पर्व 93
राम को श्रीदामा और लक्ष्मण को मनोरमा की प्राप्ति
मनोरमा के लिए लक्ष्मण का नाम सुझाने पर उसके अभिमानी भाइयों द्वारा निकाले गए नारद लक्ष्मण को उसका चित्रपट दिखाते हैं, और रत्नपुर में शीघ्र युद्ध के बाद राम का श्रीदामा से और लक्ष्मण का मनोरमा से विवाह होता है।
कथा खंड राज्य, मथुरा और सीता का परित्यागसारांश
विजयार्ध पर्वत के रत्नपुर नगर के राजा रत्नरथ अपनी पुत्री मनोरमा के लिए वर खोजते हैं, और जब नारद लक्ष्मण का नाम सुझाते हैं तो राजा के अभिमानी पुत्र राम-लक्ष्मण को अपना शत्रु बताकर नारद को निकलवा देते हैं। नारद अयोध्या जाकर लक्ष्मण को राजकुमारी का चित्रपट दिखाते हैं, और मोहित लक्ष्मण राम तथा विद्याधर राजाओं के साथ रत्नपुर पर चढ़ाई करते हैं, जहाँ शत्रु सेना शीघ्र भाग जाती है। मनोरमा प्रेम से लक्ष्मण के पास आती है, रत्नरथ पुत्रों सहित शरण आता है और नारद उनका उपहास करते हैं, और राम का श्रीदामा से तथा लक्ष्मण का मनोरमा से विवाह होता है।
क्या हुआ
8 बिंदु
विजयार्ध पर्वत की दक्षिण श्रेणी के रत्नपुर नगर में राजा रत्नरथ और रानी पूर्णचन्द्रानना की पुत्री मनोरमा है, और व्याकुल राजा मंत्रियों से पूछता है कि राजकुमारी का विवाह किससे किया जाए। इसी चिंता में कई दिन बीत जाते हैं, तब एक दिन राजसभा में नारद आते हैं; राजा उनका बड़ा सम्मान कर पुत्री के विवाह की बात पूछता है, तो नारद राम के भाई नारायण लक्ष्मण का नाम लेते हैं, जो महासुंदर और तीन खंड के अधिपति हैं, जिनके चक्र के प्रभाव से तीन खंड के सब राजा नमस्कार करते हैं और देव-विद्याधर सेवक बनकर चरणों में खड़े रहते हैं।
यह सुनते ही रत्नरथ के महामानी पुत्र हरिवेग, मनोवेग, वायुवेग आदि प्रलयकाल की अग्नि के समान भड़ककर कहते हैं कि वे तो हमारे शत्रु हैं जिन्हें हम मारना चाहते हैं, उन्हें राजकन्या कैसे देंगे, और यह दुराचारी नारद है, इसे यहाँ से निकालो। सेवक नारद की ओर दौड़ते हैं, तो नारद आकाशमार्ग से शीघ्र अयोध्या में लक्ष्मण के पास पहुँच जाते हैं।
अनेक देशों की चर्चा के बाद नारद लक्ष्मण को मनोरमा का चित्रपट दिखाते हैं, जो तीनों लोकों में परम सुंदरी है, और महाधीर वीर होते हुए भी लक्ष्मण उसे देखते ही मोहित हो जाते हैं और सोचते हैं कि यह स्त्रीरत्न न मिले तो मेरा राज्य निष्फल और जीवन वृथा है। वे नारद से कहते हैं कि आपने मेरे गुण गाए और उन पापी, प्रचंड, मानी, क्षुद्र दुष्टों ने आपसे विरोध किया, मैं उनका मान दूर करूँगा और उन्हें आपके चरणों में गिराऊँगा, आप मन शांत करें।
लक्ष्मण विराधित विद्याधर को बुलाकर आज्ञा देते हैं कि हम रत्नपुर के राजा रत्नरथ से युद्ध करने चलेंगे, इसलिए सब विद्याधरों को पत्र लिखकर बुलाओ और सारी सेना तैयार करो। विराधित सबको पत्र भेजता है, सब राजा बड़ी-बड़ी सेनाओं के साथ शीघ्र आ जाते हैं, और राम-लक्ष्मण उनके साथ चलकर जल्दी ही रत्नपुर पहुँच जाते हैं।
रत्नरथ अपनी सारी सेना के साथ युद्ध को निकलता है और चक्र, करोत, कुठार, बाण, खड्ग आदि शस्त्रों से महायुद्ध होता है, जबकि अप्सराएँ आकाश से योद्धाओं पर पुष्पवृष्टि करती हैं। शत्रुसेना रूपी समुद्र को सुखाने के लिए बड़वानल के समान लक्ष्मण स्वयं युद्ध करते हैं, बलभद्र राम, सुग्रीव, हनुमान आदि भी रथों, घोड़ों और हाथियों पर चढ़कर लड़ते हैं, और विद्याधरों की सेना ऐसे भागती है जैसे वायु से बादल।
रत्नरथ और उसके पुत्रों को भागते देख नारद परम हर्षित होकर ताली बजा-बजाकर हँसते हैं और कहते हैं कि अरे रत्नरथ के पुत्रो, तुम लक्ष्मण के गुणों का वर्णन तो सह न सके, अब अपमानित होकर क्यों भागते हो, पर वे कोई उत्तर नहीं देते। उसी समय राजकुमारी मनोरमा अनेक सहेलियों के साथ रथ पर बैठकर महाप्रेम से लक्ष्मण के पास आती है, जैसे इन्द्राणी इन्द्र के पास आती है, और उसे देखकर लक्ष्मण शांत हो जाते हैं और उनका मन प्रसन्न हो जाता है।
देश-काल की मर्यादा जानने वाला राजा रत्नरथ राम-लक्ष्मण को महाशक्तिशाली देखकर मान छोड़ता है और पुत्रों सहित अनेक भेंटें लेकर उनके पास आता है। सबके बीच नारद उससे कहते हैं कि अब तेरी क्या शक्ति है, तू रत्नरथ है या रजरथ, और ताली बजाकर पुत्रों से हँसकर पूछते हैं कि जिन वासुदेव-बलभद्र को तुमने घर में क्रोध से जो मन में आया कहा, अब उन्हीं के चरणों में क्यों नमस्कार करते हो; पुत्र कहते हैं कि हे नारद ऋषि, आपका क्रोध भी हमारे लिए सुखदायी हुआ, क्योंकि उसके बिना ऐसे महापुरुषों का दुर्लभ समागम हमें कैसे मिलता।
कुछ समय प्रसन्नता से चर्चा करने के बाद सब मिलकर नगर में जाते हैं; रति समान महारूपवती श्रीदामा का विवाह श्री रामचन्द्र से होता है, और नाम के अनुरूप साक्षात मनोरमा का विवाह लक्ष्मण से होता है। पर्व की सीख है कि ऐसी अद्भुत अनुपम वस्तुएँ महापुण्य से मिलती हैं, और क्रोध छोड़कर दयाधर्म का पालन ही मानव जीवन का सबसे श्रेष्ठ आभूषण है: जिसने व्रत, संयम, तप, दान, पूजा सब किए पर जीवों की रक्षा नहीं की उसने कुछ नहीं किया, क्योंकि जीवों की रक्षा से ही अपने जीवन की रक्षा होती है।