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पर्व 12

इन्द्र नामक विद्याधर के पराभव का कथन

रावण ने युक्ति से नलकूबर का नगर जीता, सुदर्शन चक्ररत्न पाया और महायुद्ध में विद्याधरों के राजा इन्द्र को बंदी बना लिया।

कथा खंड राक्षस, वानर और रावण का उदय

सारांश

रावण ने अपनी पुत्री कृतचित्रा का विवाह मथुरा के मधु से किया, जिसे पूर्वजन्म के मित्र असुरेन्द्र चमरेन्द्र ने त्रिशूलरत्न दिया था। नलकूबर के नगर को घेरकर रावण ने उसकी पत्नी उपरंभा का प्रेम स्वीकार करने का दिखावा कर मायामयी कोट को नष्ट करने वाली विद्या पाई और फिर उसे पति के पास लौटा दिया; विभीषण ने नलकूबर को पकड़ा और रावण की आयुधशाला में सुदर्शन चक्ररत्न उत्पन्न हुआ। पिता सहस्रार की सलाह ठुकराकर इन्द्र युद्ध में उतरा; जयंत द्वारा रावण के चाचा श्रीमाली के वध के बाद रावण ने दिव्य अस्त्रों के युद्ध में इन्द्र को हराकर बंदी बनाया और लंका ले आया।

क्या हुआ

18 बिंदु

  1. इन्द्र पर विजय निश्चित न होने से रावण ने पहले पुत्री कृतचित्रा के विवाह का मंगल कार्य करना उचित समझा। राजा हरिवाहन ने अपने पुत्र मधु को पास बुलाया, जो सुंदर, विनयी और नीतिशास्त्र में प्रवीण था; मंत्रियों ने बताया कि असुरों के इन्द्र चमरेन्द्र ने मधु को देदीप्यमान त्रिशूलरत्न दिया है जो शत्रु पर कभी व्यर्थ नहीं जाता, तब रावण ने बड़ी विभूति से कृतचित्रा का विवाह राजकुमार मधु से कर दिया।

  2. राजा श्रेणिक ने पूछा कि असुरेन्द्र ने मधु को त्रिशूलरत्न क्यों दिया, तब गौतम स्वामी ने बताया कि धातकीखंड द्वीप के ऐरावत क्षेत्र के शतद्वार नगर में सुमित्र और प्रभव नाम के दो परम मित्र साथ पढ़कर पंडित हुए; पूर्व पुण्य से सुमित्र राजा बना और दरिद्र कुल में जन्मे दुखी प्रभव को उसने महाप्रेम से अपने समान वैभवशाली बना लिया।

  3. एक दिन दुष्ट घोड़ा राजा सुमित्र को वन में ले गया, जहाँ भीलों के राजा ने उसे अपने घर ले जाकर अपनी पुत्री वनमाला से विवाह कर दिया; एक माह बाद पत्नी और भीलों की सेना के साथ लौटते समय मार्ग में मिले प्रभव का मन वनमाला पर मोहित हो गया, उसने खाना-पीना और नींद छोड़ दी और पूछने पर सच कह दिया। मित्र को प्राण समान मानने वाले सुमित्र ने रानी को प्रभव के घर भेजा और स्वयं झरोखे में छिपकर बैठ गया, यह सोचकर कि यदि वह मित्र की आज्ञा न माने तो उसे मार दूँगा और माने तो हजार गाँव दूँगा।

  4. रात को वनमाला ने प्रभव को विवाह तक का सारा वृत्तांत सुनाया तो प्रभव लज्जा से उदास हो गया कि माता समान मित्र-पत्नी पर मेरी दृष्टि बिगड़ी, और अपना मस्तक काटने के लिए म्यान से तलवार निकाली; तभी झरोखे से कूदकर सुमित्र ने उसका हाथ पकड़ लिया और समझाया कि आत्मघात से जीव नरक, अनेक अल्पायु भव और निगोद पाता है, तथा यह भी कहा कि इस असार संसार में हमारी मित्रता परभव में रहे या न रहे।

  5. सुमित्र महामुनि बनकर आयु पूर्ण होने पर दूसरे स्वर्ग में ईशान इन्द्र हुए और वहाँ से चयकर मथुरा के राजा हरिवाहन और रानी माधवी के पुत्र मधु हुए, जो हरिवंश रूपी आकाश में चन्द्रमा के समान प्रकट हुए। प्रभव सम्यक्त्व के बिना अनेक योनियों में भटककर विश्वासु और ज्योतिष्मती का पुत्र शिखी हुआ, जिसने द्रव्यलिंगी मुनि बनकर महातप किया और निदान के कारण असुरों का इन्द्र चमरेन्द्र हुआ।

  6. अवधिज्ञान से अपना पूर्वभव जानकर चमरेन्द्र को मित्र के उपकार, अपनी कुदृष्टि और साधुओं की निंदा से भोगे दुखों का स्मरण हुआ; वह प्रेम से मध्यलोक आया, मधुवाहन (मधु) की महारत्नों से पूजा की और सहस्रांत नामक त्रिशूलरत्न भेंट किया। शस्त्रविद्या का स्वामी, सिंहवाहन, हरिवंश का तिलक और रावण का जमाई राजा मधु मथुरा में सुख से रहता है।

