पर्व 6
वानरवंशियों की उत्पत्ति
विद्याधर राजकुमार श्रीकंठ वानरद्वीप में किष्कुपुर बसाते हैं और उनके वंशज वानर-चिह्न अपनाकर वानरवंशी कहलाते हैं।
कथा खंड राक्षस, वानर और रावण का उदयसारांश
गौतम स्वामी अब वानरवंश की उत्पत्ति कहते हैं। विद्याधर राजकुमार श्रीकंठ पद्माभा को ले जाकर अपने बहनोई लंका के राजा कीर्तिधवल की शरण पाते हैं, उनसे वानरद्वीप पाकर किष्कुपुर बसाते हैं और वहाँ के बंदरों से प्रीति करते हैं; उनके वंशज अमरप्रभ वानर को राजचिह्न बनाते हैं, जिससे यह कुल वानरवंश कहलाया। आगे महोदधि और विद्युत्केश से चली वानर और राक्षस राजाओं की मित्रता, अशनिवेग से युद्ध जिसमें अंध्रक मारे गए, पाताल लंका में शरण और माली द्वारा लंका की पुनः प्राप्ति का वर्णन है।
क्या हुआ
22 बिंदु
राजा श्रेणिक को राक्षसवंश और विद्याधरवंश का वृत्तांत सुनाकर गौतम स्वामी अब वानरवंश का कथन आरंभ करते हैं। विजयार्ध पर्वत की दक्षिण श्रेणी के मेघपुर नगर में विद्याधर राजा अतींद्र और रानी श्रीमती के शास्त्रों में पारंगत पुत्र श्रीकंठ ने अपनी सुंदर छोटी बहन देवी को रत्नपुर के राजा पुष्पोत्तर के पुत्र पद्मोत्तर को न देकर लंका के स्वामी कीर्तिधवल को देना चाहा, जिससे पुष्पोत्तर अत्यंत क्रुद्ध हुए।
सुमेरु पर्वत के चैत्यालयों की वंदना कर विमान से लौटते हुए श्रीकंठ ने पुष्पोत्तर की पुत्री पद्माभा का मधुर भक्ति-संगीत सुना और उसे गुरु के पास वीणा बजाते देखा; दोनों परस्पर मोहित हुए और श्रीकंठ उसे आकाश मार्ग से ले चले। पुष्पोत्तर मायामयी घोड़ों, हाथियों, सिंहों और बड़े विमानों वाली विद्याधर सेना लेकर पीछे आए, तब श्रीकंठ अपने बहनोई लंका के राजा कीर्तिधवल की शरण गए, जिन्होंने उन्हें गले लगाया और युद्ध का भार स्वयं लिया।
कीर्तिधवल के दूत ने कहा कि श्रीकंठ निर्मल और समान कुल का, धनवान, विनयवान और सुंदर है, और बेटियाँ तो पराए घर की ही होती हैं; उसी समय पद्माभा की सखी उसका संदेश लाई कि श्रीकंठ का रंचमात्र दोष नहीं और कुलीन कन्या का एक ही पति होता है, अतः उसने अन्य सब पुरुषों का त्याग किया है। पुत्री ने स्वयं वर चुना है, यह जानकर पुष्पोत्तर युद्ध छोड़कर लौट गए और मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा को श्रीकंठ और पद्माभा का विवाह हुआ।
विजयार्ध पर श्रीकंठ के बहुत शत्रु होने से कीर्तिधवल ने उन्हें यहीं समुद्र के किसी द्वीप में बसने का आग्रह किया। मंत्री आनंद ने संध्याकार, सुबेल, कांचन, हरिपुर, हंसद्वीप, रत्नद्वीप, तोयावली, क्षेम आदि मनोहर स्थान गिनाए और उत्तर भाग में तीन सौ योजन समुद्र के मध्य स्थित प्रसिद्ध वानरद्वीप की प्रशंसा की, जहाँ बिना बोए अनाज उपजता है और गन्ने के खेतों के बीच रत्न और स्वर्ण की शिलाओं वाला किष्कु पर्वत है।
