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पर्व 92

सप्तर्षियों के प्रभाव से मथुरा का उपसर्ग दूर होना

सात चारण ऋषि मथुरा के वन में चातुर्मास करते हैं और उनके तप से चमरेन्द्र की फैलाई मरी दूर हो जाती है; उनका अनादर करने वाला सेठ पश्चाताप करता है, और उनके उपदेश से शत्रुघ्न नगर को जिनप्रतिमाओं से भर देते हैं।

कथा खंड राज्य, मथुरा और सीता का परित्याग

सारांश

राजा श्रीनंदन के सात पुत्र, जो अब आकाशगामी ऋद्धि वाले महामुनि हैं, मथुरा के वन में बड़ के वृक्ष के नीचे चातुर्मास करते हैं और उनके तप से चमरेन्द्र की मरी तुरंत दूर हो जाती है। जब वे आहार के लिए अयोध्या आते हैं तो अर्हदत्त सेठ उन्हें मर्यादा तोड़ने वाले समझकर आहार का काम पुत्रवधू पर छोड़ बाहर चला जाता है, फिर द्युतिभट्टारक मुनि से उनकी महिमा जानकर पश्चाताप करता हुआ उनकी पूजा करने मथुरा जाता है। शत्रुघ्न और माता सुप्रभा उनसे श्रावक और मुनि के व्रतों का उपदेश और आने वाले कलिकाल की भविष्यवाणी सुनते हैं, और उनकी सलाह पर शत्रुघ्न घर-घर जिनप्रतिमाएँ विराजमान कराते हैं, जिसके बाद राम के राज्य में मथुरा आरोग्य और समृद्धि से भर जाती है।

क्या हुआ

12 बिंदु

  1. आकाशगामी चारण ऋद्धि के धारी, सूर्य समान तेजस्वी सात निर्ग्रंथ मुनि विहार करते हुए मथुरा आते हैं: सुरमन्यु, स्वरमन्यु, श्रीनिचय, सर्वसुन्दर, जयवान, विनयलालस और जयमित्र। ये राजा श्रीनंदन और रानी धारणी के पुत्र थे, जिन्होंने प्रीतिकर स्वामी को केवलज्ञान होते देख वैराग्य पाया और पिता सहित उन्हीं केवली के पास मुनि दीक्षा ली, तथा एक महीने के बालक डमर को राज्य सौंप दिया।

  2. पिता श्रीनंदन मुनि को केवलज्ञान प्राप्त हुआ, और सातों पुत्र चारण आदि अनेक ऋद्धियों के धारक महामुनि और श्रुतकेवली हुए। चातुर्मास के समय वे मथुरा के वन में बड़ के वृक्ष के नीचे विराजते हैं, और उनके तप के प्रभाव से चमरेन्द्र की फैलाई मरी ऐसे भाग जाती है जैसे ससुर को देखकर व्यभिचारिणी बहू; नगर के सब लोग निरोगी हो जाते हैं, बिना बोए ही अनाज उगता है, और मथुरा ऐसे प्रसन्न होती है जैसे नई वधू पति को देखकर।

  3. वे मुनि रस-परित्याग और दो दिन, तीन दिन, पक्ष और मास के उपवास आदि तप करते हैं। चातुर्मास में एक स्थान पर रहने का नियम होते हुए भी चारण ऋद्धि के प्रभाव से वे निमिष मात्र में आकाशमार्ग से पोदनपुर, विजयपुर आदि नगरों में उत्तम श्रावकों के घर करपात्र में आहार कर लौट आते हैं, क्योंकि ग्रंथ के अनुसार संयम की साधना शरीर के निमित्त से होती है, इसलिए साधु और आर्यिकाएँ आहार लेते हैं।

