पर्व 72
रावण का युद्ध के लिये पुनः संकल्प
सीता के पति-प्रेम से द्रवित होकर रावण क्षण भर पछताता है, पर अभिमान जीत जाता है और वह राम-लक्ष्मण को जीवित पकड़ने तथा उनके साथियों को कुचलने का संकल्प करता है।
कथा खंड लंका का युद्धसारांश
रावण की अठारह हजार रानियाँ अंगद के उपद्रव की शिकायत करती हैं और रावण बदला लेने की प्रतिज्ञा करता है; फिर वह स्नान, पूजा और भोजन कर बहुरूपिणी विद्या की परीक्षा लेता है, जिससे धरती काँप उठती है। वह अपनी नई शक्ति का बखान करने सीता के पास जाता है, पर राम को मारने से पहले उनका संदेश पहुँचाने की प्रार्थना करते हुए सीता का मूर्च्छित होना उसका हृदय पिघला देता है और वह सीता-हरण तथा विभीषण से वैर पर पछताता है। फिर भी सीता लौटाने में अपनी हीनता मानकर वह राम-लक्ष्मण को शस्त्ररहित कर जीवित पकड़ने तथा सुग्रीव, अंगद, भामंडल और हनुमान को भयानक मृत्यु देने का निश्चय करता है, और अपनी मृत्यु के सूचक अपशकुनों की उपेक्षा करता है।
क्या हुआ
8 बिंदु
रावण की अठारह हजार रानियाँ एक साथ रोती हुई आकर कहती हैं कि आपके ध्यानमग्न रहते आपके सामने ही सुग्रीव के पापी पुत्र मूर्ख अंगद ने हमारा अपमान किया। रावण सबको संतोष देकर कहता है कि मैं उस पापी को मारूँगा, प्रातःकाल ही सुग्रीव को मस्तकरहित कर भूमि पर डालूँगा, भूमिगोचरी राम-लक्ष्मण तो कीड़े समान हैं, उनके पास इकट्ठे हुए दुष्ट विद्याधरों का मैं क्षय करूँगा, और अब बहुरूपिणी विद्या सिद्ध हो गई है, शत्रु मेरे आगे कैसे टिकेंगे।
रावण बाजों, गीतों और नृत्य के बीच मंदिर से बाहर आता है, और स्त्रियाँ स्वर्ण, रत्न, गजमोती, स्फटिक और केले के पत्तों से ढके नीलमणि के कलशों से तथा सुगंधित पदार्थों से उसका अभिषेक करती हैं। आभूषण पहनकर वह फिर शांतिनाथ भगवान की पूजा करता है, भोजनशाला में खाद्य, स्वाद्य, लेह्य और पेय चारों प्रकार का उत्तम भोजन करता है, फिर विद्या की परीक्षा के लिए क्रीड़ाभूमि में जाकर विद्याधरों से भी न बन सकें ऐसे अद्भुत रूप बनाता है और मुक्कों से भूकंप करता है, जिससे राम के कटक के कपिवंशियों को मृत्यु का भय होता है।
मंत्री कहते हैं कि आपको छोड़ रघुनाथ को जीतने वाला अन्य कोई नहीं, उनके सम्मुख रण में आप ही जाना। बहुरूपिणी विद्या से मायामयी सेना बनाकर रावण मंत्रियों सहित पुष्पक विमान से उतरकर उस उद्यान में आता है जहाँ सीता बैठी हैं, और विद्याधरी दासियाँ सीता से कहती हैं कि जैसे गर्मी में तपा गजेन्द्र सरोवर की ओर आता है वैसे ही कामाग्नि से तप्त रावण आ रहा है।
बहुरूपिणी विद्या से युक्त रावण को देख सीता भयभीत होकर मन में प्रार्थना करती हैं कि मैं अपने स्वामी राम, देवर लक्ष्मण, भाई भामंडल, पति के हितैषी हनुमान या सेना में किसी के भी मरने का समाचार न सुनूँ। रावण कहता है कि मैंने कपट से तेरा हरण किया, यह क्षत्रियकुल को शोभा नहीं देता, पर मोहकर्म महाबलवान है; मैंने अनंतवीर्य स्वामी के समीप व्रत लिया था कि जो परनारी मुझे न चाहे उसे बलपूर्वक ग्रहण नहीं करूँगा, चाहे उर्वशी या रंभा ही क्यों न हो, इसलिए मैंने केवल तेरी कृपा चाही; अब मेरे बाणों से राम-लक्ष्मण को मरा ही जान, और मेरे साथ पुष्पक में बैठकर सुमेरु, पंचमेरु के चैत्यालय, वन, नदी और सरोवर देखती हुई विहार कर।
