पर्व 90
मथुरा के लोगों पर चमरेन्द्रकृत उपसर्ग
मित्र मधु की मृत्यु से क्रुद्ध असुरकुमारों के इन्द्र चमरेन्द्र मथुरा में घोर महामारी फैलाते हैं, और शत्रुघ्न अयोध्या लौट आते हैं, पर उनका मन मथुरा में ही लगा रहता है।
कथा खंड राज्य, मथुरा और सीता का परित्यागसारांश
मधु के त्रिशूलरत्न का रक्षक देव त्रिशूल को उसके दाता चमरेन्द्र के पास ले जाकर मित्र की मृत्यु का समाचार सुनाता है। क्रोध में निकले चमरेन्द्र से गरुडेन्द्र पूछते हैं कि क्या उसने विशल्या की महिमा नहीं सुनी, तो वह उत्तर देता है कि विशल्या की अतुल शक्ति कुमारी अवस्था के ब्रह्मचर्य से थी और लक्ष्मण से विवाह के बाद वह नहीं रही। मथुरा में नए राजा के राज में वैसा ही उत्सव देखकर, मानो मधु कभी था ही नहीं, वह लोगों को कृतघ्न मानता है और ऐसी महामारी फैलाता है कि लोग जहाँ खड़े, बैठे या सोए थे वहीं मर जाते हैं। शत्रुघ्न अयोध्या लौटते हैं, जहाँ राम-लक्ष्मण उनका स्वागत करते हैं और माता सुप्रभा भगवान की महापूजा कराती हैं, फिर भी वे मथुरा के लिए वैसे ही उदास रहते हैं जैसे कभी राम सीता के बिना रहे थे।
क्या हुआ
8 बिंदु
राजा मधु की मृत्यु के बाद त्रिशूलरत्न का अधिष्ठाता देव त्रिशूल लेकर उसके दाता, असुरकुमारों के महाप्रचंड इन्द्र चमरेन्द्र के पास जाता है और मधु के मरण का सारा वृत्तांत सुनाता है। चमरेन्द्र की मधु से गहरी मित्रता थी, इसलिए वह क्रोधित होकर पाताल से निकलता है और मथुरा जाने को तैयार होता है।
उसी समय गरुडेन्द्र उसके पास आकर पूछते हैं कि हे दैत्येन्द्र, आप किस ओर जा रहे हैं। चमरेन्द्र कहता है कि जिसने मेरे मित्र मधु को मारा है उसे कष्ट देने जा रहा हूँ, तब गरुडेन्द्र पूछते हैं कि क्या तुमने विशल्या की महिमा नहीं सुनी?
चमरेन्द्र उत्तर देता है कि विशल्या की वह अद्भुत शक्ति उसकी कुमारी अवस्था में थी; जब तक वासुदेव लक्ष्मण से उसका विवाह नहीं हुआ था, ब्रह्मचर्य के प्रभाव से उसमें अतुल शक्ति थी, पर अब वह विषहीन नागिन के समान है। वह कहता है कि अब विशल्या पतिव्रता तो है, पर ब्रह्मचारिणी नहीं, इसलिए उसमें वह शक्ति नहीं रही।
वह शील की महिमा बताता है कि निरतिचार ब्रह्मचर्य पालने वालों के गुणों की महिमा कही नहीं जा सकती, देव और मनुष्य सब उनकी भक्ति करते हैं, और शीलरूपी खड्ग धारण करने वाले को कोई नहीं जीत सकता। वह मद्य, मांस, मधु, मैथुन और मक्खन को महापाप बताता है जिनके सेवन से आत्मशक्ति नहीं जागती, अखंड ब्रह्मचर्य को मोक्ष का परम कारण कहता है, और फिर गरुडेन्द्र को अपने स्थान लौटने को कहकर स्वयं आगे बढ़ता है।
मथुरा पहुँचकर चमरेन्द्र वहाँ वैसा ही उत्सव देखता है जैसा मधु के समय होता था। वह सोचता है कि ये लोग महादुष्ट और कृतघ्न हैं: देश का स्वामी पुत्र सहित मारा गया और दूसरा राजा आ बैठा, फिर भी जिसकी भुजाओं की छाया में ये बहुत काल सुख से रहे उसकी मृत्यु का इन्हें कोई दुख नहीं, अतः ये महापापी हैं और इनका मुख भी नहीं देखना चाहिए।
महाक्रोध में वह मथुरा के लोगों और देश के नाश का निश्चय कर घोर उपसर्ग करता है और प्रलयकाल की अग्नि के समान अनेक प्रकार के रोग फैलाकर मनुष्यरूपी वन को भस्म करने लगता है। ऐसी मरी फैलती है कि जो जहाँ खड़ा था वहीं खड़ा-खड़ा, जो बैठा था वहीं बैठा-बैठा और जो सोया था वहीं सोया-सोया मर जाता है।
प्रजा को रोगों के उपसर्ग से पीड़ित देखकर और देव के भय से शत्रुघ्न अयोध्या लौट आते हैं। बलभद्र राम और नारायण लक्ष्मण भाई को शूरवीरता से शत्रु को जीतकर आया जानकर अति हर्षित होते हैं, और शत्रुघ्न की माता सुप्रभा भगवान की अद्भुत पूजा कराती हैं तथा दुखी जीवों को दया से और धर्मात्माओं को विनयपूर्वक अनेक प्रकार का दान देती हैं।
रत्न और स्वर्ण के मंदिरों से शोभित अयोध्या देवपुरी के समान है और कामधेनु की तरह सब कामनाएँ पूरी करती है, फिर भी शत्रुघ्न का मन मथुरा में इतना आसक्त है कि उन्हें अयोध्या में कोई अनुराग नहीं होता, और जैसे सीता के बिना राम कुछ दिन उदास रहे थे, वैसे ही वे मथुरा के बिना उदास रहते हैं। पर्व की सीख है कि सुंदर वस्तुओं का संयोग स्वप्न के समान क्षणभंगुर है और जेठ के सूर्य की तरह दाह देता है, इसलिए संसार की वस्तुओं में नहीं, आत्मसुख में राग करना चाहिए।