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पर्व 14

अनंतवीर्य केवली के धर्मोपदेश का वर्णन

सुमेरु से लौटते हुए रावण ने अनंतवीर्य केवली का धर्मोपदेश सुना और नियम लिया कि किसी परस्त्री को उसकी इच्छा के बिना बलपूर्वक ग्रहण नहीं करेगा।

कथा खंड राक्षस, वानर और रावण का उदय

सारांश

लंका लौटते हुए रावण उन अनंतवीर्य मुनि की वंदना को उतरता है जिन्हें अभी-अभी केवलज्ञान हुआ था, और उनके विस्तृत उपदेश में चारों गतियों, पाप-पुण्य के फल, दान की विधि, मुनि और श्रावक के व्रतों तथा बारह भावनाओं का वर्णन सुनता है। कुंभकर्ण के प्रश्नों के उत्तर में केवली छोटे-छोटे नियमों, जैसे दिन में कुछ समय आहार-त्याग और रात्रिभोजन-त्याग, की भी महिमा बताते हैं। सभा में अनेक लोग व्रत लेते हैं: रावण नियम लेता है कि किसी परस्त्री को उसकी इच्छा के बिना ग्रहण नहीं करेगा, और कुंभकर्ण प्रतिदिन जिनपूजा कर मुनि को आहार देकर ही भोजन करने का नियम लेता है।

क्या हुआ

22 बिंदु

  1. देवेन्द्र के समान भोग भोगता हुआ रावण सुमेरु पर्वत के चैत्यालयों की वंदना कर सूर्य के भवन जैसे विमान में लंका लौट रहा था और मार्ग में सात क्षेत्रों और छह कुलाचलों की शोभा देख रहा था। मनोहर महाशब्द सुनकर और दसों दिशाएँ लाल देखकर उसने मारीच मंत्री से कारण पूछा, तो मारीच ने बताया कि इस स्वर्ण पर्वत पर अनंतवीर्य मुनिराज को केवलज्ञान हुआ है और उनकी गंधकुटी के दर्शन को आते देवों के मुकुटों की किरणों से दिशाएँ लाल हो रही हैं।

  2. सम्यग्दर्शन के धारी रावण ने हर्षित होकर विद्याधरों सहित उतरकर केवली की वंदना-स्तुति की और इन्द्रादि चारों प्रकार के देवों, मनुष्यों और तिर्यंचों के बीच उचित स्थान पर बैठ गया। एक शिष्य ने धर्म-अधर्म, उनके फल और मोक्षमार्ग के विषय में पूछा, तब अनंतवीर्य केवली ने कहा कि चेतना लक्षण वाला जीव अनादि से आठ कर्मों से बँधा, कुम्हार के चाक की तरह चारों गतियों और चौरासी लाख योनियों में घूमता है और दुर्लभ मनुष्य जन्म पाकर भी उसे इंद्रिय-विषयों में गँवा देता है।

  3. जो माता-पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, बालक और वृद्धों की हत्या करते हैं, गर्भपात कराते हैं, शिकार करते हैं, शहद के लिए छत्ते तोड़ते हैं, मांस और मधु खाते हैं, मदिरा पीते हैं, गाँव जलाते हैं, गायें काटते हैं, झूठ बोलते हैं, चोरी करते हैं और परस्त्री-सेवन करते हैं, वे नरक में जाते हैं। वहाँ मांसभक्षी को उसी का शरीर काटकर खिलाया जाता है, मद्यपायी को पिघला सीसा पिलाया जाता है, परस्त्रीगामी को तपी लोहे की पुतलियों से आलिंगन कराया जाता है और टुकड़े-टुकड़े हुआ शरीर पारे की तरह फिर जुड़ जाता है।

  4. मायाचारी और विषयों के अभिलाषी जीव तिर्यंच होकर वध, बंधन, भार ढोना, शीत, गर्मी और भूख-प्यास के दुख भोगते हैं; मायारहित, संतोषी जीव मनुष्य होते हैं, जहाँ कोई धनी, कोई दरिद्र, कोई स्वामी, कोई सेवक होता है। मुनिव्रत, श्रावकव्रत, सम्यक्त्व, अकाम निर्जरा और अज्ञान तप से भी देवगति मिलती है, पर वहाँ भी ऋद्धि के भेद से हर्ष-विषाद होता है, अतः निश्चय से चारों गतियों में दुख ही है।