कानों पर हाथ रखकर सीता गद्गद वाणी से कहती हैं, ‘हे दशानन! तुम बड़े कुल में उत्पन्न हुए हो, मेरा एक काम करना: यदि संग्राम में मेरे स्वामी और तुम्हारे बीच शस्त्र-प्रहार हो, तो यह संदेश कहे बिना मेरे प्राणनाथ को मत मारना कि हे पद्मनाभ! भामंडल की बहन ने कहा है कि आपके वियोग के शोक से मेरे प्राण आपके प्राणों तक ही हैं, मेरी दशा पवन में दीपक की लौ जैसी है; हे राजा दशरथ के पुत्र! जनक की पुत्री बार-बार कहती है कि आपके दर्शन की अभिलाषा से ही ये प्राण टिके हैं।’ यह कहते हुए वे मूर्च्छित होकर गिर पड़ती हैं।
महासती सीता की यह दशा देख रावण का मन कोमल हो जाता है: वह सोचता है कि राम और सीता का स्नेह निःसंदेह अटूट है, धिक्कार है मुझे जिसने ऐसे स्नेही युगल का वियोग कराया और चंद्रमा समान निर्मल अपने गोत्र को कलंकित किया, ऐसा काम मेरे वंश में किसी ने नहीं किया; परस्त्री विष के समान है, और अब सीता मुझे विष के कुंभ और जीर्ण तृण समान दिखती है, वह केवल राम में तन्मय है। वह याद करता है कि महापंडित भाई विभीषण ने सब जानकर समझाया था, पर उसने उससे द्वेष किया; अब महायुद्ध और अनेक मृत्युओं के बाद मित्रता सुभटों को योग्य नहीं, सीता को लौटाने से लोग उसे असमर्थ जानेंगे, और युद्ध में महाहिंसा है।
वह निश्चय करता है कि सिंहवाहिनी विद्या वाले राम और गरुड़वाहिनी विद्या वाले लक्ष्मण को शस्त्ररहित कर जीवित पकड़ूँगा और फिर बहुत धन दूँगा, जिससे कीर्ति भी होगी और पाप भी नहीं लगेगा। पर अंगद की अनीति याद कर उसके नेत्र लाल हो जाते हैं, ‘वह पापी सुग्रीव नहीं दुर्ग्रीव है, उसे निर्ग्रीव अर्थात मस्तकरहित करूँगा, उसे पुत्र अंगद सहित चंद्रहास खड्ग से दो टुकड़े करूँगा; लोग जिस तमोमंडल को भामंडल कहते हैं उसे दृढ़ बंधनों में बाँधकर लोहे के मुद्गरों से मारूँगा; हनुमान को तीक्ष्ण करोत से चीर डालूँगा; एक राम न्यायमार्गी हैं, उन्हें छोड़ दूँगा, पर पूरी कपिवंशी सेना को शस्त्रों से चूर कर दूँगा।’
उसी समय सैकड़ों उत्पात होते हैं: सूर्य-मंडल आयुध समान तीक्ष्ण दिखता है, पूर्णिमा का चंद्रमा अस्त हो जाता है, आसन पर भूकंप होता है, दिशाएँ काँपती हैं, उल्कापात होते हैं, सियारिनें विरस शब्द करती हैं, घोड़े गर्दन हिलाकर हिनहिनाते हैं, हाथी सूँड धरती पर पटकते हैं, यक्ष-यक्षिणी की मूर्तियों की आँखों से आँसू बहते हैं, सूर्य के सम्मुख कौए कुशब्द करते हैं, सरोवर सूख जाते हैं और रुधिर की वर्षा होती है, जो कुछ ही दिनों में लंकेश्वर की मृत्यु के सूचक हैं। गौतम स्वामी कहते हैं कि पुण्य क्षीण होने पर इन्द्र भी मृत्यु से नहीं बचता; नीतिशास्त्र और व्याकरण का ज्ञाता रावण मान के कारण अविवेकी होकर सोचता है कि कुंभकर्ण, इन्द्रजीत और मेघनाद को छुड़ाकर वानरवंश और भूमिगोचरियों का नाश करूँगा, ताकि तीर्थंकर, चक्रवर्ती, बलभद्र और नारायण हम जैसे विद्याधर कुलों में ही जन्म लें।