार देने की भावना की और सूर्य के प्रकाश में, दिन में ही शुद्ध आहार ग्रहण किया, क्योंकि रात्रि में भोजन योग्य नहीं।
हनुमान ने कहा कि मेरे कंधे पर चढ़ो, क्षणमात्र में समुद्र पार कर राम के पास ले चलूँगा, पर सीता ने रोते हुए कहा कि पति की आज्ञा बिना जाना उचित नहीं, वे पूछें कि बिना बुलाए क्यों आई तो क्या उत्तर दूँगी, और रावण ने उपद्रव सुन लिया होगा, इसलिए तुम अब देर न करो। उन्होंने रहस्य की पहचानें भेजीं: एक दिन चारण मुनि की वंदना कर कमलों के सरोवर में जलक्रीड़ा के समय आए महामत्त वनहाथी को राम ने क्षणभर में वश किया था, वृक्ष की शाखा पकड़कर झूलते समय मधुमक्खियाँ लगने पर राम ने उन्हें भुजाओं में उठा लिया था, सरोवर पर उन्हें प्रेम से कोमल कमलनाल दी थी, और कर्णकुंडल नदी के किनारे दो चारण मुनियों को आहार देने पर रत्नवर्षा, कल्पवृक्षों के पुष्पों की वर्षा, सुगंधित जल की वर्षा, शीतल-मंद-सुगंध पवन और दुंदुभि के साथ ‘धन्य पात्र, धन्य दाता, धन्य दान’ के जयकार, ये पंचाश्चर्य हुए थे।
रामचंद्रजी को विश्वास हो इसलिए सीता ने सिर से चूड़ामणि उतारकर दिया और कहलाया कि आपकी कृपा मुझ पर बहुत है, फिर भी अपने प्राण यत्न से रखना, अब आपके पुरुषार्थ से ही मिलन होगा; हनुमान ने धैर्य दिया कि हे माता! शीघ्र ही स्वामी से मिलन होगा, और सीता ने पति की अँगूठी उँगली में पहनकर ऐसा सुख माना मानो पति का समागम हुआ हो। वन की स्त्रियाँ हनुमान को कामदेव या देव समझकर चकित हुईं, रावण ने अपने क्रीड़ा-उद्यान में द्रोही के आने की बात सुनकर निर्दयी योद्धाओं को उसे मारने भेजा, और हनुमान ने मुकुट के रत्नजड़ित वानर-चिह्न से आकाश को प्रकाशित कर अनेक रूप दिखाए, जिससे किंकर भाग गए, फिर शक्ति, तोमर, गदा लेकर आए दूसरे सुभटों पर शस्त्ररहित अंजनापुत्र ने ऊँचे वृक्ष उखाड़कर और पर्वत की शिलाएँ फेंककर, मुक्कों और लातों से रावण के बहुत से सामंत मार डाले।
हनुमान ने उद्यान के विमान समान उत्तम भवन गिरा दिए, नगर के मकान, दुकानें और महल तोड़कर पहाड़ बना दिए, मरे किंकरों से बाजार रणभूमि बन गया और टूटे तोरण तथा गिरी ध्वजाओं की पंक्तियाँ इंद्रधनुष-सी लगीं, तब इंद्रजीत और मेघवाहन कवच पहनकर बड़ी सेना लेकर आए और लंका के बाहर बहुत देर तक महायुद्ध के बाद इंद्रजीत ने हनुमान को नागपाश से पकड़ लिया। रावण के पास पहले से शिकायतें पहुँच रही थीं कि इसने राम से मिलकर महेंद्र को जीता, साधुओं का उपसर्ग दूर किया, दधिमुख की राजकुमारियों को राम के पास भेजा, वज्रमय कोट तोड़ा, वज्रमुख को मारा और उसकी पुत्री लंकासुंदरी से विवाह किया; रावण ने उसे लोहे की साँकलों से बँधवाया, सभासदों ने कहा कि तीन खंड के स्वामी को छोड़ वन-वन भटकते भिखारियों का सेवक हुआ, और रावण ने कहा कि तू पवन का पुत्र नहीं, किसी और का है, तेरी क्रिया नीच पुरुषों जैसी है, तू राजद्रोही है, इसलिए मारने योग्य है।
हनुमान ने हँसकर कहा कि न जाने कौन मारने योग्य है, हे रावण! इस खोटी बुद्धि से तेरी मृत्यु निकट आई है; जैसे अनेक अमृत समान भोजनों से तृप्त न होने वाला विष की एक बूँद से मरता है, वैसे हजारों स्त्रियों से तृप्त न हुआ तू परस्त्री की अभिलाषा से नष्ट होगा, तू राजा रत्नश्रवा के कुल का क्षय करने वाला नीच पुत्र हुआ है और तेरे द्वारा राक्षसवंश का क्षय होगा, जिसमें पहले मर्यादा पालने वाले बड़े-बड़े पूज्य पुरुष मुक्ति गए। रावण ने आज्ञा दी कि इसे जंजीरों में बाँधकर पूरे नगर में घुमाओ, स्त्रियाँ धिक्कारें, बालक धूल डालें और कुत्ते भौंकें, तब हनुमान लोहे की जंजीरें तोड़कर आकाश में उछले और पैरों की लातों से लंका का बड़ा दरवाजा, कई छोटे दरवाजे और इंद्र के महल समान रावण का राजभवन गिरा दिया, जिसके केवल बड़े-बड़े स्तंभ रह गए और रत्न-सुवर्ण का कोट चूर्ण हो गया।
हनुमान का बल सुनकर सीता प्रसन्न हुईं, पर उनके बंधने की बात सुनकर दुखी हुईं, तब पास बैठी वज्रोदरी ने कहा कि वृथा क्यों रोती हो, वह देखो हनुमान बंधन तोड़कर आकाश में जा रहा है; सीता अति प्रसन्न हुईं कि यह मेरे समाचार अवश्य मेरे पति से कहेगा, और बैठे-बैठे पुष्पांजलि डालकर आशीष दी कि तुम कल्याण से पहुँचो, सब ग्रह सुखदाई हों, सब विघ्न नष्ट हों और तुम चिरंजीव हो। ग्रंथ कहता है कि पूर्वजन्म में उत्कृष्ट तप, व्रत और संयम धारण करने वाले हनुमान जैसे पुण्याधिकारी पुरुष चिंतन से परे आश्चर्यकारी कार्य करते हैं।