  5. दान के विषय में उन्होंने कहा कि परिग्रह रहित मुनि उत्तम पात्र, आर्यिका, ऐलक, क्षुल्लक और क्षुल्लिका मध्यम पात्र तथा व्रतरहित सम्यग्दृष्टि जघन्य पात्र हैं, जिन्हें दिया दान क्रमशः उत्तम, मध्यम और जघन्य भोगभूमि देता है, और अंधे, लंगड़े, रोगी, भूखे को अन्न, औषधि, वस्त्र देना करुणादान है। जैसे कुएँ का जल गन्ने में मीठा और नीम में कड़वा होता है, और गाय पीए तो दूध तथा सर्प पीए तो विष बनता है, वैसे ही सुपात्र को दिया दान शुभ फल देता है और मांसभक्षी, अभिमानी मिथ्यादृष्टि को दिया दान निष्फल जाता है।

  6. शस्त्र, फाँसी, पशु या पशुबलि का दान महापाप है और भूमिदान भी हिंसा का कारण है, केवल जिनमंदिर के लिए भूमि देना महादान है। उन्होंने एकेन्द्रिय से पंचेन्द्रिय तक सब जीवों को अभयदान, विवेकियों को शास्त्रदान और सबको अन्न-जल देने का उपदेश दिया, तथा धन लगाने के सात महाक्षेत्र बताए: जिनप्रतिमा, जिनमंदिर, जिनपूजा, जिनप्रतिष्ठा, सिद्धक्षेत्रों की यात्रा, चतुर्विध संघ की भक्ति और शास्त्रदान।

  7. जो आयुध, स्त्री और आभूषण रखते हैं वे रागी-द्वेषी हैं, क्योंकि सब दोषों का मूल मोह है; ऐसे कुदेवों की सेवा बालू पेलकर तेल निकालने या एक लंगड़े द्वारा दूसरे लंगड़े को देशांतर ले जाने के समान व्यर्थ है। जिनमंदिर बनवाने की थोड़ी हिंसा सरोवर में विष के कण के समान है, और मंदिर बनवाने वाले स्वर्ग के भोग भोगकर फिर मनुष्य हो महाव्रत पालकर परमपद पाते हैं।

  8. हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह का पूर्ण त्याग रूप पाँच महाव्रत; चार हाथ भूमि देखकर चलना, हित-मित-प्रिय वचन, निर्दोष आहार, उपकरण देखकर उठाना-रखना और निर्जंतु भूमि पर मल-त्याग रूप पाँच समितियाँ; मन, वचन, काय की प्रवृत्ति के निग्रह रूप तीन गुप्तियाँ; पाँचों इंद्रियों का वश; और क्षमा से क्रोध, मार्दव से मान, आर्जव से माया तथा संतोष से लोभ को जीतना, यह मुनियों का धर्म है।

  9. उन्होंने बारह तप बताए: छह बाह्य तप अनशन, अवमौदर्य, वृत्तिपरिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्त शय्यासन और कायक्लेश (गर्मी में पर्वत शिखर, शीत में नदी तट और वर्षा में वृक्ष तले तप); तथा छह अंतरंग तप प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्य, वाचना-पृच्छना-आम्नाय-अनुप्रेक्षा-धर्मोपदेश रूप स्वाध्याय, एक दिन से एक वर्ष तक कायोत्सर्ग रूप व्युत्सर्ग, और आर्त-रौद्र ध्यान छोड़कर धर्म्य-शुक्ल ध्यान।

  10. तप से ऋद्धियाँ मिलती हैं, जिनमें अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व ये आठ विक्रिया ऋद्धियाँ हैं; ऐसे मुनि चाहें तो सूर्य का आताप रोक दें, जलवृष्टि से जगत भर दें, भस्म कर दें या रत्नों की वर्षा कर दें, पर वे परम शांत रहते हैं और केवल धर्म की रक्षा के लिए ही ऋद्धि का उपयोग करते हैं, अन्यथा चारित्र का नाश होता है; उनकी चरणरज से भी रोग मिटते हैं। जो उसी भव में मोक्ष नहीं जाते वे सौधर्म से सर्वार्थसिद्धि तक इन्द्रादि पद पाते हैं, जहाँ रात-दिन, ऋतुएँ और नींद नहीं हैं, और देव उपपाद शय्या पर सोकर जागे मनुष्य की तरह युवा रूप में जन्म लेते हैं, उनका शरीर सात धातुओं से रहित और सुगंधित होता है।