  4. एक दिन चार हाथ आगे की भूमि देखते हुए ईर्या समिति से चलते वे ऋषि आहार के समय अयोध्या में अर्हदत्त सेठ के घर आते हैं। सेठ सोचता है कि वर्षाकाल में मुनि विहार नहीं करते, अयोध्या और आसपास गुफाओं, नदी-तटों, वृक्षों के नीचे, वन के चैत्यालयों और पर्वतों पर चातुर्मास करने वाले सब साधुओं की वह वंदना कर चुका है, और ये अनदेखे मुनि आचारांग की आज्ञा और आचार्यों की आम्नाय से विमुख होकर मनमाना विचरने वाले हैं। ऐसा अज्ञान से सोचकर वह बाहर चला जाता है, और उसकी पुत्रवधू नवधा भक्ति से मुनियों को शुद्ध प्रासुक आहार देती है।

  5. आहार के बाद सातों ऋषि भगवान के चैत्यालय में आते हैं, जहाँ द्युतिभट्टारक मुनिराज विराजमान थे; ऋद्धि के प्रभाव से वे धरती से चार अंगुल ऊपर अछूते चलते आते हैं, पर चैत्यालय के भीतर धरती पर पैर रखकर आते हैं। द्युतिभट्टारक आचार्य खड़े होकर विनयपूर्वक उन्हें नमस्कार करते हैं, उनके सब शिष्य भी वंदना करते हैं, और परस्पर धर्मचर्चा के बाद सप्तर्षि जिनवंदना कर आकाशमार्ग से मथुरा लौट जाते हैं।

  6. बाद में जब अर्हदत्त चैत्यालय आता है, तो द्युतिभट्टारक आचार्य पूछते हैं कि क्या तुमने भी उन सप्त महाऋषियों की वंदना की, जो मथुरा के वन में चातुर्मास करते हैं, इच्छानुसार कहीं भी आहार के लिए जाते हैं, आज अयोध्या में आहार लेकर आए थे और पापों के नाशक व पूज्य हैं। पश्चाताप से व्याकुल सेठ स्वयं को धिक्कारता है कि मैं सम्यग्दर्शन से रहित मिथ्यादृष्टि हूँ, मेरे हाथ में आया पुण्यरूपी अमूल्य रत्न अज्ञान से खो गया, जो श्रावक साधु को देखकर सम्मान, वंदना और भक्तिपूर्वक आहार नहीं कराता वह महामिथ्यादृष्टि है, और निश्चय करता है कि जब तक उन यतियों के दर्शन नहीं करूँगा, मन को शांति नहीं मिलेगी।

  7. ग्रंथ बताता है कि आगम के अनुसार चारण मुनि चातुर्मास तो एक स्थान पर करते हैं, पर आहार अलग-अलग नगरों में ले सकते हैं, और चारण ऋद्धि के प्रभाव से उनके शरीर से किसी जीव को बाधा नहीं होती। कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा निकट जानकर राजा समान वैभव वाला सम्यग्दृष्टि श्रावक अर्हदत्त बार-बार अपनी निंदा करता हुआ परिवार, रथ, हाथी, घोड़ों और बड़ी सेना के साथ अयोध्या से मथुरा चलता है, कार्तिक शुक्ल सप्तमी को ऋषियों के चरणों में पहुँचता है, विधिपूर्वक वंदना-पूजा करता है और मथुरा को ऐसा सजवाता है कि वह स्वर्ग जैसी सुंदर लगती है।

  8. यह समाचार सुनकर शत्रुघ्न शीघ्र घोड़े पर चढ़कर सप्तर्षियों के पास आते हैं और माता सुप्रभा भी मुनिभक्ति के लिए उनके पीछे आती हैं; शत्रुघ्न नमस्कार कर धर्मोपदेश सुनते हैं कि संसार असार है और वीतराग भगवान का मार्ग ही सार है। मुनि बताते हैं कि श्रावक के बारह व्रत होते हैं, पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत, और साधु के अट्ठाईस मूलगुण होते हैं, पाँच महाव्रत, पाँच समिति, पाँच इन्द्रिय-निरोध, छह आवश्यक और सात शेष गुण, तथा मुनि तप की वृद्धि के लिए दिन में सूर्य के प्रकाश में एक बार शुद्ध प्रासुक आहार लेते हैं, शरीर की पुष्टि के लिए नहीं।

