पर्व 73
मंदोदरी का युद्ध के लिये मना करना और रावण का हठ न छोड़ना
मंदोदरी रावण से सीता को छोड़ने की विनती करती है और चेताती है कि वह प्रतिनारायण है जिसका पतन निश्चित है, पर रावण नहीं मानता और युद्ध के लिए निकल पड़ता है।
कथा खंड लंका का युद्धसारांश
राजसभा में रावण कुंभकर्ण, इन्द्रजीत और मेघनाद की अनुपस्थिति से दुखी होता है और अनेक अपशकुनों के बीच आयुधशाला में जाता है। भयभीत मंत्रियों के कहने पर मंदोदरी उससे बहुत विनती करती है, मनचाहा रूप धारण करने, सीता को लौटाकर भाई और पुत्रों को वापस लाने का प्रस्ताव रखती है, और चेताती है कि राम-लक्ष्मण बलभद्र-नारायण हैं और वह प्रतिनारायण है, जिसे ऐसे वीर सदा मारते आए हैं। रावण नामों को निरर्थक कहकर टाल देता है, रात रानियों के साथ बिताता है, और प्रातः मारीच तथा हजारों राजाओं के साथ युद्ध के लिए निकल पड़ता है, जबकि लंका की स्त्रियाँ विलाप करती हैं।
क्या हुआ
10 बिंदु
दूसरे दिन प्रातः रावण कुबेर, वरुण, ईशान, यम और सोम समान बड़े राजाओं के बीच इन्द्र की तरह सिंहासन पर बैठता है, पर कुंभकर्ण, इन्द्रजीत और मेघनाद को न देखकर सोचता है कि उनके बिना सभा की शोभा नहीं, जैसे कुमुद तो बहुत हों पर कमल न हों, और चिंता से उसका मुख मुरझा जाता है। उसका भयंकर रूप देख राजा मय, उग्र, शुक, लोकाक्ष, सारण आदि मंत्री नीचे देखते हुए विनती करते हैं, और कैलाश-शिखर जैसे महलों से मंदोदरी और रानियाँ देखती रहती हैं कि रावण दिव्य शस्त्रों, अमोघ बाणों और चक्र आदि से भरी आयुधशाला में जाता है।
अनेक अपशकुन होते हैं: पहले छींक होती है, और दसों दिशाओं की छींक का फल बताया गया है (पूर्व में मृत्यु, आग्नेय में शोक, दक्षिण में हानि, नैऋत्य में शुभ, पश्चिम में मिष्ठ भोजन, वायव्य में सर्व सम्पदा, उत्तर में कलह, ईशान में धन-प्राप्ति, आकाश में सर्वसंहार और पाताल में सर्वसम्पदा), और रावण को मृत्यु की छींक होती है। आगे मार्ग रोके महाभयंकर नाग दिखता है, हा, ही, धिक् के शब्द सुनाई देते हैं, हवा से छत्र का वैडूर्य का डंडा टूट जाता है, उत्तरासन गिर जाता है और दाहिनी ओर कौआ बोलता है, जिससे शकुनशास्त्र के ज्ञाता अत्यंत व्याकुल होते हैं।
मंदोदरी शुक, सारण आदि बड़े मंत्रियों को बुलाकर कहती है कि तुम स्वामी को कल्याण की बात क्यों नहीं कहते, राम ने कुंभकर्ण, इन्द्रजीत और मेघनाद को बंधन में डाल दिया है और राम-लक्ष्मण लोकपाल समान अद्भुत कार्य करने वाले हैं। मंत्री कहते हैं कि यमराज समान क्रूर, महामानी रावण किसी की बात नहीं मानता, जैसी होनहार होती है वैसी बुद्धि होती है; वह सब न्याय और धर्मशास्त्र जानता है पर मोह से उन्मत्त है, शायद आपकी बात माने, इसलिए आप हित की बात कहो।
सुंदर वस्त्र-आभूषण पहने, छत्र और चँवरों सहित, अनेक दासियों के साथ मंदोदरी इन्द्र के पास इन्द्राणी की तरह रावण के पास जाती है और प्रणाम कर कहती है, ‘हे देव! मुझे पति की भिक्षा दो’; मैं आपके वियोग की नदी में डूब रही हूँ और आपके कुलरूपी कमलों का वन प्रलय को जा रहा है। वह कहती है कि अभी कुछ नहीं बिगड़ा, भाई और पुत्रों को बुला लो, इन्द्रियरूपी घोड़ों को विवेक की लगाम से वश करो, कुएँ में अपनी छाया देख कूदने वाले अष्टापद की तरह दुख में मत गिरो; यह भूमिगोचरी की स्त्री कुलवानों के लिए अग्नि-शिखा समान है, परस्त्री के लिए मरने में यश नहीं और जीतने में भी यश नहीं।
