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पर्व 3

विद्याधर लोक का वर्णन

गौतम स्वामी लोक और कालचक्र का वर्णन करते हैं; ऋषभदेव कर्मभूमि की व्यवस्था कर दीक्षा लेते हैं, और नमि-विनमि को विद्याधरों का लोक प्राप्त होता है।

कथा खंड उद्गम: लोक और वंशों की उत्पत्ति

सारांश

श्रेणिक के प्रश्न पर गौतम स्वामी बताते हैं कि रावण राक्षस नहीं बल्कि विनमि के वंश में जन्मा मनुष्य, विद्याधरों का स्वामी था, और सुग्रीव आदि बंदर नहीं बल्कि विद्याधर राजा थे। पहले वे आधार रखते हैं: लोक और जम्बूद्वीप की रचना, छह कालों वाला कालचक्र, भोगभूमि का सुख और चौदह कुलकर। फिर ऋषभदेव के गर्भ, जन्म और देवों द्वारा अभिषेक, कल्पवृक्षों के नष्ट होने पर प्रजा को कर्मभूमि की आजीविका सिखाने और उनकी दीक्षा का वर्णन है, जिसके बाद धरणेन्द्र नमि-विनमि को विद्याधरों का निवास विजयार्ध पर्वत देता है।

क्या हुआ

17 बिंदु

  1. अगले दिन श्रेणिक हाथी पर चढ़कर समवशरण जाते हैं, भगवान की तीन प्रदक्षिणा देकर गौतम गणधर से निवेदन करते हैं कि लोक में अन्य प्रकार से कही जाने वाली रामकथा के विषय में उनका संदेह दूर करें।

  2. गौतम स्वामी उत्तर देते हैं कि रावण राक्षस नहीं, मनुष्य था; मांसभक्षी नहीं, विद्याधरों का स्वामी था और राजा विनमि के वंश में जन्मा था; सुग्रीव आदि भी बंदर नहीं, बड़े विद्याधर राजा थे; परन्तु जैसे नींव बिना मंदिर नहीं बनता, वैसे पहले क्षेत्र और काल का वर्णन सुनो।

  3. अनन्त अलोकाकाश के बीच तीन वातवलयों से घिरे तीन लोक हैं; असंख्य द्वीप-समुद्रों वाले मध्यलोक में लवणसमुद्र से घिरा एक लाख योजन का जम्बूद्वीप है, जिसके बीच सुमेरु पर्वत है: निन्यानवे हजार योजन ऊँचा, एक हजार योजन नींव, भूमि पर दस हजार और शिखर पर एक हजार योजन चौड़ा, चालीस योजन की चूलिका सहित, जिसके शिखर और सौधर्म स्वर्ग के विमान के बीच केवल एक बाल का अंतर है।

  4. जम्बूद्वीप में देवकुरु-उत्तरकुरु भोगभूमि, छह कुलाचलों से बँटे भरत आदि सात क्षेत्र, जम्बू और शाल्मली वृक्ष, गंगा आदि चौदह महानदियाँ और चौंतीस विजयार्ध पर्वत हैं, जिनमें प्रत्येक पर विद्याधरों की एक सौ दस नगरियाँ और दो गुफाएँ हैं, और पर्वतों व वृक्षों पर भगवान के अकृत्रिम चैत्यालय हैं। जम्बूद्वीप के दक्षिण में राक्षस द्वीप, ऐरावत के उत्तर में गंधर्व द्वीप, पूर्व विदेह के पूर्व में वरुण द्वीप और पश्चिम विदेह के पश्चिम में किन्नर द्वीप है, और इन चारों में जिनमंदिर हैं।

  5. काल अरहट की घड़ी की तरह घूमता है: हर कल्पकाल में अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी होते हैं, जिनमें सुखमा-सुखमा से दुखमा-दुखमा तक छह काल क्रम से और फिर उलटे क्रम से आते हैं; यह परिवर्तन केवल भरत और ऐरावत क्षेत्र में होता है, विदेह में सदा चौथा काल, स्वर्ग और उत्कृष्ट भोगभूमि में सदा पहला काल और नरक में सदा छठा काल रहता है।

  6. पहले काल में मनुष्य तीन कोस ऊँचे और तीन पल्य की आयु वाले होते हैं, स्त्री-पुरुष युगल रूप में साथ जन्मते और साथ मरते हैं और मरकर देवगति पाते हैं; दस प्रकार के कल्पवृक्ष, जो न वनस्पति हैं न देवकृत बल्कि पृथ्वीकाय हैं, सब कुछ देते हैं; नदियों में दूध-घी बहता है, सिंह भी हिंसा नहीं करते, और ज्योतिरांग कल्पवृक्षों के प्रकाश से चन्द्र-सूर्य दिखाई नहीं देते।

  7. भोगभूमि में जन्म का कारण पूछने पर गौतम स्वामी कहते हैं कि सरल परिणामी जो मनुष्य साधुओं को आहारदान देते हैं, वे वहाँ जन्म लेते हैं, जैसे अच्छे खेत में बोया बीज अनंत गुना फलता है; भोगों की तृष्णा से कुदान करने वाले कुभोगभूमि में कुमानुष या तिर्यंच होते हैं; वे आहार, औषध, ज्ञान और अभय, ये चार दान तथा पात्रदान, समदान, करुणादान और सकलदान के भेद बताते हैं।

  8. तीसरे काल में पल्य का आठवाँ भाग शेष रहने पर चौदह कुलकर हुए: प्रतिश्रुति, सन्मति, क्षेमंकर, क्षेमंधर, सीमंकर, सीमंधर, विमलवाहन, चक्षुष्मान, यशस्वी, अभिचन्द्र, चन्द्राभ, मरुदेव, प्रसेनजित और नाभिराज। ज्योतिरांग वृक्षों की ज्योति मंद होने पर चन्द्र-सूर्य को देखकर डरी प्रजा को कुलकरों ने समझाया कि भोगभूमि का काल समाप्त होकर कर्मभूमि आरम्भ हुई है।