  11. तीर्थंकर, चक्रवर्ती, कामदेव, बलभद्र आदि पद और तीनों लोकों का सब सुख शुभोपयोग रूप व्यवहार धर्म का फल है, और सिद्धपद शुद्धोपयोग रूप आत्मधर्म का फल है: सिद्ध भगवान लोक के शिखर पर अष्टकर्म रहित, अनंतज्ञान, अनंतदर्शन, अनंतसुख और अनंतवीर्य से युक्त, अमूर्तिक, पुरुषाकार विराजमान हैं और फिर संसार में नहीं आते। मुनिधर्म मनुष्य देह से ही होता है, इसलिए जैसे पशुओं में सिंह और पक्षियों में गरुड़, वैसे सब योनियों में मनुष्य योनि श्रेष्ठ है, और समुद्र में गिरे रत्न की तरह खोया मनुष्य जन्म फिर मिलना दुर्लभ है।

  12. तृप्त न होने पर कुंभकर्ण ने हाथ जोड़कर विस्तार से धर्म पूछा; केवली ने बताया कि धर्म दो प्रकार का है, मुनियों का महाव्रत और गृहस्थों का अणुव्रत। इस अवसर्पिणी में ऋषभदेव से मुनिसुव्रत तक बीस तीर्थंकर हो चुके हैं और चार और होंगे; मुनिसुव्रतनाथ के इस समय में अनेक महापुरुष मुनि बने हैं, जो जहाँ सूर्य अस्त हो वहीं ठहर जाते हैं, अट्ठाईस मूलगुण, चौरासी लाख उत्तरगुण और अठारह हजार शील के भेदों के धारक हैं, सांख्य, बौद्ध, मीमांसक, नैयायिक, वैशेषिक और वेदांत के भी ज्ञाता हैं, और उसी भव में या तीन भवों में मोक्ष पाते हैं।

  13. गृहस्थ के बारह व्रतों में पहले पाँच अणुव्रत हैं: त्रसहिंसा, झूठ, चोरी और परस्त्री-परपुरुष का त्याग तथा परिग्रह परिमाण। संतोष के लिए उन्होंने कथा कही कि नित्य एक दीनार कमाने का नियम रखने वाले फल-व्यापारी भद्र ने मार्ग में गिरी दीनारों की थैली से एक दीनार ली और उसे बिना माँगे थैली के स्वामी राजा को लौटा दिया तो सम्मान पाया, जबकि पूरी थैली उठाने वाले कांचन को राजा ने पिटवाकर गाँव से निकाल दिया।

  14. फिर तीन गुणव्रत हैं: दसों दिशाओं में आने-जाने की मर्यादा, देशों की मर्यादा और अपध्यान, पापोपदेश, हिंसादान, दुःश्रुति तथा प्रमादचर्या रूप अनर्थदंडों का त्याग; और चार शिक्षाव्रत: दिन में तीन बार दो से छह घड़ी तक सामायिक, महीने की दो अष्टमी और दो चतुर्दशी को सोलह प्रहर का प्रोषधोपवास, बिना निमंत्रण आए मुनियों को आहार देने रूप अतिथि संविभाग और भोगोपभोग परिमाण; तथा आयु के अंत में सल्लेखना (समाधिमरण)।

  15. जिनधर्मी मद्य, मांस, मधु, मक्खन, उदुंबर फल, रात्रिभोजन, घुना अनाज, बिना छना जल और परस्त्री तथा वेश्या संगम का पूर्ण त्याग करता है, और शंका, कांक्षा, विचिकित्सा, मिथ्यामार्गियों की प्रशंसा और हिंसामार्गी मिथ्यादृष्टि की स्तुति, इन पाँच सम्यग्दर्शन के अतिचारों से बचता है। जैसे पत्थर की शिला समुद्र में नहीं तिरती और मार्ग न जानने वाला रोज बहुत चलकर भी गंतव्य तक नहीं पहुँचता, वैसे ही उग्र तप करने वाला मिथ्यादृष्टि भी संसार सागर से पार नहीं होता।

  16. ज्ञानी को बारह भावनाओं का नित्य चिंतन करना चाहिए: शरीरादि सब अनित्य हैं; आत्मा और पंचपरमेष्ठी के सिवा कोई शरण नहीं; संसार दुखरूप है; जीव सदा अकेला है; सब द्रव्य भिन्न-भिन्न हैं; शरीर अशुचि है; मिथ्यात्व, अविरति, कषाय, योग और प्रमाद से कर्मों का आस्रव होता है; व्रत, समिति, गुप्ति, दशधर्म, अनुप्रेक्षा, परीषहजय और चारित्र से संवर होता है; तप से निर्जरा होती है; लोक छह द्रव्यों से भरा, अनादि, अकृत्रिम, शाश्वत है और उसके शिखर पर सिद्धलोक है; शुद्धोपयोग दुर्लभ है; और आत्मा का स्वभाव तथा जीवदया ही धर्म है।