कीर्तिधवल ने वानरद्वीप श्रीकंठ को दे दिया और चैत्र मास के प्रथम दिन वे परिवार सहित वहाँ पहुँचे, जो छुहारे, चंदन, अनार, इलायची, लौंग, बादाम, अखरोट, नारियल आदि सब प्रकार के मेवों और फलों के वृक्षों से समृद्ध था। मनुष्यों जैसे हाथ-पैर और चेष्टाओं वाले बहुत से बंदरों को देखकर वे चकित हुए; उन्होंने उन्हें पकड़वाकर प्रेम से रखा, मीठा भोजन कराया, नृत्य सिखाया और उनकी रक्षा के लिए लोग नियुक्त किए।
बंदरों को साथ लेकर वे किष्कु पर्वत पर चढ़े और उसकी समतल भूमि पर किष्कुपुर नगर बसाया, जो चौदह योजन लंबा, चौदह योजन चौड़ा और बयालीस योजन से कुछ अधिक परिधि वाला था, मणियों के कोट और रत्नों के द्वारों से शोभित; वहाँ वे रानी पद्माभा सहित सुख से रहे।
अष्टाह्निका पर्व में देवों को नंदीश्वर द्वीप जाते देख वे भी रानी सहित विमान से चले, पर मानुषोत्तर पर्वत के आगे उनका विमान न जा सका, क्योंकि मनुष्य उसे लाँघ नहीं सकते। वहाँ के अकृत्रिम चैत्यालयों की पूजा न कर पाने से दुखी होकर और अगले जन्म में उनके दर्शन योग्य कर्म करने का निश्चय कर उन्होंने पुत्र वज्रकंठ को राज्य दिया और सब परिग्रह त्यागकर मुनि बन गए।
एक वृद्ध पुरुष ने मुनियों से सुना श्रीकंठ का पूर्वभव वज्रकंठ को सुनाया: दो प्रेमी व्यापारी भाइयों को उनकी स्त्रियों ने अलग कर दिया; धनी बड़ा भाई सेठ की संगति से श्रावक हुआ, उसने दरिद्र और कुव्यसनी छोटे भाई को धन देकर व्रत ग्रहण कराए, फिर स्वयं मुनि बनकर समाधिमरण से इन्द्र हुआ, और छोटा भाई शांत परिणामों से मरकर देव तथा फिर श्रीकंठ हुआ। वही इन्द्र स्नेहवश अपनी ऋद्धि दिखाता हुआ नंदीश्वर गया, जिसे देखकर श्रीकंठ को जातिस्मरण और वैराग्य हुआ।
पिता का पूर्वभव सुनकर वज्रकंठ भी इन्द्रायुधप्रभ को राज्य देकर मुनि बने। इसी परंपरा में राजा रविप्रभ के पुत्र अमरप्रभ ने गुणवती से विवाह किया, जो महल की दीवारों पर बने बंदरों के चित्र देखकर डर से काँप उठी; क्रुद्ध राजा के पूछने पर बड़ों ने बताया कि उनके पूर्वज श्रीकंठ ने बंदरों से प्रीति कर उन्हें भोजन कराया और उनके चित्र बनवाए, और बाद के राजा मांगलिक कार्यों में यही परंपरा निभाते आए।
तब प्रसन्न होकर अमरप्रभ ने आज्ञा दी कि ये चित्र भूमि पर न बनें जहाँ मनुष्यों के पैर लगें, वे इन्हें मुकुट में धारण करेंगे, और ध्वजाओं, महलों के शिखरों तथा छत्रों पर वानर-चिह्न बनें; इसी चिह्न के साथ उन्होंने विजयार्ध की दोनों श्रेणियाँ जीतीं, किसी का धन नहीं लिया और सब विद्याधरों के अधिपति होकर किष्कुपुर से बहुत काल राज्य किया। वे भगवान वासुपूज्य के समय हुए, और तभी से छत्र-ध्वजाओं पर वानर-चिह्न रखने वाले ये विद्याधर वानरवंशी कहलाए।
अमरप्रभ के पुत्र कपिकेतु (रानी श्रीप्रभा) से यह परंपरा विक्रमसंपन्न, प्रतिबल, गगनानंद, खेचरानंद और गिरिनंद तक चली, और आगे अनेक राजा राज्य त्यागकर स्वर्ग या मोक्ष गए। मुनिसुव्रतनाथ के समय वानरवंश में राजा महोदधि हुए, जिनकी सैकड़ों रानियों में शिरोमणि विद्युत्प्रकाशा थी और एक सौ आठ पुत्र थे; लंका के राजा विद्युत्केश से उनकी ऐसी प्रीति थी मानो शरीर दो हों और मन एक।