  9. नाभिराजा के समय सब कल्पवृक्ष नष्ट हो गए और युगल जन्म भी नहीं रहा; भगवान के गर्भ में आने से छह महीने पहले से श्री, ह्री, धृति, कीर्ति, बुद्धि और लक्ष्मी आदि छप्पन कुमारियाँ रानी मरुदेवी की सेवा करने लगीं, और कुबेर ने पंद्रह महीने रत्नवृष्टि की, इसलिए देवों ने भगवान को हिरण्यगर्भ कहकर स्तुति की।

  10. रात्रि के पिछले प्रहर में मरुदेवी ने सोलह स्वप्न देखे: सफेद ऐरावत हाथी, बैल, सिंह, हाथियों द्वारा स्वर्ण-कलशों से स्नान कराई जाती लक्ष्मी, दो पुष्पमालाएँ, सूर्य, चन्द्रमा, मछलियों का युगल, स्वर्ण-कलश, कमल-सरोवर, समुद्र, रत्नजड़ित सिंहासन, देव-विमान, धरणेन्द्र का भवन, रत्नराशि और निर्धूम अग्नि; नाभिराजा ने बताया कि उनके गर्भ से तीन लोक के नाथ का जन्म होगा।

  11. नौ महीने सात दिन बाद कुबेर द्वारा रची अयोध्या नगरी में ऋषभदेव का जन्म हुआ; इन्द्राणी शची माता के पास मायामयी बालक सुलाकर भगवान को लाई, इन्द्र ने हजार नेत्र बनाकर उनका रूप निहारा, ईशान इन्द्र ने छत्र और सनत्कुमार-माहेन्द्र ने चँवर धारण किए, और सुमेरु की पांडुकशिला पर क्षीरसागर के जल से भरे एक हजार आठ कलशों से अभिषेक हुआ; फिर अयोध्या लौटकर इन्द्र ने तांडव नृत्य किया।

  12. माता-पिता ने उनका नाम ऋषभ रखा; इन्द्र ने उनके अँगूठे में अमृत भरा और उनके साथ खेलने के लिए देवकुमार रखे। कल्पवृक्ष नष्ट होने और इक्षुरस से भूख न मिटने पर प्रजा नाभिराजा के पास गई, जो उसे ऋषभदेव के पास ले गए; उन्होंने अवधिज्ञान से विदेह क्षेत्र की रीति जानकर इन्द्र से नगर-ग्रामों की रचना कराई और क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों की स्थापना की, और प्रजा ने हर्षित होकर उन्हें कृतयुग कहा।

  13. ऋषभदेव की दो रानियाँ थीं: नंदा से भरत आदि सौ पुत्र और ब्राह्मी पुत्री हुई, तथा सुनंदा से बाहुबली पुत्र और सुंदरी पुत्री; वे बीस लाख पूर्व कुमार अवस्था में और त्रेसठ लाख पूर्व राज्य में, इस प्रकार तिरासी लाख पूर्व गृहस्थ जीवन में रहे।

  14. दरबार में नृत्य करती हुई अप्सरा नीलांजना की मृत्यु देखकर ऋषभदेव को वैराग्य हुआ; लौकांतिक देवों ने उनके वैराग्य की स्तुति की, देव उन्हें सुदर्शन नाम की पालकी में तिलक उद्यान ले गए, जहाँ उन्होंने परिवार से क्षमाभाव कर केशलोंच किया, जिन्हें इन्द्र ने रत्न-पिटारे में रखकर क्षीरसागर में पधराया, और मुनि बनकर छह महीने कायोत्सर्ग में निश्चल खड़े रहे।

  15. कच्छ, महाकच्छ आदि चार हजार राजाओं ने केवल स्वामिभक्ति से दिगम्बर दीक्षा ली थी, पर भूख-प्यास से व्याकुल होकर वे भ्रष्ट हो गए; आकाशवाणी की चेतावनी के बाद भी वे फल खाने, शीतल जल में प्रवेश करने और वल्कल या वस्त्र पहनने लगे, पर राजा भरत के दंड के भय से घर नहीं गए; इनमें महामानी मारीच, भरत का पुत्र और भगवान का पोता, लाल वस्त्र पहनकर परिव्राजक मत का प्रचार करने लगा।

  16. कच्छ और महाकच्छ के पुत्र नमि-विनमि भगवान के चरणों में गिरकर राज्य माँगने लगे; तब धरणेन्द्र का आसन कंपित हुआ और उसने आकर उन्हें विजयार्ध पर्वत का राज्य दिया, जो पच्चीस योजन ऊँचा और पचास योजन चौड़ा है, जिसकी दो श्रेणियों में दक्षिण में रथनूपुर आदि पचास और उत्तर में अलकावती आदि साठ विद्याधर नगरियाँ हैं, और जिसके नौ शिखरों में पहले सिद्धकूट पर अकृत्रिम चैत्यालय है।

  17. विद्याधरों की नगरियाँ स्वर्ग समान हैं: स्वर्ण के कोट, गहरी खाइयाँ, उपवन, रत्नमयी सीढ़ियों वाली बावड़ियाँ, कामधेनु समान गायें और निरंतर उत्सव; वहाँ की विद्याधरियाँ देवांगनाओं जैसी हैं, और सिंह समान पराक्रमी, महाविद्याओं के धारक विद्याधर अपनी रानियों सहित विमानों में बैठकर ढाई द्वीप में जहाँ चाहें विहार करते हैं।