  9. शत्रुघ्न प्रार्थना करते हैं कि आपके आने से मथुरा की मरी, रोग, दुर्भिक्ष और सब उपद्रव शांत हुए हैं, इसलिए कुछ दिन और यहीं विराजें। मुनि कहते हैं कि जिनेन्द्र की आज्ञा से अधिक रहना उचित नहीं, और भविष्य बताते हैं: मुनिसुव्रतनाथ मोक्ष जा चुके, अब नमि, नेमि, पार्श्व और महावीर ये चार तीर्थंकर होंगे, फिर दुःषमा नामक पंचम काल में धर्म घटता जाएगा, पाखंडी हिंसा का मार्ग फैलाएँगे, राजा लुटेरे होंगे, पुत्र माता-पिता की आज्ञा नहीं मानेंगे, चारण मुनियों, देवों और विद्याधरों का आना-जाना बंद हो जाएगा, और अज्ञानी लोग नग्न दिगम्बर मुनियों की निंदा करेंगे तथा विषयभोगियों की भक्ति करेंगे।

  10. वे चेताते हैं कि कुशील भोगी पुरुषों को भक्ति से दिया भोजन वैसे ही निष्फल है जैसे पर्वत पर बोया बीज, और जो मुनियों की निंदा कर मिथ्या साधुओं की पूजा करते हैं वे चंदन का वृक्ष छोड़कर काँटे का वृक्ष अपनाते हैं और नरक-निगोद के पात्र होते हैं। वे शत्रुघ्न को उपदेश देते हैं कि गृहस्थ के लिए सबसे श्रेष्ठ दान और पूजा करते हुए जीवन सफल करो, और मथुरा में घर-घर जिनप्रतिमा विराजमान कर नित्य अभिषेक-पूजा कराओ: जिस घर में अंगूठे भर की भी जिनप्रतिमा हो और प्रतिदिन अभिषेक, शांतिधारा और पूजन हो, वहाँ से मरी जैसे असाध्य रोग ऐसे भाग जाते हैं जैसे गरुड़ के भय से नागिन, और जहाँ पूजा और दान नहीं होते उन्हें रोग वैसे ही खा जाते हैं जैसे सिंह मृग को। शत्रुघ्न विनय से वचन देते हैं कि उनकी सारी प्रजा सदा ऐसे ही धर्म में लगी रहेगी।

  11. इसके बाद चारण ऋषि आकाशमार्ग से विहार कर अनेक निर्वाण क्षेत्रों की वंदना करते हुए सीता के घर आहार के लिए आते हैं, और सीता महाहर्ष से श्रद्धा आदि गुणों सहित नवधा भक्ति से उन्हें शुद्ध आहार देकर पारणा कराती हैं। शत्रुघ्न मथुरा के भीतर और बाहर कैलाश के तट समान अनेक जिनमंदिर बनवाते हैं और घर-घर जिनप्रतिमाएँ विराजमान कराते हैं; नगर रोग-उपद्रव से मुक्त होता है, वन-उपवन फल-फूलों से लद जाते हैं, बावड़ियों और सरोवरों में कमल खिलते हैं और मंदिरों के शिखर जितने ऊँचे अनाज के ढेर लग जाते हैं।

  12. राम के राज्य में सारी प्रजा रत्न-स्वर्ण से भरी पृथ्वी पर देवों के समान धर्म, अर्थ और काम में तत्पर होकर सुख से रहती है, और शत्रुघ्न राम के प्रताप से अनेक राजाओं पर आज्ञा चलाते हुए मथुरा में सुख से राज्य करते हैं, जैसे देवों में वरुण शोभित होता है। पर्व कहता है कि जो इस अध्याय को पढ़ता या सुनता है वह शुभ नाम, शुभ गोत्र, साता वेदनीय और शुभ आयु का बंध करता है, और गुरुभक्ति ही मोक्षसुख का साधन है।