  7. अठारह वर्ष तक विहार कर शत्रुओं को वश करते हुए रावण कैलाश पर्वत के पास आया और बाली मुनि का वृत्तांत याद कर चैत्यालयों को नमस्कार किया। इन्द्र ने दुर्लंघ्यपुर में नलकूबर लोकपाल को रखा था; उसने गुप्तचरों से रावण का आना जानकर इन्द्र को पत्र भेजा, और पांडुकवन के चैत्यालयों की वंदना को जाते इन्द्र ने उत्तर दिया कि मेरे लौटने तक सावधान रहना, अमोघ शस्त्रों और आयुधशाला की रक्षा करना और डरना नहीं।

  8. नलकूबर ने नगर की रक्षा के लिए विद्या से सौ योजन ऊँचा वज्रशाल नामक कोट बनाया, जो नगर की परिधि से तिगुना था। रावण के भेजे सेनापति प्रहस्त ने लौटकर बताया कि नगर मायामयी कोट से घिरा है, जिसके सर्प समान शिखरों से अग्निज्वालाएँ और स्फुलिंग निकलते हैं और विकराल दाढ़ों वाले बेताल रूपी यंत्र एक योजन के भीतर आने वाले मनुष्य को निगल जाते हैं; तब रावण के नीतिनिपुण मंत्री उपाय सोचने लगे।

  9. नलकूबर की पत्नी उपरंभा, जो इन्द्र की अप्सरा समान रूपवती थी, बचपन से रावण के गुण सुनकर उस पर मोहित थी; उसने सहेली विचित्रमाला से कहा कि मैं जानती हूँ परपुरुष का संग नरक का कारण है, पर रावण के बिना मरण भी नहीं सह सकती। अत्यंत महीन श्याम वस्त्र पहनकर विचित्रमाला आकाशमार्ग से रावण के पास आई और एकांत में कान में सब कहा, पर केकसी के पुत्र रावण ने कानों पर हाथ रखकर सिर हिलाया कि जिनेन्द्र की आज्ञा है, विधवा, कुँवारी, विवाहिता, वेश्या आदि सब परनारी त्यागने योग्य हैं, और परपुरुष से भोगी स्त्री वमन किए भोजन के समान है।

  10. विभीषण और नीतिज्ञ महामंत्रियों ने रावण को एकांत में समझाया कि राजाओं को कभी प्रयोजनवश थोड़ा झूठ भी बोलना पड़ता है, उपरंभा वश हुई तो कोट नाश करने का उपाय बताएगी; तब रावण ने मायाचार से कहा कि उसके प्राणों की रक्षा करना मेरा धर्म है, उसे बुलवाकर सम्मान दिया और कहा कि मैं उद्यान में नहीं, दुर्लंघ्य नगर में तुम्हारे साथ रमना चाहता हूँ। रावण की कुटिलता न समझकर उसने मायामयी कोट का नाश करने वाली आसाल नामक विद्या और देवों से रक्षित अनेक दिव्य शस्त्र दे दिए, जिससे मायामयी कोट तुरंत नष्ट हो गया और केवल सदा का कोट रह गया।

  11. मायामयी कोट न देखकर दुखी नलकूबर महापुरुषार्थ से युद्ध को निकला; ऐसा महासंग्राम हुआ कि सूर्य की किरणें भी न दिखें, और विभीषण ने लातों से नलकूबर का रथ तोड़कर उछलकर उसे वैसे ही पकड़ लिया जैसे रावण ने सहस्ररश्मि को पकड़ा था। इसी समय रावण की आयुधशाला में सुदर्शन चक्ररत्न उत्पन्न हुआ।

  12. रावण ने उपरंभा से एकांत में कहा कि तुमने मुझे विद्यादान दिया इसलिए तुम मेरी गुरु हुईं; तुम राजा आकाशध्वज और रानी मृदुकांता की पुत्री हो, उत्तम कुल में जन्मी हो, तुम्हें परपुरुष की इच्छा छोड़नी चाहिए, और यदि मैं ही ऐसा अन्याय करूँ तो और लोग भी इसी मार्ग पर चलेंगे। उपरंभा लज्जित होकर पति में संतुष्ट हुई, नलकूबर ने स्त्री के इस भाव को कभी न जाना और रावण से बहुत सम्मान पाया; रावण की यही रीति थी कि जो आज्ञा माने उसका सम्मान करे, जो न माने उससे युद्ध करे और जो पकड़ा जाए उसे छोड़ दे।

