पर्व 13
विद्याधर इन्द्र का निर्वाण गमन
पिता सहस्रार की विनती पर छोड़े गए अपमानित इन्द्र ने चारण मुनि से अपने पूर्वभव सुनकर जिनदीक्षा ली और निर्वाण प्राप्त किया।
कथा खंड राक्षस, वानर और रावण का उदयसारांश
इन्द्र के पिता सहस्रार की विनती पर रावण ने आदरपूर्वक इन्द्र को छोड़ दिया और उसे चौथा भाई कहकर उसका राज्य लौटा दिया। पर अपमान से टूटे इन्द्र को वैराग्य हुआ; निर्वाणसंगम चारण मुनि ने उसके पूर्वभव सुनाए और बताया कि यह पराजय आनंदमाल मुनि की हँसी उड़ाने का फल थी। इन्द्र ने पुत्रों और लोकपालों सहित जिनदीक्षा ली और शुक्लध्यान से निर्वाण प्राप्त किया।
क्या हुआ
8 बिंदु
स्वामी के दुख से दुखी इन्द्र के योद्धा उसके पिता उदासीन श्रावक सहस्रार को लेकर इन्द्र को छुड़ाने लंका आए; रावण ने सहस्रार को सिंहासन पर बिठाया और स्वयं नीचे बैठा। सहस्रार और चारों लोकपालों ने इन्द्र को छोड़ने को कहा, तो रावण ने स्वीकार करते हुए हँसकर कहा कि चारों लोकपाल नगर में झाड़ू लगाकर उसे काँटों-कंकड़ों से रहित करें और इन्द्र सुगंधित जल से पृथ्वी सींचकर पाँच रंगों के सुगंधित फूलों से नगर सजाए।
लोकपालों ने लज्जा से मुख नीचा कर लिया, पर सहस्रार ने अमृत समान वचन कहे कि आपकी आज्ञा शिरोधार्य है, आप जैसे गुरुजन शिक्षा न दें तो पृथ्वी के लोग अन्याय मार्ग पर चलने लगें। प्रसन्न रावण ने कहा कि आप मेरे पिता समान हैं और इन्द्र मेरा चौथा भाई है, जिसके साथ मैं पृथ्वी को शत्रुरहित करूँगा; इसका इन्द्रपद, लोकपाल और दोनों श्रेणियों का राज्य जैसा का तैसा रहे, अधिक चाहें तो और लें, और आप रथनूपुर में रहें या लंका में, दोनों आपकी ही भूमि हैं।
सहस्रार ने रावण की शूरवीरता, क्षमा, दानशीलता और विनय की प्रशंसा कर उसके माता-पिता को धन्य कहा, पर बोले कि जन्मभूमि माता के समान है, बंधु-बांधव और प्रजा राह देख रहे होंगे, इसलिए हम रथनूपुर ही जाएँगे; रावण ने उसी समय इन्द्र को बुलाकर सहस्रार के साथ भेजा और बड़े विनय से दूर तक पहुँचाने गया। विजयार्ध पर्वत पर लौटकर राज्य और लोकपाल यथावत हो गए, पर मानभंग से इन्द्र और लोकपाल अपने लोगों के सामने भी लज्जा से मुख नीचा किए रहते थे।
इन्द्र को रथनूपुर, रानियों, उपवन, लोकपालों, प्रजा, यहाँ तक कि अपने शरीर से भी राग न रहा और उसने हँसना, बोलना, नृत्य-गान सब छोड़ दिया। राजमहल के मध्य गंधमादन पर्वत के शिखर समान ऊँचे जिनमंदिर में बैठकर वह चिंतन करने लगा कि धिक्कार है इस विद्याधर पद के ऐश्वर्य को, यह मेरे कर्मों का फल है, रावण मेरा क्या कर सकता है; रावण शत्रु का कार्य करके भी मित्र बनकर आया और मुझे संबोधित किया, अब मैं मोक्ष के कारण महाव्रत धारण करूँगा।