लंका के प्रमद उद्यान में क्रीड़ा करते समय एक बंदर ने विद्युत्केश की रानी श्रीचंद्रा के वक्ष को नखों से नोच डाला, तब राजा ने अज्ञानवश उस पर बाण चलाया। घायल बंदर एक गगनचारी मुनि के चरणों में गिरा, मुनि ने उसे पंच णमोकार मंत्र सुनाया और वह मरकर उदधिकुमार जाति का भवनवासी देव हुआ; अवधिज्ञान से राजा के लोगों को अन्य बंदर मारते जानकर उस देव ने पर्वत और वृक्ष उठाए विकराल मायामयी वानर-सेना रचकर राजा को घेर लिया।
इसे देवमाया जानकर विद्युत्केश ने विनती की और देव के साथ मुनि के पास गया; चार ज्ञान के धारी मुनि ने कहा कि गुरु के निकट रहते शिष्य का उपदेश देना आचार से भ्रष्टता है, और वे उन्हें अपने गुरु के पास ले गए। गुरु ने उपदेश दिया कि धर्म का मूल जीवदया है, श्रावक के व्रत और पाँच महाव्रत, तीन गुप्ति व पाँच समिति रूप मुनिधर्म समझाया तथा तिर्यंच गति और नरकों के भयानक दुखों का वर्णन किया।
फिर गुरु ने पूर्वभव बताए: विद्युत्केश पहले श्रावस्ती के राजा का मंत्री सुयशोदत्त था, जो मुनि बना; काशी के वन में एक पारधी (शिकारी) ने उसे अपशकुन कहकर अपमानित किया, तब एक मुक्के से उसे मार डालने के क्रोध-विचार से उसका आठवें स्वर्ग का पुण्य क्षीण हो गया और वह ज्योतिषी देव होकर फिर विद्युत्केश बना। वह पारधी बहुत काल भटककर वही बंदर हुआ था, अतः गुरु ने बैर छोड़कर मुनिसुव्रतनाथ की शरण लेने का उपदेश दिया।
विद्युत्केश ने पुत्र सुकेश को राज्य देकर मुनि दीक्षा ली और रत्नत्रय की आराधना से उत्तम देव हुए। यह सुनकर महोदधि भी विरक्त हुए; युवराज ने सुकेश के राज्य की रक्षा के लिए रुकने की विनती की, मंत्री और रानियाँ रोईं, फिर भी उन्होंने पुत्र प्रतिचंद्र को राज्य देकर दिगंबर दीक्षा ली और सिद्धपद पाया; प्रतिचंद्र ने भी पुत्र किष्किंध को राज्य और छोटे पुत्र अंध्रक को युवराज पद देकर शुक्लध्यान से सिद्धपद पाया।
आदित्यपुर के राजा विद्यामंदिर और रानी वेगवती की पुत्री श्रीमाला के स्वयंवर में धाय सुमंगला ने मार्तंडकुंडल, रत्नपुर के विद्यासमुद्घात, वज्रपंजर के खेचरभानु, चंद्रपुर के चंद्रानन, पुरंदर, महाबल आदि अनेक विद्याधर दिखाए, पर श्रीमाला ने किष्किंध के गले में वरमाला डाली। रथनूपुर के महापराक्रमी अशनिवेग के पुत्र विजयसिंह ने दोनों भाइयों को लाल मुख वाले बंदर कहकर अपमानित किया कि विद्याधरों के समाज में उनका क्या काम, तब महायुद्ध हुआ और लंका के राजा सुकेश अपने मित्रों की सहायता को आए।
युद्ध में किष्किंध कन्या को ले गए और अंध्रक ने तलवार से विजयसिंह का सिर काट दिया। पुत्र-शोक से क्रुद्ध अशनिवेग ने किष्कुपुर को घेर लिया और रण में अंध्रक को मार गिराया; किष्किंध ने अशनिवेग के पुत्र विद्युद्वाहन पर शिला चलाई, पर उसी शिला के लौटे प्रहार से मूर्छित हुए, तब सुकेश उन्हें सचेत कर नगर ले आए और वे भाई के वियोग में विलाप करने लगे कि मानो उनकी दाहिनी भुजा कट गई।