वह कहती है कि एक परस्त्री-त्याग से ही दोनों जन्म सुधरते हैं, चक्रवर्ती का पुत्र भी, जिसके पक्ष में देव हों, परस्त्री के कीचड़ में डूबकर अपयश पाता है, और अर्ककीर्ति, अशनिघोष जैसे महाबलवान भी ऐसे ही मरण को प्राप्त हुए। रावण कहता है, ‘मैं अर्ककीर्ति नहीं जो जयकुमार से हारा, न अशनिघोष जो अमिततेज से हारा, मैं दशमुख हूँ, शत्रुरूपी वृक्षों के लिए दावानल; सीता कदापि नहीं दूँगा; तुझे सीता की रक्षा सौंपी है, उसकी अच्छी तरह रक्षा कर, नहीं कर सकती तो शीघ्र मुझे सौंप दे।’
मंदोदरी कहती है कि यह निर्लज्जता है; सीता में आपने क्या महिमा देखी, वह न इतनी गुणवान है, न ज्ञानवती, न रूपवतियों का तिलक, न कलाओं में प्रवीण, और लक्ष्मी भी मेरे समान नहीं; जैसे बालक वैडूर्यमणि छोड़ काँच चाहे वैसे आप मुझे छोड़ भूमिगोचरी स्त्री चाहते हो; आज्ञा दो तो मैं लक्ष्मी, शची इन्द्राणी या रति का रूप धारण करूँ। रावण लज्जित होकर मुख नीचा कर लेता है और कहता है कि तुम स्वयं महारूपवती और मुझे अतिप्रिय हो; तब हर्षित मंदोदरी कहती है कि आगम में कहा है कि पति प्रमादवश भूले तो स्त्री समझाए, जैसे विष्णुकुमार स्वामी को दूसरों के कहने से विक्रिया ऋद्धि का स्मरण हुआ, और प्रस्ताव रखती है कि मैं जानकी को राम के पास ले जाऊँ और राम को तथा कुंभकर्ण, इन्द्रजीत और मेघनाद को आपके पास ले आऊँ।
रावण क्रोध से कहता है, ‘जाओ-जाओ, शीघ्र वहाँ जाओ जहाँ तेरा मुख न देखूँ; तू अपना पक्ष छोड़ पराए पक्ष की प्रशंसा करती है; इन्द्रजीत-मेघनाद जैसे योद्धाओं की माता, राजा मय की पुत्री, मेरी पटरानी, तुझमें इतनी कायरता कहाँ से आई?’ मंदोदरी कहती है कि गुरुओं के मुख से बलभद्र, नारायण और प्रतिनारायण का जन्म सुनते हैं: पहले बलभद्र विजय, नारायण त्रिपृष्ठ और प्रतिनारायण अश्वग्रीव हुए, इसी तरह अब तक सात बलभद्र-नारायण हो चुके जिन्होंने अपने शत्रु प्रतिनारायण को मारा; अब आपके समय में ये बलभद्र-नारायण हुए हैं और आप प्रतिवासुदेव हो, और जैसे पहले के प्रतिवासुदेव हठ से मारे गए वैसे आप भी मरना चाहते हो।
वह कहती है कि आपने बहुत भोग किए, अब मुनिव्रत या श्रावक के व्रत धारण करो, अणुव्रत रूपी खड्ग, सम्यग्दर्शन रूपी कवच, शील रूपी ध्वजा, बारह भावनाओं और ज्ञान रूपी धनुष से इन्द्रियों को जीतो; या मेरे साथ ढाई द्वीप में विहार करो, हिमवान और सुमेरु के जिनालयों के दर्शन करो, अठारह हजार रानियों के बीच सुमेरु के वनों और गंगा के तट पर क्रीड़ा करो। जैसा राजा वैसी प्रजा, प्रजा के पाप का छठा भाग राजा को लगता है, बाड़ ही खेत खाए तो रक्षा कौन करे; यह कहकर महारानी मंदोदरी हाथ जोड़कर पति के चरणों में गिर पड़ती है।
रावण मंदोदरी को उठाकर कहता है कि संसार में मुझसे बलवान कोई नहीं, तू स्त्री-पर्याय के कारण डरती है; नाम से कुछ सिद्ध नहीं होता, सिद्ध नाम का मनुष्य सिद्ध नहीं हो जाता, रथनूपुर का राजा इन्द्र कहलाता था तो क्या इन्द्र हो गया, वैसे ही ये भी बलभद्र-नारायण नहीं। ऐसा कहकर प्रतिनारायण रावण पटरानी मंदोदरी सहित क्रीड़ाभवन में ऐसे जाता है जैसे इन्द्र इन्द्राणी सहित क्रीड़ागृह में जाए।
रात भर विद्याधर विद्या के बल से मनवांछित क्रीड़ा करते हैं और रावण विक्रिया से अपनी अठारह हजार रानियों को एक साथ संतुष्ट करता है; प्रातः मंदोदरी कहती है कि जैसे बेल बाहुबली के शरीर से लगी रही वैसे मैं आपके साथ रहूँगी, विजयी होकर शीघ्र लौटो तो रत्न-चूर्ण का चौक पूरूँगी, अर्घ देकर विजयमाला पहनाऊँगी और प्रभु की महामह पूजा कराऊँगी। युद्ध के बाजे बजते हैं और मारीच, विमलचंद्र, सुनंद, आनंद आदि हजारों राजा दिव्य रथों पर चढ़कर निकलते हैं, जबकि स्त्रियाँ रोती हैं, छूटा हुआ कवच लेकर पति के पीछे दौड़ती हैं या मूर्च्छित हो जाती हैं; पर्व का उपदेश है कि पूर्वकर्म का जैसा उदय होता है वैसा ही फल मिलता है, और जो जीवमात्र की रक्षा करते हैं वे भयंकर युद्ध में भी नहीं मरते।