आकाशमार्ग से जाते चार ज्ञान के धारी निर्वाणसंगम नामक चारण मुनि चैत्यालय के कारण आगे न जा सके और नीचे उतरकर भगवान के दर्शन किए; इन्द्र ने उनके चरणों में नमस्कार कर बहुत देर तक अपनी निंदा की और उपदेश सुनकर अपने पूर्वभव पूछे। मुनि ने बताया कि शिखापद नगर में कुलवती नाम की कुरूप, रोगी, दूसरों की जूठन खाकर जीने वाली दुखी स्त्री ने मरते समय शुभ परिणामों से एक मुहूर्त (48 मिनट) के लिए चारों प्रकार के आहार का त्याग किया और किंपुरुष देव की शीलधरा नामक देवी हुई; वहाँ से चयकर वह जीव रत्ननगर में गोमुख ब्राह्मण और धरणी का पुत्र सहस्रभाग हुआ, जिसने सम्यक्त्व पाकर श्रावक के व्रत लिए और फिर शुक्र नामक नौवें स्वर्ग में उत्तम देव हुआ।
फिर विदेह क्षेत्र के रत्नसंचय नगर में मणि मंत्री और गुणावली का पुत्र सामंतवर्धन हुआ, जिसने पिता के साथ वैराग्य धारण कर बाईस परीषह सहे और नवग्रैवेयक में अहमिन्द्र हुआ; वहाँ से आकर तुम रथनूपुर में विद्याधर राजा सहस्रार और रानी हृदयसुंदरी के पुत्र इन्द्र हुए, और पूर्व अभ्यास से इन्द्र जैसे सुखों में मन आसक्त होने से विद्याधरों के अधिपति इन्द्र कहलाए।
मुनि ने पराजय का कारण बताया: अरिंजयपुर के राजा वह्निवेग और रानी वेगवती की पुत्री अहिल्या के स्वयंवर में दोनों श्रेणियों के विद्याधर और तुम भी आए थे, पर अहिल्या ने चन्द्रावर्त नगर के राजा आनंदमाल को वरमाला पहनाई, तब से तुम उससे ईर्ष्या करने लगे। आनंदमाल ने वैराग्य लेकर हंसावली नदी के किनारे कायोत्सर्ग धारण किया, तब तुमने हँसकर उसकी निंदा की कि अब अहिल्या का साथ क्यों छोड़ दिया; उनके भाई कल्याण मुनि ने कहा कि निरपराध महामुनि की हँसी उड़ाने से तुम्हारा नाश होगा, और साधुओं की भक्त सम्यग्दृष्टि पत्नी सर्वश्री ने उन्हें नमस्कार कर शांत न किया होता तो तुम तत्काल भस्म हो जाते। यह अपमान उसी पाप का फल है, रावण तो निमित्त मात्र है, क्योंकि मुनि की अवज्ञा के समान कोई पाप नहीं।
पूर्वभव सुनकर आश्चर्यचकित इन्द्र ने मुनि को बारंबार नमस्कार कर कहा कि आपकी कृपा से उत्तम ज्ञान मिला; मुनि के विहार कर जाने पर उसने शरीर को जल के बुलबुले समान जानकर राज्य पुत्र को सौंपा और बहुत से पुत्रों, लोकपालों तथा अन्य राजाओं सहित जिनदीक्षा ली, और जैसे पहले भोगों में लगा था वैसे ही तप-संयम में लगकर बहुत काल तप किया तथा शुक्लध्यान से कर्मों का क्षय कर निर्वाण पधारा। गौतम स्वामी ने श्रेणिक से कहा कि धन के मद में कभी गुरुओं की निंदा, अवज्ञा या अपवाद नहीं करना चाहिए, क्योंकि हँसी-हँसी में बँधा कर्म उदय में आने पर रो-रोकर भोगना पड़ता है।