  17. कुंभकर्ण (भानुकर्ण) ने नियम का स्वरूप पूछा, तो केवली ने कहा कि नियम और तप में भेद नहीं है; जो दिन में एक मुहूर्त (चौबीस मिनट) आहार का त्याग करता है उसे महीने में एक उपवास का फल मिलता है, दो मुहूर्त पर दो और तीन मुहूर्त पर तीन का। वन में जंगली फल खाकर रहने वाली एक अज्ञानी तापस की पुत्री ने गुरु से एक मुहूर्त का नियम लिया, जिसके प्रभाव से एक राजा ने उससे आदरपूर्वक विवाह किया; वह धर्म में दृढ़ हुई, अनेक नियम लिए और परलोक में उत्तम गति पाई।

  18. उन्होंने रात्रिभोजन की निंदा की, क्योंकि रात में मक्खी, कीड़े और बाल भोजन में आ जाते हैं; सूर्योदय के अड़तालीस मिनट बाद से सूर्यास्त के अड़तालीस मिनट पहले तक ही भोजन करना चाहिए और रात में खाद्य, स्वाद्य, लेह्य, पेय चारों आहार त्यागने चाहिए। रात्रिभोजी राक्षस के समान है और शूकर, कूकर, गधा, कौआ होकर तथा नरक-निगोद में बहुत काल भटकता है, जबकि इसका त्यागी चक्रवर्ती, कामदेव, बलदेव, मंत्री और इन्द्र होता है, और ऐसी स्त्रियाँ सुप्रभा, सुभद्रा जैसी पटरानियाँ बनती हैं।

  19. सहस्रभट सुभट ने नियम लिया था कि मुनि के आहार का समय टालकर ही भोजन करूँगा; एक दिन ऋद्धिधारी मुनिराज का उसके घर निरंतराय आहार हुआ और रत्नवृष्टि आदि पंचाश्चर्य हुए; इस धर्म के प्रभाव से वह आगे चलकर पृथ्वी पर विख्यात, उदार, महाधनवान और शास्त्रज्ञ कुबेरकांत सेठ हुआ और अंत में जिनदीक्षा लेकर परमपद को पहुँचा। इसी व्रत के प्रभाव से हरिषेण चक्रवर्ती अनंत लक्ष्मी का स्वामी हुआ, और एक बार भोजन का नियम या अष्टमी-चतुर्दशी के उपवास करने वाले स्वर्ग पाते हैं।

  20. उपदेश के अंत में कोई मुनि बना, कोई श्रावक, किसी ने सम्यक्त्व पाया, कई उत्तम तिर्यंच अणुव्रती हुए और चारों निकायों के अनेक देवों ने सम्यक्त्व प्राप्त किया। तब धर्मरथ मुनिराज ने रावण से कहा कि इस धर्मरत्न के द्वीप में तुम भी कोई नियम रूपी रत्न ग्रहण करो; भोगों में आसक्त रावण ने सोचा कि मेरा आहार तो सहज ही मांस आदि से रहित शुद्ध है, मैं श्रावक का एक भी व्रत नहीं पाल सकता तो अग्नि की ज्वाला पीने, पवन को वस्त्र में बाँधने और पर्वत उठाने जैसे मुनिव्रत कैसे धारूँ, और लोक में ऐसी कौन नारी है जो मुझे देखकर मोहित न हो।

  21. तब अनंतवीर्य केवली को भावसहित नमस्कार कर, देव, मनुष्य और असुरों की साक्षी में रावण ने प्रकट वचन कहा: हे भगवन्! जो परनारी मुझे न चाहे, उसे मैं बलपूर्वक सेवन नहीं करूँगा, यह मेरा नियम है; उसने सोचा कि परपुरुष के संयोग से दूषित परस्त्री में मैं राग क्यों करूँ।

  22. सुमेरु समान अचल मन वाले कुंभकर्ण ने अरहंत, सिद्ध, साधु और केवलीप्रणीत धर्म की शरण लेकर नियम लिया कि मैं प्रतिदिन प्रातः उठकर जिनेन्द्र का अभिषेक, पूजा और स्तुति करके तथा मुनि को विधिपूर्वक आहार देकर ही भोजन करूँगा, मुनि की आहार बेला से पहले नहीं। अन्य लोगों ने भी बहुत नियम लिए, भवनत्रिक देव और विद्याधर अपने स्थान गए और रावण आकाशमार्ग से लंका लौटकर राजमहल में सुख से रहने लगा।