  13. रावण के वैताढ्य (विजयार्ध) पर्वत के पास ठहरने पर इन्द्र ने देव कहलाने वाले विद्याधरों को युद्ध की तैयारी का आदेश दिया और पिता सहस्रार से कहा कि मैंने उसे जन्मते ही नष्ट नहीं किया, जैसे काँटा कोमल रहते ही तोड़ दिया जाता है, यह भूल हुई। सहस्रार ने समझाया कि केवल पुरुषार्थ से सिद्धि नहीं होती, जैसे किसान को मेघवृष्टि भी चाहिए, इसलिए रावण से मेल करो और अपनी अति रूपवान पुत्री रूपवती का विवाह उससे कर दो; पर इन्द्र ने क्रोध से कहा कि क्या अनेक हिरणों को मारने वाले सिंह को अष्टापद नहीं मारता, और रावण बुद्धि-पराक्रम में मेरे बराबर वैसे ही नहीं जैसे सियार सिंह के बराबर नहीं।

  14. रथनूपुर से निकली इन्द्र की देवसेना ने पहले राक्षसों को हटाया, तब रावण के राक्षसवंशी योद्धा वज्रवेग, हस्त, प्रहस्त, मारीच, उद्भव, वज्रचक्र, शुक्र, घोर, सारण, गगनोज्ज्वल, महाजठर आदि ने देवों की सेना को पीछे धकेला। फिर इन्द्र के योद्धा मेघमाली, तडित्पिंग, ज्वलिताक्ष, संज्वर आदि ने राक्षसों को दबाया, तो वानरवंशी राजा महेन्द्रसेन के पुत्र प्रसन्नकीर्ति ने बाणों से देवों को हटा दिया।

  15. माल्यवान के पुत्र, रावण के प्रसिद्ध चाचा श्रीमाली ने मगरमच्छ की तरह इन्द्र की सेना को झकझोर दिया और अर्धचन्द्र बाणों से आकाश ढक दिया; यह जानकर कि श्रीमाली ने मेरे बड़े-बड़े देव और मेरा भानजा मारा है, इन्द्र स्वयं उससे लड़ने चला, पर पुत्र जयंत ने विनती कर उसकी जगह युद्ध किया। श्रीमाली ने कनक नामक शस्त्र से जयंत का रथ तोड़ा और जयंत ने भिंडमाल से श्रीमाली का, दोनों बारी-बारी मूर्च्छित हुए, अंत में जयंत ने गदा से छाती पर प्रहार कर श्रीमाली को मार डाला और शंखनाद किया।

  16. श्रीमाली को प्राणरहित देख रावण के पुत्र इन्द्रजीत ने सेना को साहस बँधाया और जयंत का कवच तोड़कर उसे बाणों से जर्जर कर दिया; तब इन्द्र ऐरावत हाथी पर चढ़कर, लोकपालों सहित हाथ में चक्र लेकर इन्द्रजीत पर आया। सुमति नामक सारथी के सावधान करने पर रावण ने पहले माली का मरण और अभी श्रीमाली का वध याद कर महाक्रोध से पवनवेगी रथ पर चढ़ाई की; घोर युद्ध में कई योद्धाओं ने अंत समय संन्यास धारकर णमोकार मंत्र जपते हुए स्वर्ग पाया और कई धर्मज्ञ क्षत्रियों ने मूर्च्छित शत्रु को पंखा झलकर सचेत किया।

  17. रावण ने कहा कि हाड़-मांस का यह क्षुद्र मनुष्य अभिमान से स्वयं को इन्द्र कहलाता है, कल्पना से लोकपाल बनाए हैं और मनुष्यों को देव नाम दिया है, जैसे कौआ अपने को गरुड़ माने; उसका रथ इन्द्र की ओर बढ़ते ही इन्द्र के सुभट भाग गए और कैलाश समान हाथी पर अकेला इन्द्र बाण बरसाता रहा, जिसे देख नारद आकाश में नाचने लगे। इन्द्र के अग्निबाण को रावण के जलबाण ने बुझाया, तामसबाण के अंधकार को प्रकाशबाण ने मिटाया, और रावण के नागबाण से बँधी इन्द्र की सेना को सोने जैसे पीले गरुड़बाण ने छुड़ाया।

  18. रावण ने त्रैलोक्यमंडन हाथी को ऐरावत पर चलाया, उछलकर ऐरावत के मस्तक पर पैर रखा, महावत को पैरों से मारकर नीचे गिराया, इन्द्र को वस्त्रों से बाँध लिया और दिलासा देकर अपने हाथी पर ले आया, तथा इन्द्रजीत ने जयंत को पकड़ लिया; जब इन्द्रजीत इन्द्र के सुभटों पर दौड़ा तो रावण ने रोका कि समस्त विजयार्ध का स्वामी पकड़ा गया, अब युद्ध बंद करो। विजय के बाजों के साथ रावण पुष्पक विमान में सजी-धजी लंका में आया; गौतम स्वामी कहते हैं कि रथनूपुर के इन्द्र ने पूर्वपुण्य से बहुत वर्ष दोनों श्रेणियों का राज्य किया, पर पुण्य क्षीण होते ही सारी विभूति नष्ट हो गई।