सुकेश ने समझाया कि शोक महापिशाच है और प्रबल शत्रु से बचने के लिए पूर्वजों द्वारा प्रशंसित गुप्त स्थान पाताल लंका चलना चाहिए; किष्किंध का शोक रानी श्रीमाला को देखकर ही दूर हुआ। अशनिवेग ने पीछा करने को उद्यत विद्युद्वाहन को रोका कि अंध्रक को मारकर विजयसिंह का बदला ले लिया गया है; बाद में आकाश में बादलों को विलीन होते देख वे विरक्त हुए और पुत्र सहस्रार को राज्य देकर विद्युद्वाहन सहित मुनि बने, तथा उनके द्वारा लंका में रखा गया विद्याधर निर्घात सहस्रार की आज्ञा से वहाँ रहा और राक्षसों को छिपा देखकर निर्भय हो गया।
रानी श्रीमाला सहित सुमेरु की वंदना से लौटते हुए किष्किंध दक्षिण समुद्र के तट पर देवकुरु भोगभूमि जैसे कर्णतट वन पर मोहित हुए, जहाँ भूमिगोचरी नहीं आते थे; गहरी पाताल लंका में उनका मन खिन्न रहता था, इसलिए उन्होंने वहाँ के पर्वत पर स्वर्ग-समान किष्किंधपुर नगर बसाया। सम्यग्दृष्टि और जिनपूजा में तत्पर किष्किंध के रानी श्रीमाला से सूर्यरज और ऋक्षरज दो पुत्र तथा सूर्यकमला पुत्री हुई, जिसका विवाह मेघपुर के राजा मेरु के पुत्र मृगारिदमन से हुआ; लौटते समय उसने कर्ण पर्वत पर कर्णकुंडल नगर बसाया।
पाताल लंका में राजा सुकेश और रानी इंद्राणी के तीन पुत्र माली, सुमाली और माल्यवान हुए, जिन्होंने युवावस्था में सब विद्याएँ सिद्ध कीं। दक्षिण समुद्र की ओर न जाने का कारण हठपूर्वक पूछने पर सुकेश ने बताया कि दूसरे तीर्थंकर अजितनाथ के समय से लंका उनके कुल की है, पर अशनिवेग से युद्ध में हाथ से निकल गई और वहाँ उसने क्रूर, बलवान निर्घात को रख दिया है; यह सुनकर माली की आँखों में आँसू आए, उन्होंने पिता को बात छिपाने का उलाहना दिया और लंका लेकर ही रहने की प्रतिज्ञा की।
समस्त राक्षस-सेना के साथ वे त्रिकूटाचल की ओर चले, जिसके नीचे लंका बसी है, और मार्ग में निर्घात के कुटुंबी दैत्य विद्याधरों को हराया, जिनमें कई मारे गए, कई चरणों में गिरे और कई भाग गए। सामान्य लोगों को मारने के बजाय माली ने निर्घात को ढूँढा, तीखे बाणों से उसे रथ से गिराया और खड्ग से मार डाला; उसके वंश के लोग विजयार्ध भाग गए और तीनों भाइयों ने लंका में प्रवेश कर माता-पिता और समस्त परिवार को वहीं बुला लिया।
माली ने हेमपुर के राजा मेघ और रानी भोगवती की पुत्री चंद्रवती से, सुमाली ने प्रीतिकूट नगर के राजा प्रीतिकांत और रानी प्रीतिमती की पुत्री प्रीतिसंज्ञका से, और माल्यवान ने कनककांत नगर के राजा कनक और रानी कनकश्री की पुत्री कनकावली से विवाह किया; हज़ार से अधिक रानियों में ये पटरानियाँ हुईं। माली ने अपने पराक्रम से विजयार्ध की दोनों श्रेणियाँ वश में कीं, और कुछ समय बाद सुकेश माली को तथा किष्किंध सूर्यरज को राज्य देकर मुनि बने और ये दोनों परम मित्र सिद्धपद को प्राप्त हुए।